सुप्रीम कोर्ट की दरियादिली...?



किसान आंदोलन में सुप्रीम कोर्ट के दखल को लेकर मुझे मध्यप्रदेश विधानसभा के दो अलग-अलग वाकये याद आ रहे हैं। विधानसभा के एक तत्कालीन अध्यक्ष ने अचानक मंत्री पर आपा खो दिया था। अध्यक्ष ने गुस्से में मंत्री पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगा दिया। मंत्री सकते में आ गए। लेकिन बाद में मीडिया ने इस बारे में सवाल पूछा तो मंत्री गर्दन बचाने की मुद्रा में बोले, 'अध्यक्षजी वरिष्ठ और सम्मानीय हैं। उन्होंने गुस्सा किया है तो कोई वजह तो जरूर होगी।' एक अन्य मंत्री बिजली मीटरों की खरीदी के फैसले पर बुरी तरह उलझ गए थे। बेचारे मंत्री होने का दंड भुगत रहे थे। विवादित खरीदी का निर्णय तो 'ऊपर' से लिया गया था। मंत्री जी एक पत्रकार के सामने कुछ खुले। बोले, 'गलत-सही की बात तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन मैं तो इस खरीदी को इसी आधार पर सही मानता हूं कि 'साहब' ने यह निर्णय लिया है तो कुछ सोच-समझकर ही उन्होंने ऐसा किया होगा।' तो सुप्रीम कोर्ट सोमवार को खफा हुआ


क्या वाकई उसकी नाराजगी मंगलवार को एक बड़े निर्णय के रूप में सामने आई। उसने तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा दी। मामला पेचीदा है। सचमुच के बुद्धिजीवियों की विलुप्तप्राय प्रजाति भी भारी बुद्धि विलास के बावजूद शायद इसकी तह तक न पहुंच सके। लिहाजा इस मामले में भी ऊपर बताये गए दो वाकयों से ही सुरक्षित रास्ते की तरफ निकल लेना ही बेहतर नजर आता है। आपको कोर्ट की यह व्यवस्था नहीं जमी तो कोई बात नहीं। यही सोचकर संतोष कर लीजिये कि ऐसे ज्यूडिशियल एक्टिविज्म के बावजूद कोर्ट ने इन कानूनों को रद्द करने से बख्श दिया है। और यदि कोई कानूनों को खारिज न किये जाने से दुखी है तो क्या दिल की तसल्ली के लिए ये रास्ता खुला है, जिसमें यह सोचकर गम गलत किया जा सके कि कोर्ट के आदेश पर बनने वाली समिति ही शायद कानून खत्म करने का मश्विरा दे देगी? सवाल इसलिए कि कोर्ट ने समिति में जिन लोगों को शामिल किया है, खुद पर उन पर ही सवाल हैं। न्याय पूरा नहीं हो सकता था लेकिन होते हुए तो दिखता।


कम से कम समिति में एक-दो लोग ऐसे भी शामिल किए जाने चाहिए थे जो तीनों कृषि कानूनों की कमियों की तरफ ध्यान दिला देते। यहां तो चारों सदस्य ही कृषि कानूनों के समर्थक हैं तो वे सर्वोच्च न्यायालय को आखिर राय क्या देंगे? करोड़ों किसानों वाले देश में कमोबेश हर राज्य में अन्नदाता की निर्णायक आबादी है। ताजा किसान आंदोलन में यह आबादी महज कुछ हजार और बमुश्किल ढाई राज्यों तक ही पहुच सकी। सबसे ज्यादा उत्तेजित पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश का किसान है। बाकी देश में तो कोशिश करने पर भी किसान भड़क नहीं पा रहा है। फिर भी ढाई राज्यों के इस वर्ग की तकरीर या तदबीर में से किसी एक में जबरदस्त असर रहा। कोर्ट ने कानून पर ही रोक लगा दी। अच्छा है। लेकिन आंदोलन कर रहे किसानों की समस्या तो यथावत है। वे घोषित समिति पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि ये समिति 'मार दिया जाए, के छोड़ दिया जाए' की तर्ज पर इन कानूनों का भविष्य तय कर पाएगी। उन्हें लग रहा है कि समिति 'छोड़ दिया जाए' के इकलौते भविष्य को तय करेगी।


मामला वैसा तो बिल्कुल ही नहीं बन पा रहा है जिसमें कहा जा सके कि, 'कभी सवार नाव पर तो कभी नाव सवार पर' हो सकती है। लेकिन सुप्रीम अदालत का यह रवैया कोई पहली बार तो सामने आ नहीं रहा है। या ऐसा भी नहीं है कि अकेले नरेन्द्र मोदी के राज में ही यह सब हो रहा है। याद करेंगे तो याद आएगा कि इसी कोर्ट को राजीव गांधी के समय शाहबानो मामले में संसद की ताकत के आगे अपनी तशरीफ पर हाथ बांधने पड़ गए थे। आज उसी कोर्ट के सामने संसद पस्त होने वाली प्रक्रिया से परेशान दिख रही है। शायद लोकतांत्रिक शुचिता तक पहुंचने का मार्ग ऐसी ही घुमावदार गलियों से होकर निकलता है। आंदोलनकारी किसान कह रहे हैं कि उनका प्रदर्शन जारी रहेगा। यूं भी वे पहले ही कह चुके थे कि इस मामले में वे अदालत नहीं जाएंगे। शायद उन्होंने इस मसले पर निर्णय का हक अदालत सहित भारत देश या भारतीयता से इतर किसी को सौंप रखा है। वरना यदि किसी बात को गलत बताया जा रहा है तो उसके लिए न्यायालय में खड़े होने से बचने का औचित्य नजर नहीं आता है।


सुप्रीम कोर्ट की दरियादिली की जितनी तारीफ की जाए, वह कम है। जो आंदोलनकारी उसे कोई तवज्जो देने की जहमत नहीं उठा रहे थे, उन्हीं की खातिर कोर्ट ने कानूनों पर रोक लगा दी। खेर, जो बीत गया, सो बीत गया, लेकिन जो होने वाला है, उसे लेकर भी तो इस तरह की आशा की किरण नजर नहीं आ रही है। देश के कुछ हजार किसानों का हठयोग केवल सिर्फ सरकार को पीछे धकेलने की जिद पर अड़ा है। किसानों को यह मानने में क्या आपत्ति होना चाहिए कि कानूनों को लागू करने का मामला राज्यों पर छोड़ देते हैं। केन्द्र सरकार बातचीत में यह प्रस्ताव दे चुकी है। अगर देश के कुछ किसानों को लगता है कि यह कानून किसान विरोधी हैं तो देश के कई किसानों को यह भी तो लग रहा है कि यह कानून उनके हित और फायदे के लिए है। वनवे टेÑफिक की फितरत से तो बाहर आना ही पड़ेगा। नहीं तो, फितरत जिस वन वे ट्रैफिक वाली है, उस ट्रेफिक का सफल संचालन सुप्रीम कोर्ट ही कर सकती है। तो जैसी भी प्रक्रिया कोर्ट ने तय की है, उसके पूरा होने का इंतजार करते हुए इस आंदोलन को खत्म किया जाना चाहिए। ये आंदोलन यदि आज हो सकता है तो कल फिर इसे शुरू करने में क्या दिक्कत है। वैसे भी आंदोलन कर रहे किसान काफी साधन संपन्न हैं।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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