क्या करें ऐसे ज्ञानी रावणों का...!



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस विचार से मैं असहमत नहीं हूं कि आतंकवाद किसी विचारधारा का रूप ले चुका है। इसलिए यह सवाल स्वयमेव उठ खड़ा होता है कि इस विचारधारा का समूल नाश क्या कभी संभव हो पाएगा? अनुच्छेद 370 की आड़ में कश्मीर में जो असंख्य विष बेल पनपीं, उन सभी में आतंकवाद की खाद ही डाली गयी। जिन्हें बड़ी बेशर्मी से स्थानीय अधिकांश राजनेताओं सहित अलगाववादियों की पूरी देशद्रोही जमात ने विचार का नाम देने का कोई प्रयास बाकी नहीं रखा


सच तो यह है कि इस वैश्विक समस्या को खाद-पानी देने का काम वही लोग करते हैं, जो एक खास की विचारधारा के स्तर पर मजबूत माने जाते हैं। यह वह तबका है, जो निर्दोषों पर खुद बंदूक नहीं उठाता। वह बंदूक उठाने वालों को प्रेरित करने के लिए जुबान हिलाता है। कलम चलाता है। कम्प्यूटर के वह बटन दबाता है, जिनसे देश-विरोधी गतिविधियों को जायज ठहराये जाने वाले ट्वीट पैदा होते हैं। ऐसी खरपतवार के रूप में आप मौजूदा समय में शेहला राशिद तथा कन्हैया कुमार को अपने बीच देख सकते हैं।


इनकी सोच का विश्लेषण कीजिए। आप साफ समझ जाएंगे कि इनका केवल और केवल एक मकसद इस मुल्क के खिलाफ उठने वाले हर कदम तथा आवाज का समर्थन करना है। दरअसल, यह एक सोची-समझी और दीर्घकालीन साजिश का हिस्सा है। यह कोशिश है उन लोगों के दिमाग में आतंकवाद को सकारात्मक स्वरूप देने की, जो बौद्धिक आतंक के माध्यम से आसानी से फुसलाये जा सकते हैं। यह संगठित अपराध इतने व्यापक स्तर पर संचालित हो रहा है कि उससे जुड़े सारे चेहरे पहचान पाना नामुमकिन हो चुका है।


वे आपको दिल्ली के लुटियंस जोन में दिख जाएंगे। किसी राष्ट्रीय न्यूज चैनल के मुख्य पद पर आसीन नजर आएंगे। बॉलीवुड भी उनसे अछूता नहीं है और कई कॉफी हाउस के रोजाना वाले बैठकधर्मियों में से भी आप कई को इसी स्वरूप का पा सकते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तो खैर ऐसे कई महानुभावों की वैचारिक जन्मस्थली में तब्दील हो ही चुका है।


इस तबके में वह लोग भी हैं, जो अदालत द्वारा दोष सिद्ध किसी आतंकवादी की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवाते हैं और वह चेहरे भी इनका अहम हिस्सा हैं, जो म्यांमार की दुर्दशा से बखूबी वाकिफ होने के बावजूद इस बात की पैरवी करते हैं कि रोहिंग्या शरणार्थियों को देश से बाहर न किया जाए। ऐसे वैचारिक आतंकवादियों की जीती-जागती मिसाल में यदि आप अरुंधति राय को पा सकते हैं तो इनकी मर-खप चुकी पौध के तौर पर आप गिरीश कर्नाड या गौरी लंकेश को याद करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। बेहद अफसोस की बात यह कि ज्ञान एवं तर्क की क्षमता के बेहद धनी ऐसे लोग अपने इन गुणों का इस्तेमाल आतंकवाद को प्रोत्साहन देने के लिए कर रहे हैं। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि गुणी तो रावण भी था, जिसके ज्ञान के गलत इस्तेमाल के चलते उसे अंतत: अकाल मृत्यु का वरण करना पड़ गया।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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