संगठित गिरोह जैसी अफसरशाही...



स्कूल के दौर तक इंद्रजाल कॉमिक्स खूब पढ़ीं। उसका एक चरित्र था बहादुर। ऐसे इलाके के गांव में उसका निवास बताया जाता था, जहां डकैतों का खासा आतंक है। लेकिन हर डकैत को यह हिदायत कि बहादुर के घर की तरफ आंख उठाकर भी न देखे। उसके निवास को 'लाल ईंटों वाली हवेली' कहा जाता था। पूरे गांवों में सबसे सुरक्षित ठिकाना। क्या लालफीताशाही का एक और निर्लज्ज उदाहरण पेश करने वाले राज्य मंत्रालय के वल्लभ भवन को भी लाल ईंटों वाली हवेली कहना चाहिए? वहां बैठे अफसरान के कारनामे देखकर तो लग रहा है कि इस नामकरण की अब केवल औपचारिकता शेष रह गयी है। वो इंद्रजाल कॉमिक्स का मामला था, ये भरेपूरे मायाजाल वाली बात है। उसमें बहादुर का आशियाना निरापद था, इसमें साहब बहादुर तमाम काला-पीला करने के बाद भी पूरी तरह महफूज हैं। भाई लोगों ने कर्ज माफी को लेकर वह लिखत-पढ़त की कि प्रदेश सरकार की स्थिति विधानसभा के भीतर दुशासन वाली  द्रौपदी जैसी हो गई


सरकार की इज्जत का चीर-हरण हो गया। प्रदेश में हर तरफ किसान कर्ज माफी को लेकर भ्रम का शोर है। बीजेपी आरोप लगा रही है कि कमलनाथ सरकार ने इस माफी के नाम पर किसानों से छल किया। लेकिन विधानसभा में जो जानकारी आयी, उसने पासे पलट दिए. रिकॉर्ड पर कह दिया गया कि राज्य में 27 लाख किसानों का कर्जा माफ किया गया है। कमलनाथ ने जो दावा किया, उससे ज्यादा अफसरों ने बता दिया। इस मट्टी पलीद के बाद सरकार सांसत में हैं। नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह इस जानकारी को झूठा बताते हुए अफसरों को इसका दोषी बता रहे हैं। जांच के बाद कार्यवाही की बात भी कही जा रही है। मगर अब तो तीर कमान से निकल चुका है। विधानसभा का रिकॉर्ड जो कह रहा है, वह कमलनाथ की उस पेन ड्राइव को काफी हद तक जस्टिफाई कर रहा है, जिसमें छब्बीस लाख से ज्यादा किसानों का कर्ज माफ करने का दावा किया गया है।


राहुल गांधी विदेश किसलिए गए थे, ज्यादातर मौकों की ही तरह इस बार भी यह कोई नहीं जानता, लेकिन एक बार फिर देश में लौटते ही वह 'खोयी ताकत और जवानी फिर पाएं' वाले अंदाज से लबरेज हैं। कोई मौका चूके बगैर उन्होंने पूरी चुस्ती के साथ भाजपा पर हमला बोल दिया। कहा कि कांग्रेस ने जो कहा था, मध्यप्रदेश में वह कर दिखाया है। ऐसा कमलनाथ सरकार के दौरान भी हुआ था। कांग्रेस भाजपा सरकार पर ईटेंडरिंग घोटाले और नर्मदा किनारे वृक्षों को लेकर भ्रष्टाचार का दावा करती आ रही थी लेकिन जब कांग्रेस के ही विधायकों ने इसे सवाल के तौर पर विधानसभा में उठाया तो कमलनाथ सरकार के मंत्रियों ने इस मामले में क्लीनचीट जारी कर दी। इन मामलों में दिग्विजय सिंह के सुपुत्र और कमलनाथ सरकार में मंत्री जयवर्द्धन सिंह और वन मंत्री उमंग सिघार चर्चा में आएं थे। इसी मामले को लेकर दिग्विजय सिंह और उमंग सिघार के बीच विवाद भी उछला था।


हमारे लोकतंत्र में जवाबदारी राजनीतिक नेतृत्व की होती है। करने वाले होते हैं नौकरशाह। अब भला सरकार में स्थायी होकर बैठी नौकरशाही अपना ही किया गलत कैसे ठहरा सकती है। इसलिए एक सरकार जाने के बाद जब दूसरी आती भी हैं तो जिन आरोपों से जाने वाली सरकार जूझ रही होती है, उसे बचाने का काम तो स्थाई रूप से बैठे नौकरशाहों को करना ही है। आखिर वे अपना ही किया गलत कैसे ठहरा सकते हैं। इसलिए एक बात तो सही है। वह यह कि अफसर तो अफसर हैं, लेकिन क्या राजनीतिक नेतृत्व भी भांग पीकर बैठा है? कमल पटेल खुद मंत्री बनने के बाद किसानों से धोखे के लिए कमलनाथ को कोस रहे हैं। कर्ज माफी की जांच कराने का दावा कर रहे हैं और विधानसभा में खुद ही इसे जस्टीफाई कर रहे हैं। क्या इस जवाब को देखे या समझे बगैर ही उन्होंने इस आगे बढ़ा दिया? अगर नौकरशाही को ही परम और चरम सत्य मान लिया गया है तो फिर विधानसभा के चुनाव जैसी महंगी प्रक्रिया बंद कर दी जाना चाहिए।


अफसरों के बूते पर ही पूरा प्रदेश और सरकार संचालित करने की व्यवस्था लागू कर दिए जाने में आखिर क्या दिक्कत होना चाहिए? लोकतंत्र के नाम पर यह शोकतंत्र जैसा दुखद मामला है। अब अफसरों का तो कुछ बिगड़ने से रहा। हां, मुमकिन है कि कुछ छोटी मछलियों को सस्पेंड कर यह अहसास दिलाने का प्रयास किया जाए कि राज्य में सरकार नामक किसी संस्था का बाकायदा अस्तित्व मौजूद है। बाकी लाल पत्त्थरों वाली हवेली में बैठे बहादुरों का तो कुछ होने से रहा। बहुत से बहुत एकाध का महकमा बदल दिया जा सकता है। बाकी न उनके ठाठ में कमी आएगी और न ही स्वच्छंद आचरण पर कोई असर होना है। लम्बा अरसा बीत गया। सरकार कोई भी रही हो, असरकार तो नौकरशाह ही रहे हैं। याद नहीं पड़ता कि एक भी सरकार ऐसी आयी हो, जिसके समय में 'अफसरशाही की मनमानी' जैसी खबरें पढ़ने/ सुनने/देखने में न आयी हों। सरकार में अकेले मुख्यमंत्री को छोड़ दें तो अफसर मंत्रियों को भी घास नहीं डालते। तो ऐसे मंत्रियों पर जनता का पैसा खर्च करने का क्या औचित्य? अफसरशाही किसी संगठित गिरोह की तरह मनमानी कर रही है और उनके इस मायाजाल को काट पाने का दम और इच्छा, दोनों ही कम से कम राजनीतिक नेतृत्व के बस में कहीं से भी नजर नहीं आते हैं।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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