फितरत थोंपने की...



दो लडकियां आपस में झगड़ा कर रही थीं। एक बोली, 'तुझे अंधा पति मिलेगा।' दूसरी ने कहा, 'तुझे तो लंगड़ा पति ही मिलेगा।' पास से गुजर रहे एक अंधे और लंगड़े राहगीर वहीं रुक गए। झगड़ा लंबा चला तो उन्होंने युवतियों से पूछा, 'मैडम! हम आपका झगड़ा खत्म होने का इंतजार करें या फिर चले जाएं?' मध्यप्रदेश की आंगनबाड़ियों को लेकर राज्य सरकार में चल रही सिर-फुट्टौवल का भी इसी चुटकुले जैसा आलम है। भूख बच्चों की है और उनके आहार को लेकर सयानों के बीच बहस चल रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कह दिया कि बच्चों को अंडा नहीं, बल्कि दूध बांटा जाएगा। इससे पहले चौहान की काबीना मंत्री इमरती देवी के तेवर अंडे के पक्ष में बहुत तीखे थे। उनका बस नहीं चला, वरना


'सौगंध महाराज की खाते हैं, हम अंडा ही खिलाएंगे' का नारा बुलंद कर देतीं। अब शिवराज ने अंडे का इमरती वाला फंडा ही खत्म कर दिया है। आज कह दिया कि अंडा नहीं, आंगनबाड़ियों में दूध का वितरण किया जाएगा। चौहान फुलप्रूफ अंदाज में चले। निर्णय को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से जोड़ दिया। अब भला किसकी मजाल कि मोदी के नाम के बाद इस मामले में शिवराज से इतर विचार रख दे! लेकिन ये उलझन आखिर क्यों? भूखे तो बच्चे हैं। कुपोषित या कमजोर भी वे ही हैं, तो फिर खिलाइये ना उन्हें उनकी मर्जी या जरूरत का पोष्टिक भोजन।


अब अंडा और दूध एक म्यान में दो तलवार जैसे तो हैं नहीं, तो फिर आंगनबाड़ियों में इन दोनों का ही वितरण करने में भला क्या समस्या है! जो बच्चा शाकाहारी हो, वह दूध ले ले और जिसे अंडे से कोई परहेज न हो, उसे यह आहार दे दिया जाए। दोनों को ही संपूर्ण आहार का दर्जा हासिल है। नौनिहालों की सेहत और जिंदगी से जुड़े इस नाजुक विषय पर भला वेज और नॉन-वेज जैसी बहस का क्या औचित्य रह जाता है। बड़ी संख्या में लोग आज नॉन वेज खाते हैं। इसका सेवन कभी भी किसी धर्म, जाति या वर्ग विशेष तक सीमित नहीं है। फिर बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं, जिनकी सेहत के लिए खुद डॉक्टर अंडा खाने की सलाह देते हैं। और फिर मान लीजिये कि आंगनवाड़ी में किसी बच्चे को दूध से एलर्जी ही हो तो सरकार क्या फिर उसके मुंह में जबरदस्ती यह ठूसने पहुंच जाएगी? बात एक पूरी पीढ़ी की हिफाजत की है।


उसे तंदरूस्त रखने की है। तो फिर इसे नीति-निर्धारकों की पसंद या नापसंद के तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए। जितना समय हम 'क्या खाना है, क्या खिलाएंगे' में बर्बाद करेंगे, उतने समय में बच्चों के लिए पोषण तथा सुरक्षा की किसी ठोस नीति के लिए फिक्र की जाना चाहिए। शिवराज की पिछली सरकारों के दौरान भी यह विवाद हुए थे। इस समय तो हम मान लें कि इमरती देवी कांग्रेस से बीजेपी में आई हैं। लेकिन जब अकेले बीजेपी भी बहुमत के साथ सत्ता में थी, तब भी अंडा और दूध पर घमासान था। और एक बार तो तत्कालीन महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने सहजन के बीज ही कुपोषण से निपटने के लिए बांट दिए थे। इस सारे विवाद में ध्यान रखने वाली बात यह है कि पोषण आहार की जरूरत आखिर किस वर्ग के बच्चों को ज्यादा है। और किन क्षेत्रों में है।


अब जिन क्षेत्रों और वर्गों में दूध और अंडा बहस का विषय नहीं है, वहां आखिरकार क्यों बेवजह की राजनीति की जा रही है। होना तो यह चाहिए कि दूध और अंडा दोनों ही कुपोषण से पीड़ित बच्चों को उपलब्ध कराया जाए। आखिर जो लोग शुद्ध शाकाहार की वकालत कर रहे हैं, उनके बच्चे तो वैसे भी कुपोषित नहीं हैं। जाहिर है उनके पोषण के लिए बादाम, काजू, अखरोट सब मौजूद है। राज्य की बहुत बड़ी आबादी आदिवासियों की है, दलितों की है या फिर ग्रामीण क्षेत्रों की है। इन सब क्षेत्रों में मांसाहार वर्जित नहीं है। इस तबके के बीच मांसाहार का भी चलन है। तो उनके आंगनबाड़ी आए बच्चों को क्या सिर्फ इसलिए इस भोजन से दूर कर दिया जाए कि प्रदेश की हुकूमत अंडे से परहेज को अपने हिंदुत्व के आधारों में से एक मानती है? हिन्दूत्व के किस हिस्से में मांसाहार वर्जित किया गया है। हमारे तो देवी देवताओं को बलि और मदिरा तक प्रसाद में चढ़ाने का भी चलन है। मामला इच्छाओं को थोपने का भले ही न हो, लेकिन इसके पीछे जबरदस्ती के विचारों को थोपने की फितरत दिखती है। और ऐसी बहस को कुपोषित बच्चों के साथ कु्रर मजाक के अलावा और क्या माना जाना चाहिए। जो देना हो जल्दी देना चाहिए, इसमें देर या बहस कैसी?


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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