मत बदलो लोकतंत्र को शोकतंत्र में



'गरीब की जोरू, सारे गांव की भोजाई।' यह लोकोक्ति मध्यप्रदेश की आम जनता के लिए प्रयोग हो रही है। गरीब की यह जोरू इस समय सारे गांव की अभागी भाभी जैसी बन गयी है। इस अनाचार की शुरूआत बीते साल दिसंबर के मध्य में उस दिन हो गयी थी, जब प्रदेश में कांग्रेस ने 'भागते भूत की लटकती लंगोटी' वाली शैली में सपा, बसपा और निर्दलीयों की मदद से भानुमति का कुनबा जोड़कर अपनी पंद्रह साल से सूनी पड़ी मांग में उधार का सिंदूर भरा था। जरा पीछे पलटकर देखिए। इसके बाद के करीब दस महीने यानी अब तक राज्य में क्या हुआ है। यहां सबसे व्यापक पैमाने पर सिर्फ और सिर्फ मुंडी गिनो अभियान चलाया गया


प्रमुख विपक्षी दल भाजपा यही गिनता रहा कि सत्तारूढ़ दल की कितनी मुंडियां कम होकर उसकी झोली में आ गिरती हैं। कांग्रेस यह गुणा-भाग में मसरूफ रही कि कैसे खुद की खोपड़ियां बचाई जाएं और भाजपा की कम की जा सकें। लगभग सारी राजनीतिक गतिविधियां इसी के आसपास सिमटकर रह गयीं। बतौर मुख्यमंत्री कमलनाथ और अरविंद केजरीवाल के बीच केवल जुबान हिलाने का अंतर रह गया है। केजरीवाल पूरे कार्यकाल में यही रोना रोते रहे कि उन्हें काम करने नहीं दिया जा रहा है। नाथ अब तक रोये तो नहीं हैं, लेकिन जिस बिलखते-कलपते अंदाज में अब तक उन्होंने काम किया है, वही यही बताता रहा कि कांपते हुए बहुमत के चलते वे ठीक से काम नहीं कर पा रहे थे।


भाग्य शिवराज की तरह, कमलनाथ का भी लगता है मजबूत है। ले-देकर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा और प्रहलाद लोधी नामक घटनाक्रम ने नाथ सरकार को फिलहाल पूरी तरह सुरक्षित बहुमत वाली स्थिति में ला दिया। प्रदेश की जनता को एकबारगी लगा कि अब सरकार काम करेगी। नाथ बहुमत की दम पर जनकल्याणकारी योजनाएं लागू करेंगे। ऐसा होता तो दिख नहीं रहा। मुख्यमंत्री बहुमत की सुरक्षित रजाई के अंदर भी असुरक्षित बहुमत के चीथड़े ही लपेटे हुए दिख रहे हैं। कह रहे हैं कि कांग्रेस को दो-तीन और सीट मिल जाएंगी।


हो सकता है कि उनके इस कथन में दम हो, लेकिन इस सियासी धुंध में आम जनता का जो दम घुट रहा है, उसका क्या? राजभवन परिसर में रविवार को किया गया उनका यह दावा देखकर साफ लगा कि वे हताश स्तरीय राजनीति में इस कदर रच-बस चुके हैं कि उन्हें यह याद दिलाना पड़ेगा कि अब वह पूर्ण बहुमत वाले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिसे प्रदेश के विकास और जनता की पुकार सुनने का जनादेश मिला है। सच कहें तो यह 'ज्ञानी से ज्ञानी मिले, करें ज्ञान की बात...' इस की ठीक अगली लाइन इस समय मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ दल एवं मुख्य विपक्ष भाजपा पूरी तरह चरितार्थ कर रहे हंै। जिससे शासन तंत्र के आदर्श संचालन की उम्मीद की जा रही है, वह गणतंत्र का मजाक उड़ाने पर आमादा है।


जिस से विपक्ष में बैठकर जनता के हित के लिए सरकार पर दबाव बनाने की स्वाभाविक अपेक्षा है, वह कीचड़ में लेटकर इसे दूसरों पर फेंकने में मसरूफ है। नाथ साहब! दो-तीन नहीं, दस-बीस विधायक और बढ़ा लीजिए। शिवराज जी! हरण कर लीजिए सत्तारूढ़ दल के बहुमत का। आप दोनों में से जिसे जो करना हो, वह कर ले, लेकिन ये मुंडी गिनाओ अभियान अब बंद करो। लगने दो कि यह उस प्रदेश का मामला है, जहां वाकई सरकार नामक किसी शै का अस्तित्व है। सरकार किसानों का कर्ज पूरी तरह माफ करे। पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि रोके। अपराधों पर लगाम लगाए। अपने घोषणा पत्र पर ईमानदारी से अमल करे। और विपक्ष सुनिश्चित करे कि इनमें से एक-एक कदम पूरा किया जाए। ऐसा न होने पर वह तीखा विरोध करे। यही प्रदेश की सत्ता और प्रतिपक्ष से अपेक्षा है। उसे आपके मुंडी युद्ध से कुछ लेना-देना नहीं है। उसे गरीब की लुगाई में तब्दील मत करो। रहम करो और लोकतंत्र को शोकतंत्र में बदलने वाली अपनी-अपनी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा दो तो अच्छा है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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