पटेल को सच्चा सिपाही कहने से पहले



खराब दौर में अहमद पटेल का जाना वाकई कांग्रेस की बहुत बड़ी क्षति है। कांग्रेस नेतृत्व के लिए अहमद पटेल जैसे विश्वसनीय नेता को खोना किसी सदमें से कम नहीं है। कांग्रेस आज दुर्गति के जिस दौर से गुजर रही है, उसमें एक बड़ी हिस्सेदारी पटेल की भी है। निश्चित तौर पर कांग्रेस विरोधी लहर के दौरान 1977 से लेकर 1984 तक लोकसभा के तीन लगातार चुनाव जीतकर अहमद पटेल ने इस बात को साबित किया था कि वे जनाधार वाले नेता हैं। इस पर ताज्जुब किया जा सकता है लेकिन हकीकत ऐसी ही है। सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव के पद तक आते-आते पार्टी के प्रबंधक बन बैठे अहमद पटेल ने कांग्रेस में तमाम जनाधार विहिन अचंभों का पालन पोषण किया। खुद मध्यप्रदेश इसका एक बड़ा उदाहरण है। अहमद पटेल यदि संकोची स्वभाव के थे तो ये उनकी खुद की गलती थी। यदि वह गलत को गलत कहने का साहस नहीं दिखा सके तो फिर उन्हें कांग्रेस का सच्चा सिपाही कहना शायद इस उपमा के साथ ना-इंसाफी होगी


पटेल ने अपनी राजनीतिक क्षमताओं का सोनिया गांधी से लेकर अपने मित्रों के हित में पूरी तरह दोहन किया लेकिन इसे पार्टी के हक किया गया दोहन कहना मुश्किल है। अहमद पटेल के दौर में ही हेमंत बिस्वा शर्मा से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे जनाधार वाले कांग्रेसी नेताओं को मजबूरी में भाजपा को मजबूत करने में योगदान देना पड़ा। अहमद पटेल अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनके बोये कुछ ऐसे बीजों की लहलहाती अमरबेल को हम कांग्रेस में हर तरफ देख सकते हैं जो इस दल के मूल सत्व को चूसकर खत्म कर देने पर आमादा है। पटेल ने कांग्रेस में जिन आधारहीन अचम्भों को कांग्रेस में पाला पोसा, आज वे सब ही इसकी दुर्गति के प्रमुख कारण बन गए हैं। इनमें कमलनाथ को प्रमुख उदाहरण के तौर पर सामने रखा जा सकता है। कमलनाथ ने कहा कि पटेल ने ही उन्हें दिल्ली की राजनीतिक गलियों से निकालकर मध्यप्रदेश की पगडंडी की तरफ भेजा। अब इन्हीं कमलनाथ को देखिए। दूर के ढोल थे, तब तक सुहावने रहे।


चालीस साल से अधिक तक छिंदवाड़ा में तो वे छाते रहे, लेकिन राज्य के स्तर पर आखिरकार वे कांग्रेस की कमजोरी का कारण बन कर ही स्थापित हो गए। यह पटेल की तारीफ ही है कि यूपीए सरकार के गठन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद वे मंत्री पद से दूर रहे। उन्होंने खुद को सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार के तौर पर ही बनाये रखा। लेकिन यह भी तो सही है कि ऐसी सलाहों के दौर में ही पटेल ने सोनिया को लगभग सभी मौकों पर सही और गलत के बीच का फर्क नहीं बताया। सोनिया की पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं है। बीस साल से कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के बाद भी यह एक स्थापित वास्तविकता है। इसीलिये उन्हें एक अदद सलाहकार की सख्त जरूरत थी। पटेल ने यह काम किया और पूरे भरोसे के साथ किया। लेकिन उनकी सलाहों के बीच ही यह हुआ कि कांग्रेस का कई राज्यों से सूपड़ा साफ हो चुका है। गुजरात में पटेल उस समय चुनाव जीतते थे, जब देश-भर में कांग्रेस के खिलाफ लहर चल रही थी।


अपने इसी गृह राज्य में यदि पटेल ने पार्टी को मजबूत किया होता तो आज यह नहीं होता की दो दशक से ज्यादा समय से कांग्रेस इस सूबे में सत्ता में आने के लिए तरस रही है। पटेल अंगद की तरह अपना एक पांव दिल्ली दरबार और दूसरा गुजरात में जमाये रहे। उन्होंने दोनों ही जगहों पर अपना कोई विकल्प पनपने नहीं दिया। जिसका नतीजा यह कि कांग्रेस नेतृत्व के लिहाज से कमजोर और गुजरात के सन्दर्भ में बीमार हो चुकी है। सोनिया गांधी की निर्णय क्षमता की दक्षता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है (पुत्र मोह के अलावा)। ऐसे में यदि पटेल ने उन्हें पार्टी के हालात की संकोच त्यागकर जानकारी दी होती तो इस दल की शायद आज जैसी खराब हालत नहीं होती। यदि उन्होंने खोखले नेताओं को प्रमोट करने की बजाय उनके सच को सोनिया के सामने ताकत से रखा होता तो भी ऐसे हालात नहीं बनते। यकीनन वे कांग्रेस के संकट मोचक थे, किन्तु अपनी इस क्षमता का इस्तेमाल उन्होंने पार्टी के संकटों की कमी के लिए नहीं किया।


इसलिए हुआ यह कि पटेल के ताकतवर दौर में पार्टी एक के बाद एक मुसीबतों से जूझती ही रही। उसकी समस्याएं अब भी खत्म नहीं हुई हैं। आज राहुल गांधी नेतृत्व के मामले में गैर-गांधी वाली बात कह रहे हैं। क्या अपने जीते-जी पटेल इस बात को नहीं समझते होंगे कि यह वंशवाद ही पार्टी की जड़ों को खोखला कर रहा है? शायद उन्होंने इस सच को सोनिया गांधी के सामने कभी नहीं रखा। इसमें उनका भी कसूर नहीं था। कांग्रेस के तमाम बड़े नेता एक सुर में यहीं सोचते हैं कि किसी भी गैर गांधी के हाथों में नेतृत्व जाने से पार्टी बिखर जाएगी। खैर,अब समय है। राहुल गांधी को चाहिए कि परिवार से अधिक मोह पार्टी के लिए रखें। एक सख्त और क्रूर प्रक्रिया के तहत नेतृत्व और नियंत्रण के मामले में वह निर्णय होने दें जो इस दल की खोयी ताकत और जवानी को फिर से पाने का जरिया बन सके। राहुल को चाहिए कि अब किसी सलाहकार की बजाय पार्टी के वास्तविक शुभचिंतक कार्यकर्ताओं को साथ लेकर आगे बढ़ें। कांग्रेस का आतंरिक संघर्ष भले ही एक चरम पर पहुंचे लेकिन एक सुधारवादी प्रक्रिया का आगाज करें। इससे कांग्रेस के साथ देश में लोकतंत्र का भी भला होगा। वरना तो सलाहकारों के भरोसे नैया के डूबने का सिलसिला ऐसे ही जारी रहेगा।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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