शरद पवार की किस्मत को सलाम



महाराष्ट्र में बीते चौबीस घंटे में जो कुछ घटा, वह उद्धव ठाकरे के शपथ लेने तक सिमट कर रह जाएगा, ऐसा नहीं है। इसके दूरगामी नतीजे होंगे। चौंकाने वाले। क्योंकि यह तय मानकर चलिए कि शिवसेना ने अपने डैथ वारंट पर दस्तखत कर दिये हैं। कांग्रेस ने गैर-भाजपाई दलों की भीड़ के बीच अपना कद कम कर लिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, खासकर शरद पवार ने सियासी वानप्रस्थ के समय पर वैसा ही भाग्य हासिल कर लिया है, जैसे पीवी नरसिंहराव को यकायक दिल्ली बुलाकर प्रधानमंत्री पद संभालने का मौका दे दिया गया था। अब बात विस्तार से। शिवसेना भविष्य में ‘आमची मुंबई’ वाली भूमिका में नहीं रहेगी। वह ‘भाई/माई तुझा आशीर्वाद’ की तर्ज पर चलेगी


भाई यानी शरद पवार और माई यानी सोनिया गांधी। वे दो लोग, जिनकी बदौलत उद्धव ठाकरे की मुख्यमंत्री बनने की चिर-संचित अभिलाषा पूरी हो सकी है। आशीर्वाद की आक्सीजन पर टिकी रहने वाली शिवसेना के लिए जरूरी होगा कि वह हिंदुत्व से पैर पीछे खींचे। ठाकरे ने जता दिया है कि सत्ता के लिए वह ऐसा बहुत आसानी से कर सकते हैं। लेकिन उस मतदाता के लिए यह सब सह पाना आसान नहीं होगा, जिसने इस दल को भाजपा से भी अधिक हिंदूवादी मानकर महाराष्ट्र की राजनीति में उसका जलवा बरकरार रखा। बात महाराष्ट्र प्रेम की नहीं है। राज्य की बात होती तो आज की तारीख में उद्धव से अधिक लोकप्रिय और ताकतवर उनके चचेरे भाई राज ठाकरे होते।


किंतु वह मराठी मानुस की राजनीति में उलझकर कहीं के नहीं रहे और उद्धव ने हिंदुत्व का चोला पकड़कर तमाम सफलताएं हासिल कर लीं। शिवसेना की भगवा छवि से प्रभावित मतदाता जाहिर है कि अब भाजपा की ओर ही जाएगा। बाकी, जहां तक अल्पसंख्यक मतदाताओं का सवाल है, तो तय मानिए कि उद्धव कांग्रेस तथा एनसीपी की हां में हां मिलाने के बावजूद इस तबके के मन से अपनी कट्टर छवि से कभी भी निजात नहीं पा सकेंगे। शिवसेना की हालत ‘रहीम तो थे छूटे, अब राम भी रूठे’ वाली हो गयी है, जिसका आने वाले समय में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस ने तात्कालिक लाभ के लिए बड़े नुकसान का सौदा कर लिया है।


क्योंकि शिवसेना से हाथ मिलाकर इस दल ने उस वोट को नाराज किया है, जो कांग्रेस की तथाकथित धर्म निरपेक्षता या सॉफ्ट हिंदुज्म के चलते उसे पसंद करता आया है। इससे यह भी हुआ है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी का कद खुद से ही अलग होकर बनी एनसीपी के आगे और छोटा हो गया है। क्योंकि यह सभी जानते हैं कि शरद पवार न होते तो राज्य में भाजपा की सरकार फिर बनने से कोई नहीं रोक सकता था। राहुल गांधी की ‘कृपा’ से कांग्रेस पहले ही गैर-भाजपाई दलों के बीच दब्बू बनकर रह गयी थी। उस पर ममता बनर्जी सहित एन चंद्रबाबू नायडू, मायावती और अखिलेश यादव तक हावी हो गये थे। आज इस पंक्ति में शरद पवार सबसे आगे हैं और अंत्योदय की मोहताज हो गयी कांग्रेस एक सीढ़ी और पीछे हो गयी है।


शरद पवार ने एक ही झटके में खुद को नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह के लिए बहुत बड़ी चुनौती के रूप में स्थापित कर दिया है। जाहिर है कि सन 2024 के संभावित आम चुनाव की ओर नजर गड़ाए बैठे विपक्षी दलों के लिए फिलवक्त पवार का नेतृत्व स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। मराठा नेता को बहुत बड़ा लाभ उनके भतीजे अजीत पवार की नादानी से भी मिल गया। अपनी लगातार कोशिशों से अजीत ने एनसीपी में नंबर दो की स्थिति हासिल कर ली थी। स्वाभाविक था कि वे शरद की बेटी सुप्रिया सुले के लिए चुनौती बन सकते थे। अब ऐसा नहीं होगा। एनसीपी में अजीत जिस तरह घुटने के बल चलते हुए वापस आये हैं, उससे साफ है कि वह अपना सियासी रसूख और विश्वसनीयता लम्बे समय के लिए खो बैठे हैं। एनसीपी का अगला प्रमुख बनने की बात हो या भविष्य में इस दल की सरकार बनने का मामला, सुप्रिया सुले दोनो जगह के लिए निर्विवाद चेहरा बन चुकी हैं। शरद पवार की किस्मत को सलाम।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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