शब्दों के खेल में फेल इमरती



इमरती देवी ने गजब बयान दे दिया। फिर उतने ही गजब अंदाज में अपने कहे से पलट भी गयीं। एक सज्जन तब कांग्रेस में नारेबाजी में निपुण माने जाते थे। गला फाड़कर चीखने में उनका कोई सानी नहीं था। फिर एक दिन पता चला कि उन्हें सेवादल में स्थान मिल गया है। मैंने बधाई दी तो उनका दर्द उबाल खाने लगा। बोले,' भाई, ये कहां फंस गया मैं। पूरा शाकाहारी हिसाब-किताब है। अनुशासन में रहो, नारे मत लगाओ। चुपचाप पार्टी का काम करते रहो। यह अपनी तबीयत को जम नहीं रहा है।' इसके कुछ दिन बाद ही उन्होंने राजनीति को नमस्ते किया और फिर किसी अन्य काम में लग गए। अब इमरती देवी का भी यही छटपटाता अंदाज मुझे महसूस हो रहा है


ठेठ देहाती मिजाज। गुस्सा नाक पर। 'महाराज' के लिए दुराग्रह की हद तक का समर्पण। कुछ दिन पहले एक पत्रकार को कैमरे के सामने झाड़ दिया। उससे कह दिया कि कोरोना से बचने का मास्क तो वह मजबूरी में लगा रही हैं। वीडियो वायरल हुआ, लेकिन मामला आगे बढ़ा नहीं। मगर आज पानी सिर से ऊपर हो गया। आगामी उपचुनावों में भाजपा की जीत के लिए जो 'कलेक्टर को एक फोन करने' वाला फार्मूला उन्होंने उद्घाटित किया, उससे निश्चित ही सिंधिया सहित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी सनाका खा गए होंगे। दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाने वाली थ्योरी ईजाद की थी।


वह थ्योरी, जिसके असर से कहा जाता है कि कलेक्टरों की मदद से भाजपा के तमाम दिग्गजों को हराकर दिग्विजय के लगातार दूसरे शासनकाल का रास्ता साफ हो गया था। इमरती ने गुरूवार को जो कहा, उसे दिग्विजय की मैनेजमेंट थ्योरी को एक्सपोज करने का काम कहा जा सकता है। खैर, जैसा कि करना पड़ता है, इमरती ने जल्दी ही अपने कहे का खंडन कर दिया। लेकिन तब तक तो बात फैल चुकी थी। साथ ही यह तथ्य भी याद दिलाया जाने लगा कि एक दिन पहले ही शिवराज ने इमरती के कामकाज की जमकर तारीफ की थी। बहुत मुमकिन है कि इमरती को सरकार या बेहद असरकार सिंधिया सोच-समझकर बोलने की हिदायत दें।


लेकिन वह मान जाएंगी, पुराने घटनाक्रम देखकर ऐसा लगता तो नहीं है। दरअसल इमरती की केवल यह गलती रही कि उन्होंने सच बयान कर दिया। वह सच, जिसे हरेक सत्तारूढ़ दल छिपाता है और विपक्ष में आने के बाद उसे उजागर करने में जुट जाता है। इमरती का सच बोलने का तरीका गलत हो गया। दिग्विजय ने जिस कटु सत्य को 'मैनेजमेंट' जैसे शालीन शब्द की चादर में ढंक दिया था, इमरती वैसा नहीं कर सकीं। केवल शब्दों का फेर है। लड़खड़ाते किसी आदमी के लिए आप कह दें कि वह दरुआ है, बस सुनने वाले तुरंत नाक-भौं सिकोड़ लेंगे।


मगर आप बोलें, 'ही इज ड्रंक' तो सुनने वाला पूरी सदाशयता सम्मान वाले अंदाज में, 'ओह! आई सी' &कहकर अलग रूप अपना लेगा। मेरे एक परिचित हैं, उनके देहाती पिता अड़ गए कि गांव की लड़की से ही बेटे की शादी करवाएंगे। लड़का राजी नहीं था। उसे शहरी लड़की चाहिए थी, क्योंकि मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पैथोलोजिस्ट बन चुका था। उसने उपाय खोज निकाला। लड़की के परिवार से अकेले ही मिलने चला गया। रोजगार की बात चली तो बोला, 'जी मैं दूसरे इंसानों के मल-मूत्र, खून और खखार में अपनी रोजी-रोटी तलाशता हूं.' लड़की वालों को जैसे काठ मार गया। उन्होंने खुद ही इस रिश्ते से मना कर दिया। तो यह होता है शब्दों का खेल, जिसमें फेल हो गयीं इमरती देवी। हां, खेल अभी जारी है। कलेक्टर सहित नौकरशाही के उस प्रवृत्ति वाले दोहन का खेल, जो आजादी के सात दशक से बाद भी आज तक बदस्तूर और पूरे मजे से मौका मिलते ही चल जाता है।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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