क्या गोड़से के अलावा और किसी हत्यारे को नहीं देखा हमने



आज इस स्तंभ को पढ़ने वालों से प्रतिक्रिया में एक सवाल का जवाब चाहिए। क्या हरेक मनुष्य की हत्या वाले अपराध की गंभीरता समान होती है या फिर विशिष्ट श्रेणी वाले किसी शख्स को खत्म करने का मामला बाकियों से अधिक गंभीर हो जाता है? तो बात शुरू करें। भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर आरोप है कि उन्होंने एक बार फिर राष्ट्रपिता का सम्मान प्राप्त गांधी जी की हत्या करने वाले नाथुराम गोडसे को संसद में देशभक्त कहा है। मामला संजीदा है। कांग्रेस से गांधी को छीनने के प्रयास में लगी भाजपा की फजीहत वाला है। इसलिए हुआ यह कि बवाल मचते ही साध्वी की रक्षा मंत्रालय वाली समिति से छुट्टी कर दी गयी और पार्टी ने संसदीय दल की बैठक में उनके शामिल होने पर रोक लगा दी। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है। गांधी बनाम गोडसे वाली। मैं जो कुछ आज लिखने जा रहा हूं उसका इस बहस से कोई लेना देना नहीं है। मैं आज बस सवाल करने के मूड में हूं। मेरा सवाल यह कि क्या केवल और केवल गांधी जी के हत्यारे का ही महिमामंडन किया जाना गलत है? अफजल गुरू भी हत्यारा था। गोडसे की ही तरह उसे इस देश की अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन गुरू का जमकर महिमामंडन किया गया


इसकी अगुआई के आरोपी कन्हैया कुमार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी बना दिया। जो कांग्रेस साध्वी प्रज्ञा को पानी पी-पीकर कोस रही है, उसी पार्टी के भोपाल से लोकसभा उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने तो कन्हैया को बकायदा अपने प्रचार के लिए यहां आमंत्रित कर लिया था। हालांकि फिर कन्हैया तो नहीं आया लेकिन उसके कई संगी साथी दिग्विजय सिंह के प्रचार के लिए भोपाल आए। क्यों नहीं ऐसा हुआ कि साध्वी की ही तरह कन्हैया को भी किसी हत्यारे की पैरवी करने के चलते बहिष्कृत किया जा रहा है। यदि हमारे दिल में गांधी जी के लिए सम्मान है तो यही भाव दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए भी है। क्या राजीव के वंशज होने का दावा करने वाले इस बात का जवाब दे पाएंगे कि क्यों तमिलनाडु की जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों की रिहाई करने वाली द्रमुक से वे समर्थन ले-दे रहे हैं? यहां भी तो सीधा-सीधा मामला कातिलों की पैरवी करने का है? शहीदे-आजम भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वालों में मरहूम खुशवंत सिंह के पिता भी थे। सोभा सिंह की निशानदेही भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त की अंग्रेजों के न्याय के नाम पर हत्या का सबब बनी। ये दोनों देश की खातिर मारे गये।


फिर ऐसा क्यों हुआ कि सोभा सिंह को इस हत्या का सहभागी नहीं कहा जाता है। क्यों ऐसा हुआ कि पंजाब में दुर्दांत हत्यारे भिंडरवाले को मारने के लिए चले आॅपरेशन ब्लू स्टार के खिलाफ खुशवंत सिंह ने पद्मभूषण सम्मान वापस कर दिया, लेकिन उन पर साध्वी प्रज्ञा की तरह हमले नहीं किये गए। केंद्र में अपनी मजबूत पकड़ के समय मुलायम सिंह यादव ने बेहमई हत्याकांड की सरगना फूलन देवी को संसद तक पहुंचा दिया। लालू प्रसाद यादव ने हत्यारे पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को हमेशा से ही पुत्रवत स्नेह दिया है। यूपी में अतीक अहमद जैसे दुर्दांत कातिल राजनीतिज्ञों की खासी पसंद रहे हैं। इन्हें राजनीतिक प्रश्रय देने वालों में मायावती भी शामिल हैं। जरा-सा पीछे जाइए। याद कीजिए अभिनेता नसीरूद्दीन शाह, राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा, वकील राम जेठमलानी, मणि शंकर अय्यर (कांग्रेस), मजीद मेनन (एनसीपी), सीताराम येचुरी (सीपीएम), डी राजा (सीपीआई), केटी एस तुलसी और एचके दुआ (तत्कालीन मनोनीत सांसद), प्रकाश करात (सीपीएम) आदि को। ये चालीस लोगों के उस समूह का हिस्सा थे, जिन्होंने मुंबई बम धमाकों के लिए अदालत द्वारा दोषी सिद्ध याकूब मेनन की फांसी रुकवाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगायी थी।


