कांटे से कांटा निकालने का खेल



तो आखिर दिग्विजय सिंह और उमंग सिंघार की मुलाकात नहीं हो पाई। लगे हाथ दिग्विजय सिंह को यह बताने का मौका भी मिल गया कि उन्हें उम्र के इस दौर में भी डायबिटीज नहीं है। ऐसी नामाकूल बीमारी दिग्विजय सिंह के दुश्मनों को हो। उन्होंने कहा कि मैं तो मीठी चाय पिता हूं। अच्छा भी है। डायबिडीज जैसी बीमारी परहेज का बखेड़ा खड़ा कर देती है। दिग्विजय सिंह के पास वैसे ही सांस लेने की फुर्सत नहीं है। वे घोर सनातनधर्मी है। हिन्दुओं और हिन्दूत्व से उनकी अपनी एक अलग लड़ाई है। उनके अपने परहेज वैसे भी कम नहीं हैं। उन्हें भाजपा और आरएसएस से जबरदस्त परहेज है। नरेन्द्र मोदी से है। पार्टी के अपने पंगे हैं। प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस की वापसी से यह और बढ़ गए हैं


अब ऐसा शख्स कड़वी चाय पीकर करेगा भी क्या। लिहाजा, उन्होंने सिंघार के साथ अपने पूरे विवाद को सोनिया गांधी और कमलनाथ पर छोड़ दिया है। इस आशय के साथ कि पार्टी में किसी भी तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। और जो अनुशासनहीनता करें, उसके खिलाफ सख्ता कार्रवाई होना चाहिए। पर अब इसका क्या किया जा सकता है कि उमंग सिंधार ने फिर ट्विट कर दिया कि यह बात तो सभी पर समान रूप से लागू होती है। उमंग की जितनी उम्र नहीं है, उससे ज्यादा की दिग्विजय सिंह की राजनीति हो गई है। इसलिए कहां धैर्य और सब्र से काम लेना है, वे बेहतर जानते हैं। सिंघार प्रदेश के वन मंत्री हैं। शकर जंगल में पैदा नहीं होती। वह खेत में लगे गन्ने से बनायी जाती है।


दिग्विजय बेहद घाघ राजनीतिज्ञ हैं। ऐसे लोग डायबिटीज लेते नहीं, बल्कि दूसरों को देते हैं। सियासी वन में तब्दील हो चुके प्रदेश में सिंघार किसी युवा शेर की तरह दहाड़ रहे हैं तो सिंह इसी प्रजाति के बुजुर्ग की भांति पूरी शांति के साथ बैठे हैं। लेकिन उनकी निगाह सिंघार से हट नहं रही। ठीक उसी तरह, जिस तरह जंगल में आखेट के समय शेर अपने शिकार से नजर नहीं हटाता है। चुपचाप उसकी ओर सरक कर उसे निशाना बना लेता है। शिकार बनने और करने, दोनो मामलों में सिंघार का बायोडाटा अभी खाली है। दिग्विजय सिंह ने आज कहा कि पचास सालों में वे बहुत से हमले देख चुके हैं।


जाहिर है, कमलनाथ और कांग्रेस की सरकार को ये तलवार की नोक वाला बहुमत नहीं मिला होता तो शायद फिर उमंग को जवानी की उमंग और बुजुर्गीयत के धैर्य का अंतर पता चलता। इधर, अच्छे-अच्छों को सियासी निवाला बनाने के दृष्टिकोण से सिंह की कर्म कुंडली तमाम प्रहसनों से रंगी हुई है। इसलिए यह तय है कि दोनो पक्षों के बीच सफेद रुमाल लहराये जाने की संभावना फिलहाल नहीं है। जीत और हार का फैसला समय ही करेगा। तब तक यह घमासान देखना बेहद रोचक एवं यादगार अनुभव बन जाना तय है। सबसे शानदार भूमिका कमलनाथ की है। कसम से जर्मन साम्राज्य के प्रथम चासंलर बिस्मार्क की कूटनीति को भी पीछे छोड़ दिया है नाथ ने।


बिस्मार्क के बारे में कहा जाता है कि वह दो राज्य अपने हाथ में रखता था और दो को हवा में उछाले रहता। नाथ के एक हाथ में मुख्यमंत्री तो दूसरे में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद है। हवा में कभी दिग्विजय/ गोविंद सिंह या ज्योतिरादित्य सिंधिया/उमंग सिंघार उछल रहे हैं। 'मकबूल' फिल्म में दो पुलिस वाले हैं। जो परस्पर विरोधी गुटो में से कभी एक तो कभी दूसरे का समर्थन कर देते हैं। वे इसे आग और पानी का संतुलन बनाये रखने जैसा जरूरी मानते हैं। राज्य के मौजूदा हालात पर नाथ का रुख देखकर यही लगता है कि अपने लम्बे सियासी अनुभव के आधार पर यह शख्स भी आग और पानी का संतुलन बनाये रखने की नीति पर पूरी सावधानी से चल रहा है। फिलहाल उनका यह रास्ता निरापद दिखता है, क्योंकि रास्ते के सारे कांटे तो फिलहाल एक-दूसरे के ही बदन को छेद देने के जतन में जुटे हुए हैं। यहां 'कांटे से कांटा' निकालना वाली लोकोक्ति को मत भूलियेगा। इसकी व्याख्या करने की पृथक से जरूरत नहीं।

loading...

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति