जिसने पाप ना किया हो, जो पापी ना हो....



ये किस्सा बिल्कुल रंगे सियार जैसा है। रंगा सियार एक बार जंगल का राजा तो बन सकता है लेकिन अपनी पहचान भला कौन, कब और कहां तक छिपा सकता है? दुर्गति की शिकार कांग्रेस के हाल भी कुछ ऐसे ही हैं। वो अपने को नए कलेवर में रंगने की कोशिश कर रही है लेकिन यह भूलकर कि हिन्दूस्तान की रग-रग कांग्रेस को बहुत अच्छे से पहचानती है। आखिर जिसे बेहतर विकल्पों के अभाव में देश ने पांच दशक तक कभी मन से कभी बेमन से मौका दिया है उसका देश से भला क्या छिपा हो सकता है। फिर भी राहुल गांधी जो व्यवहार कर रहे हैं, वो सियार को रंगने के जैसा ही है। गांधी जयंती पर कांग्रेस कार्यसमिति में जो कहा, सुना गया और अभी गुजरात में उत्तर भारतीयों के साथ जो व्यवहार हुआ है, उसका आपस में क्या तारतम्य हो सकता है? गुजरात में उत्तर भारतीयों से हुए ताजा व्यवहार के छींटे कांग्रेस पर भी पड़ रहे हैं। आरोप, कांग्रेस भाजपा पर भी लगा रही है। लेकिन अगर इस बात पर विचार करेंगे कि इस सारे घटनाक्रम का फायदा किसके खाते में जा सकता है और नुकसान किसे होगा? तो दो और दो जोड़कर चार जैसा सरल नतीजा निकालना यहां भी आसान है


 गुजरात के ताजा घटनाक्रम से भाजपा को कोई फायदा नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार देश के इन दो बड़े राज्यों में उसे पिछले लोकसभा चुनाव में सिर माथे बैठाया गया है। दोनों राज्यों में वह सरकार में है। जहां अगले छह सात महीने बाद अगर केन्द्र में सरकार बनानी है तो फिर वहीं मत्था टेकना है। ऐसे में गुजरात में उत्तर भारतीयों के साथ भाजपा की अगुवाई में क्या यह व्यवहार संभव है? गुजरात इस समय केवल एक राज्य नहीं है। गुजरात का मतलब मोदी और अमित शाह की पहचान से भी है। अब इस घटनाक्रम का फायदा किसे मिल सकता है और कहां मिल सकता है, इस सवाल पर गौर करने से पहले थोड़ा फ्लेशबेक में जाकर 2 अक्टूबर को हुई कांगे्रस कार्यसमिति में कहे सुने पर नजर डाल लें। महाराष्ट्र के वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस ने एक नए स्वतंत्रता संग्राम की शुरूआत मोदी सरकार के खिलाफ करने का एलान किया। कांग्रेस ने आरोप ये लगाया कि मोदी सरकार नफरत और भय फैलाने के साथ प्रतिशोध की राजनीति करती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, दो तरह की विचारधाराएं गांधी जयंती मना रही हैं।


एक कांग्रेस है, जिसके दिल में गांधी हैं और दूसरी तरफ गोडसे की विचारधारा है जो राजनीतिक फायदे के लिए गांधी के सामने झुकती है, लेकिन यह सिर्फ वोट पाने के लिए है। बीजेपी-आरएसएस महात्मा गांधी को अपनाने का ढोंग कर रही है। कांग्रेस ने गांधी चिंतन और गांधी विचार इन दोनों चीजों को आत्मसात करने का फैसला लिया गया है। बीजेपी बापू के चश्मे को प्रचार के लिए उधार तो ले सकती है, लेकिन उसे आत्मसात नहीं कर सकती। हम ऐसी ताकतों को बेनकाब करेंगे। हम उन ताकतों को हराएंगे जो देशवासियों की आवाजों को दबा रही हैं।  तो मोदी सरकार पर भय और नफरत फैलाने के ये आरोप नए नहीं है। पर ताजा आरोपों के संदर्भ में भी गुजरात घटनाक्रम का फायदा कांग्रेस के खाते में ही जाता दिख रहा है। सामने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। इसलिए अगर कांग्रेस को फायदा हो रहा है तो यह मान लेना चाहिए कि गुजरात के ताजा घटनाक्रम के पीछे निश्चित तौर पर कांग्रेस और उसके विधायक अल्पेश ठाकोर और उनकी सेना का हाथ है। गुजरात में भाजपा की सरकार है इसलिए उसके हिस्से में सफाई देना और पलायन कर रहे लोगों को सुरक्षा देने का दायित्व है।


और जो पलायन कर रहे हैं वे हिन्दू भी हैं तो मान ही लेना चाहिए कि इसमें भाजपा का तो हाथ होने से रहा। हां, अल्पसंख्यकों का पलायन हो रहा होता तो माना जा सकता था कि इस सब के पीछे भाजपा या आरएसएस है। अब फिर लौट कर कांग्रेस कार्यसमिति पर आएं। फिर राहुल गांधी की बात पर विचार करें, कांग्रेस के दिल में गांधी हैं। और कांग्रेस ने गांधी चिंतन और विचार को आत्मसात करने का फैसला किया है। पहली नजर में तो यह मान ही लें कि राहुल की कांग्रेस में कम से कम मोहनदास करमचंद गांधी की कांग्रेस का तो अंश भी बाकी नहीं है। और ये जो दूसरा स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने का दावा कर रहे हैं, वे पहले इस पर गौर करें कि जो कांग्रेस देश से अंग्रेजों को भगा सकती थी आखिर उसके पांच दशक के राज में अगर साम्प्रदायिक शक्तियां देश पर हावी हो गर्इं है तो इसका दोषी कौन है? जो कांगे्रेस मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व में पूरे देश को एक करके अंग्रेजों को देश छोड़ने पर विवश कर सकती थी, वो कथित साम्प्रदायित शक्तियों से ऐसी कैसी हारी कि दो अंकों पर सिमट गई।


मोदी सरकार पर नफरत और भय फैलाने के साथ प्रतिशोध की राजनीति करने का आरोप लगाते समय कांग्रेस को कम से कम 1984 के सिख विरोधी दंगों को भी याद करना चाहिए था या नहीं? या कांग्रेस को इस पर विचार करना चाहिए या नहीं कि आखिर स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत में मिले उसके परम्परागत समर्थक देश के गरीब, दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक आखिर उससे दूर कैसे हुए? कांग्रेस ने इनका भरोसा कैसे खोया? क्यों उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे देश के  दो बड़े राज्यों में जो दलित, गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की बहुलता वाले राज्य हैं, वहां की सत्ता से वो पिछले तीन दशक से बाहर है? कांग्रेस अगर इन सवालों पर गौर करने के बाद मोदी सरकार पर ये आरोप लगाएगी तो उसे खुद समझ में आएगा कि इन तमाम हालात के बाद देश आज उस पर भरोसा करने को तैयार क्यों नहीं है? आखिर रंगे सियारों पर तो उनकी खुद की कौम ने भरोसा नहीं किया था। कांग्रेस के मौजूदा हालात पर तो राजेश खन्ना की रोटी फिल्म का यह गाना भी फीट बैठ रहा है, यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो, जिसने पाप ना किया हो जो पापी ना हो। तो अच्छा यह है दुर्दिनों को बदलने के लिए भाजपा के पाप गिनाने से पहले कांग्रेस खुद के गिरेहबान में भी झांक लें। राजनीति के हमाम की सचाई देश से छिपी तो नहीं है। क्या आगे यह लिखना जरूरी है कि सब नंगे हैं।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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