ऐसी कोशिशों के चलते ही आधी रात को देश की सबसे बड़ी अदालत खोली गयी। मेनन तो फांसी पर लटका दिया गया, लेकिन इस हत्यारे की पैरवी करना क्या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के कृत्य से कम कहा जा सकता है? यदि आजाद भारत के पहले आतंकवादी नाथुराम गोडसे का सम्मान करना गुनाह है तो यकीनन हत्यारों के सरगनाओं में शामिल ओसामा बिन लादेन को 'ओसामाजी' तथा पाकिस्तान में पल रहे मुंबई 26/11 हमले के साजिशकर्ता हाफिज सईद को 'हाफिज साहब' कहने के कृत्य क्यों नहीं गुनाह माना जाना चाहिए? पिछले करीब दो दशक के विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों से जुड़ी खबरें उठाकर पढ़ लीजिए। शायद ही कोई समय ऐसा हो, जब हर राजनीतिक दल ने आपराधिक छवि वालों को उम्मीदवार न बनाया हो। इनमें हत्या जैसे अपराध के आरोपी भी शमिल हैं। बेशर्मी का कवच यह कि 'इन्हें अदालत द्वारा अब तक दोष सिद्ध नहीं किया गया है,' की बात कहकर ऐसे लोगों का बचाव किया जाता है। प्रज्ञा ठाकुर भी इनमें से एक है।


सारा जीवन अहिंसा तथा सत्य के लिए लड़े मोहनदास करमचंद गांधी के लिए विलाप करने वाले इन राजनीतिक दलों से पूछना चाहिए कि क्या सवा अरब की आबादी में इतना बड़ा अकाल है कि दागदार व्यक्ति को पार्टी का प्रत्याशी बनाना पड़ रहा है? क्या यह सारी करतूत एक तरह से अपराध का समर्थन करने वाली नहीं है? आज एक खबर पढ़ी। किसी वेब सीरीज में माफिया सरगना और दुर्दांत हत्यारे दाउद इब्राहिम के तथाकथित मानवीय पक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे। बताया जाएगा कि किस तरह भीषण गरीबी के चलते वह अपराध की दुनिया में आ गया। राजकुमार हिरानी भी ऐसी एक करतूत कर चुके हैं। संजय दत्त को देश की अदालत ने उन लोगों का सहयोगी पाया था, जो हत्यारे हैं। दत्त को इसके लिए सजा सुनायी गयी। हिरानी ने 'संजू' नामक फिल्म बनाकर यह स्थापित करने की कोशिश की कि किस तरह एक मासूम शख्स जाने-अनजाने उस कदम का हिस्सा बन गया, जो वस्तुत: किसी अपराध की नीयत से उठाया ही नहीं गया था। जब आप इस तरह के कृत्य को आंख मूंदकर मंजूरी दे रहे हैं तो फिर किस हक से साध्वी प्रज्ञा का विरोध कर सकते हैं? गांधी जी की हत्या निश्चित ही निंदनीय कृत्य था। गांधी के विचारों से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन सदी के सबसे बड़े जननायक के हत्यारे को कैसे कोई देशभक्त ठहरा सकता है। गोडसे को देशभक्त बताना गलत है। लेकिन ढेर सारे हत्यारों को खुलकर दिए जा रहे समर्थन के बीच केवल इस एक घटनाक्रम पर इतना बवाल कई सवाल उठाता है। हत्यारा, हत्यारा होता है। उसका शिकार, शिकार ही होता है। फिर कैसे किसी एक हत्या के मामले में हम कानून के रखवाले बन जाते हैं और कैसे सामूहिक हत्याओं के सिलसिलों को हम यूं देखते हैं, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। इसलिए मैं सीधी बात पूछ रहा हूं, क्या इस देश ने 30 जनवरी, 1948 से पहले और बाद में एक भी हत्यारे को नहीं देखा है?

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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