जोखिम भरा दिग्विजयी निर्णय



वाह! इसे कहते हैं अपनी ही राख से नई जिंदगी की शुरूआत। दिग्विजय सिंह कांग्रेस वर्किंग कमेटी में स्थाई आमंत्रित सदस्य बना दिए गए हैं। जरा पहले ही वह सोनिया गांधी की एक समिति में भी जगह पा गए थे। यह समिति केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए गठित की गई है। तो जो दिग्विजय सिंह कांग्रेस की आला राजनीति में रिटायरमेंट की स्थिति पर पहुंच गए माने जा रहे थे, वे अब फिर नई ऊर्जा के साथ सामने हैं। पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक और शक्तिशाली संस्था में स्थाई आमंत्रित सदस्य बनाया जाना उनके कद में और इजाफा करने वाला निर्णय ही माना जा सकता है। वैसे दिग्विजय सिंह का जैसा राजनीतिक कद है, उसमें यह कोई मायने नहीं रखता


दिग्विजय की एक खासियत निर्विवाद है। उनके विरोधी भी इस बात पर सहमत हैं कि बीजेपी और संघ के खिलाफ सोच के मामले में वह कभी भी अपने विचार और कथन से पीछे नहीं हटे। खुलकर और कोई भी मौका गंवाए बगैर इनका पूरी ताकत से विरोध किया। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री बनने से लेकर कांग्रेस महासचिव और उत्तरप्रदेश सहित आंध्र प्रदेश, असम और गोवा का प्रभारी बनाए जाने के बीच उनके ऐसे सुरों में कभी भी कमी नहीं देखी गई। वह भी तब, जबकि कई मौकों पर संघ या हिंदुत्व के विरोध में दिग्विजय के किसी बयान पर खुद उनकी पार्टी ने उन्हें अकेला छोड़ दिया।


राज्य के बीते विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने मंदसौर की सभा में मंच के नीचे मौजूद दिग्विजय का नाम तक नहीं लिया था। पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें चुनाव से जुड़ी कोई अहम जिम्मेदारी देने के लायक भी नहीं समझा था। मगर दिग्विजय थे कि स्वयं के द्वारा तय किये गए 'पंगत पे संगत' कार्यक्रम के जरिए साक्रिय बने रहे, उनका यह प्रयास बहुत कामयाब भी रहा। प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में अगर आई तो ज्योतिरादित्य सिंधिया के आकर्षण और दिग्विजय की जमीनी राजनीतिक समझ उसका एक बड़ा कारण थे। तो दो बातें तय हैं।


दिग्विजय का पार्टी के प्रति समर्पण और नरेन्द्र मोदी सरकार, बीजेपी सहित आरएसएस और हिंदुत्व के लिए विरोध किसी भी परिस्थिति में कम नहीं हुआ है। इन दो में से ही कोई एक वजह हो सकती है कि उन्हें पहले सोनिया ने सरकार के निर्णयों पर निगरानी के लिए गठित समिति में जगह दी और अब कार्यसमिति में जगह मिल गई है। लेकिन पार्टी ने ऐसा करके बड़ा जोखिम भी उठाया है। दिग्विजय के उन तेवरों के जरा भी कम होने की संभावना नहीं है, जिनके चलते वह कांग्रेस को रह-रहकर हिन्दू-विरोधी पार्टी की तोहमत के दायरे में ला देते हैं। पिछले दिनों सिंह ने अपनी इस पहचान को बदलने की कोशिश भी की। नर्मदा की कठिन परिक्रमा कर आए। खुद को सनातनी धर्मी वे हमेशा कहते रहे हैं।


मगर इन तमाम जतन के बावजूद दिग्विजय का जिक्र होते ही उन्हें नकली धर्मनिरपेक्ष कह दिया जाता है। तो देखने वाली बात यह यह हो सकती है कि सिंह के इस ट्रैक रिकॉर्ड और उस पर कायम रहने की पूरी संभावना के बीच कांग्रेस किस तरह उनका सदुपयोग कर पाती है. वैसे एक बात और निर्विवाद है। सिंह का कद और तजुर्बा इतना ज्यादा है कि वह कार्यसमिति और पार्टी में किसी बड़े ओहदे के हकदार हैं। पार्टी में आज मौजूद कई स्थापित नेताओं से उनका कद और समझ बहुत ज्यादा है। खासकर हिंदी बेल्ट में तो जमीनी और संगठन की समझ रखने वाला उन जैसा महत्वपूर्ण नेता पार्टी के पास और कोई है ही नहीं। इस लिहाज से बिहार विधानसभा चुनाव के लिए वे एसेट साबित हो सकते हैं। लेकिन बात फिर वही आ जाती है। दिग्विजय को कहीं भाजपा और संघ ने उकसाया और वो कुछ ऐसा कह गुजरे, जिससे पार्टी को फिर किनारा करना पड़ जाए तो इतने अनुभवी चेहरे से कांग्रेस को लाभ की बजाय नुकसान ही उठाना पडेगा। सचमुच सोनिया गांधी के इस 'दिग्विजयी' निर्णय में भारी जोखिम भी छिपा हुआ है।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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