वजह नरेंद्र मोदी के गुस्से की



नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से रह-रहकर गुस्से में आ रहे हैं। गुस्सा कारगर हो या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन उनके इस भाव की विवेचना करना तो बनता है। ताजा मामला यह के प्रधानमंत्री ने संसद में पार्टी के जन प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति पर नाराजगी जताई। उनकी सूची मांगी। खबरों के अनुसार उन्होंने यह तक कहा कि जो लोग संसद में नहीं आ रहे, उन्हें ‘ठीक कर दिया जाएगा।’ यकीनन मामला संसद की बैठकों से विरत रहने की प्रवृत्ति के बढ़ने का ही होगा।  अब इस लोकसभा चुनाव के नतीजों की ईमानदारी से समीक्षा करें


आप पाएंगे कि बहुत बड़ी संख्या ऐसे भाजपा सांसदों की है, जो सिर्फ और सिर्फ मोदी लहर के चलते संसद तक पहुंच गये। यानी जैसे हारे को हरिनाम कहा जाता है, वैसे ही इन नतीजों के संदर्भ में जीते को मोदी नाम कहा जा सकता है। यह नतीजा मोदी के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। फिर उनकी सियासी महत्वाकांक्षाओं के नजरिये से यह चुनौती और विकराल हो जाती है। सन 2024 में एक बार फिर सत्ता में वापसी के लिए इस सरकार को जितने सख्त अनुशासन और भारी परिश्रम की दरकार है, वह तब ही संभव हो सकेगा, जब एक-एक सांसद और पार्टी का प्रत्येक पदाधिकारी खुद को अनुशासन एवं नियमों में पूरी तरह आबद्ध कर दे।


इसके लिए वैसी ही  सख्ती की जरूरत है, जो मोदी ने इस कार्यकाल के आरम्भ से ही दिखाई है। उत्तराखंड के विधायक कुंवर प्रवीण सिंह चैम्पियन को छह साल के लिए पार्टी से निकालना इसी दिशा में एक ऐसा कदम है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।  घमंड बहुत बुरी बला है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार भाजपा की  सरकार बनने के बाद सत्ता व्यवस्था में दंभ का अतिरेक साफ महसूस किया जाने लगा था। छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह की अगुआई वाली भाजपा सरकार की हेट्रिक के बाद से यही भाव वहां भी तेजी से पसर गया था।


नतीजा यह हुआ कि दोनो ही जगह विधानसभा चुनाव में सरकारें बदल गयीं। इस तथ्य से मोदी भी बखूबी अवगत हैं। इसलिए  उनका यही प्रयास दिख रहा है कि पार्टीजनों के बीच किसी किस्म की आत्ममुग्धता या मगरूरियत जैसी स्थिति को पूरी तरह पनपने से पहले ही खत्म कर दिया जाए। यूं भी इस पारी की शुरूआत से पहले ही मोदी ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वे कितनी सजगता के साथ कदम उठा रहे हैं। मथुरा में मतदाताओं सहित भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हद दर्जे तक अप्रिय होने के बावजूद हेमा मालिनी चुनाव तो जीत गयीं, लेकिन मोदी  ने उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी।


माना जा सकता है कि चुनाव से पहले अल्पसंख्यक मतदाताओं को धमकी देने के चलते ही मेनका गांधी को इस बार मंत्री पद नहीं दिया गया। वरुण गांधी भी बीते शासनकाल में पार्टी को ही असुविधा में डालने वाले बयानों के चलते ही एक बार फिर कैबिनेट का हिस्सा बनने से वंचित हो गये। उमा भारती पूर्ववर्ती सरकार में गंगा की सफाई के नाम पर असफल रहीं और नतीजा यह कि खुद उन्होंने ही चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया। भोपाल से सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और इंदौर-2 से विधायक आकाश विजयवर्गीय के कारनामों पर भी मोदी खुलकर नाराजगी का इजहार कर चुके हैं। हां, यह देखने वाली बात होगी कि इस सबका कितना असर होता है। खासतौर से तब, जबकि भाजपा में दूसरे दलों के थोकबंद ऐसे नेता शामिल किए जा रहे हैं, जिनका इस दल के अनुशासन से इससे पहले तक कभी कोई सारोकार नहीं रहा है। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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