यह है देश के मन की बात



टीवी पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला को देख रहा हूं। चेहरे पर बरसती लानत साफ दिख रही है। तेवर में तेजी से हो रही अकड़ को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। बोले जा रहे शब्दों में लुटे-पिटे होने का भाव आसानी से समझ आ रहा है। हालत ऐसी है कि मानो दम निकलने की नौबत आ गयी हो, लेकिन दम है कि निकल ही नहीं रहा। प्राण कहीं अटके हुए हैं। यह राजनीतिक अकाल मौत वाली स्थिति है। दिलीप कुमार की एक फिल्म है, संघर्ष। उसका बुरा चरित्र अपने स्वार्थ के लिए सगे बेटे की हत्या कर चुका है। धर्म के नाम पर उसने अनेक बेकसूरों को मौत की नींद सुलाया है। यकायक उसे सांप डस लेता है। लेकिन मौत है कि आने का नाम नहीं ले रही। तब उसकी विधवा बहू खून से सनी वह शॉल लेकर आती है, जिसे पहने हुए उसके पति को मार डाला गया था। बेटे के लहू के निशान उस खलनायक को ऐसे प्रायश्चित से भरते हैं कि वह तुरंत दम तोड़ देता है


फारूक हों या उनका बेटा उमर अब्दुल्ला। या फिर बात की जाए एक और पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती की। ये सभी के सभी कल दोपहर बाद से ऐसे ही अपने राजनीतिक प्राण पखेरु के न उड़ने की पीड़ा से ग्रस्त दिख रहे हैं। तो क्यों ना इन सबको भी दिखा दी जाए, खून और आंसूओं से लिपटे वो अनगिनत कफन, जो अनुच्छेद 370 के चलते कश्मीर में बेकसूरों के नरसंहार की दु:खद यादें हैं। अमित शाह संसद में सही ही कह रहे थे कि कश्मीर में दो-तीन परिवार के अलावा किसी और को क्या मिला है अनुच्छेद 370 से। बीते कल से कश्मीरी पंडित (विवेक तन्खा को छोड़कर) खुशी के आंसू बहा रहे हैं। लद्दाख में हर ओर जश्न का माहौल है। कश्मीर की आबादी का शांतिप्रिय वर्ग राहत की सांस ले रहा है। उनके इन भावों को गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को और राहत का संदेश दिया।


उन्होंने लोकसभा में बताया कि मामले का विस्तार अब पाक के कब्जे वाले कश्मीर और चीन द्वारा हड़पे गये आॅक्साई चिन तक हो गया है। शाह ने इन आशंकाओं को खारिज किया कि अनुच्छेद-370 के खात्में के बाद पाक अधिकृत कश्मीर या अक्साई चीन पर भारत कोई अपना दावा नहीं छोड़ रहा है बल्कि उसे और मजबूती से उठाएगा। शाह ने वाकई देश के मन की बात कही है। इस मुल्क को अपना कश्मीर पूरा का पूरा चाहिए। अरुणाचल की वह जमीन भी वापस लेना है, जो 1962 के युद्ध में अदूरदर्शी प्रधानमंत्री की बदौलत हम से छीन ली गयी। ये कूटनीतिक दांव पेंच चलते रहेंगे लेकिन इसमें क्या शक है कि अब कश्मीर वाकई भारत का अभिन्न हिस्सा है, यह गाना गाने की जरूरत खत्म होगी। कांग्रेस की समस्या विचित्र है। अवस्था दयनीय है। नेहरू ने अनुच्छेद 370 के घिस-घिसकर खत्म होने का जो सुर्रा छोड़ा था, अब वह उनकी ही पार्टी के गले की फांस बन गया है।


बात घिसने वाली नहीं हुई तो उसे रगड़कर लंबा कर दिया गया। गुलाम नबी आजाद बिना पंख के पंछी की तरह फड़फड़ा रहे हैं। कह रहे हैं कि भाजपा ने देश का सिर काट दिया। पता नहीं, सिर गर्व से ऊंचा कर देने की इस प्रक्रिया को आजाद ऐसे गुलामीपूर्ण नजरिये से क्यों देख रहे हैं। वजह निश्चित ही दलगत है। मजबूरी यकीनन स्वार्थगत है। ठीक उसी तरह, जिस तरह अधीर रंजन चौधरी द्वारा मानसिक जहालत के प्रदर्शन को उनकी स्वभावगत कमजोरी माना जा सकता है। चौधरी महाशय लोकसभा को पब्लिक मीटिंग का ठिकाना समझने की भूल कर गये। कश्मीर मसले की संयुक्त राष्ट्र द्वारा निगरानी की बात कहकर उन्होंने खुद के दल को ही कटघरे में ला खड़ा कर दिया। जाहिर है कि बौखलाहट यह सब करवा रही है।


इस सबमें तब और वृद्धि हो जाती है, जब पार्टी के ही कुछ नेता मोदी सरकार के इस निर्णय की तारीफ करने लगते हैं और विपक्ष के वह दल भी ऐसा ही स्टैंड ले लेते हैं, जो इससे पहले तक तमाम मसलों पर मोदी सरकार का आंख मूंदकर विरोध करते चले आ रहे थे। यह राष्ट्रीय जश्न का मौका होना चाहिए था, लेकिन दलगत स्वार्थों का कोई क्या करे? आलम यह कि इस मसले पर कांग्रेस सहित कुछ अन्य विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया हू-ब-हू पाकिस्तान जैसी आ रही है। क्या ऐसे लोगों को देश के हित में सोचने वाला माना जा सकता है? जो लोग इस सब पर मोदी की निंदा कर रहे हैं, उन्हें एक बात पर गौर करना चाहिए। राम मंदिर का मसला भी भाजपा के एजेंडे में है। बल्कि ये तो वह मामला है, जिसने इस दल को केंद्र में सरकार बनाने तक की स्थिति में पहुंचने का मौका दे दिया। मोदी चाहते तो पहले या दूसरे, किसी भी कार्यकाल में आराम से विधेयक के जरिये अयोध्या में मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकते थे। लेकिन ऐसे दृढ़ संकल्प का परिचय उन्होंने कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के लिए दिखाया। अयोध्या पर वह अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। जाहिर है कि मोदी ने धर्म की बजाय उस कर्म को प्राथमिकता दी, जो किसी समुदाय विशेष की बजाय पूरे देश की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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