हाथरस का ये वीभत्स रस



हाथरस के नाम पर दिख रहा वीभत्स रस परेशान करने वाला है। नि:संदेह वहां उन्नीस वर्षीय पीड़िता के साथ जो कुछ हुआ, वह दहला देने वाला है। लेकिन अब आगे जो-जो और हो रहा है, वह भी कम चिंता की बात नहीं। इस मामले ने पूरे माहौल को एक अजीब उथलपुथल से भर दिया है। जो पीड़ित परिवार कल तक मामले को दबाने जैसे संगीन आरोप लगा रहा था, वही अब इसकी सीबीआई जांच से पीछे हट गया है। जो खबरिया चैनल दो दिन पहले तक इस प्रकरण की तह तक जाने के दावे चीख-चीख कर कर रहे थे, वह अब इस खबर को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोपों की बैसाखी पर झूल रहे हैं। मानो, उनके पास बताने को कुछ था ही नहीं। वे केवल माइक लेकर गरजना चाह रहे थे। टीआरपी के खेल में मगन थे


इधर सियासी दलों की तो बात ही क्या की जाए! पीड़ित परिवार को राहत या न्याय दिलाने से ज्यादा उनकी रूचि इस बात में दिख रही है कि कैसे भी हो इस सबका इस्तेमाल समाज को बांट कर अपना-अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए किया जा सके। दरअसल जब अलग-अलग अजेंडे वाला मामला हो तो किसी निहायत जरूरी प्रक्रिया का भी वही बुरा हश्र होता है, जो हाथरस मामले में होता दिख रहा है। उस वेबसाइट की ही बात लीजिए, जिसमें छेड़छाड़ कर यूपी के आला नेताओं के हवाले से झूठे और भड़काऊ बयान दिखाए गए। राहुल गांधी या प्रियंका वाड्रा की पीड़ित परिवार के प्रति सदाशयता पर संदेह का कोई कारण नहीं है। लेकिन राजस्थान में भी हुई ऐसी ही वारदात से उनका आंख मूंद लेना उनकी नीयत पर सवाल तो खड़े करता ही है।


वैसे अगर प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में पार्टी को खड़ा करने की कोशिश कर रहीं है तो उनका विरोध प्रर्दशन राजनीतिक तौर पर एक ठीक फैसला है। चौथे-पांचवें नंबर की पार्टी बन चुकी कांग्रेस को खड़ा होने के लिए इस सब की जरूरत है। लेकिन गांधी परिवार का को महिला उत्पीड़न के मामले में दौहरा रवैया भी नहीं अपनाना चाहिए। गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत पर राहुल और प्रियंका सरकार पर हमलावर रहे, ठीक उसी समय कांग्रेस शासित राजस्थान में बच्चो की अकाल मौत पर इन दोनों ने चुप्पी साध ली थी। मीडिया हो या सोशल मीडिया, हाथरस को लेकर घोर गैर-जिम्मेदार रवैया दिखा रहे हैं। एक रिपोर्टर चीखती है कि उसने ही पीड़िता के गांव तक जाने का रास्ता खुलवाया।


खबर सुनकर एकबारगी यह भ्रम हो गया कि कहीं खुद हाथरस का जिला प्रशासन ही तो उस चैनल में रिपोर्टर नहीं बन गया है। क्योंकि प्रतिबन्ध हटाने की ताकत तो जिला प्रशासन के पास ही होती है। और सोशल मीडिया के पहलवानों की तो क्या बात की जाए। एक लिखते हैं कि यदि मामले के आरोपी ब्राह्मण होते तो योगी सरकार अब तक उनके शरीर में लोहा उतार चुकी होती। एक अन्य का ख्याल है कि यदि आरोपी मुस्लिम होते तो एक वर्ग विशेष ने इस घटना को लेकर कानून हाथ में ले लिया होता। जरा सोचिए कि कितनी विभाजक सोच के संवाहक हैं ऐसे लोग। हालांकि जो राजनीति और गठजोड़ बनाने की कोशिश इस समय उत्तरप्रदेश में हो रही है, वो एक बड़ी साजिश का हिस्सा भी हो सकता है। सामाजिक समरसता की कोशिशों को इस राजनीति से नुकसान ही होगा।


ऐसे समय पर एक जघन्य वारदात से जुड़े लोगों को जाति या संप्रदाय से जोड़ना बेहद निंदनीय है। होना यह चाहिए कि ऐसी वारदात में शामिल लोगों को फास्ट ट्रैक कोर्ट के सामने लाया जाए। अपराध साबित होते ही जल्दी उनकी फांसी का बंदोबस्त हो, मगर ऐसा हो नहीं रहा है। इस वारदात को लेकर हो-हल्ला मचाने वालों की ऐसी नीयत है ही नहीं। वे बस हल्ला मचाने के भूखे दिखते हैं। और या फिर उनकी यही कोशिश दिखती है कि मामले की आग में अधिक से अधिक घी डालकर आनंद लिया जाए। क्यों कोई यह सवाल नहीं उठा रहा कि देश में बलात्कारियों को फांसी की सजा देने के कानून के बावजूद इस सजा पर अमल वाले मामले अंगुलियों पर गिने जाने लायक भी सामने नहीं आ रहे हैं? महिलाओं के प्रति कु्रर अपराधों के मामले में ऐसा दबाव बनाने ही होंगे। ऐसे मामले में जितनी कठोर सजा का प्रतिशत बढ़ेगा, उतना ही ज्यादा खौफ अपराधियों के भीतर पनप सकेगा। हाथरस की पीड़िता को इंसाफ मिलना ही चाहिए। इस मामले को लेकर वैसे ही कई खांचों में बंटे समाज को और तोड़ने जैसी क्षुद्र स्वार्थी हरकतों को भी हतोत्साहित किया जाना चाहिए।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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