हार नहीं मानूंगा का उथला संस्करण....



हर शोकसभा में एक न एक शख्स ऐसा जरूर होता है, जो दुख के माहौल में भी अपनी हरकतों से यह जता देता है कि वह चुटकुला सुनाने की अपनी आदत से बाज नहीं आ पा रहा है। अब है तो वह हमारी आपकी तरह इंसान ही। इसलिए वह भी अपनी प्रवृत्ति के आगे कमजोर है। उसके जज्बात न चाहते हुए भी छलक जाते हैं। इसलिए वह, 'और लकड़ी लगाओ, तब मुर्दा मस्त जलेगा' या, 'फलाने चंद जी की शोकसभा की तो रौनक ही अलग थी, यहां वो बात नजर नहीं आ रही है।' जैसी बातें कह ही गुजरता है। तो ऐसी प्रवृति का प्रसार कोरोना से भी अधिक भयावह गति से होता चला आ रहा है। ऐसे ही भाई लोग आपको शौकसभा (जी हां 'शौक' ही लिखा है) वाली मानसिकता में लिपटे हुए मिल जाएंगे


इनमें ही शामिल हैं वे, जिन्होंने कभी उरी तो कभी बालाकोट के जवाब में भारत की वीर सेना द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक की सच्चाई पर सवालिया निशान लगाए थे। दरअसल ये वे लोग थे, जिन्हें ऐसे ऊटपटांग क्रियाकलाप का शौक है। जो नरेंद्र मोदी के फोबिया से विचित्र तरीके से ग्रस्त हैं। इसके लिए वे किसी भी हद तक गुजर सकते हैं। उन्हें मोदी का हर बात पर विरोध करने का शौक है। वह भी इतना कि यदि मोदी शौच करने के पारम्परिक तरीके की तारीफ करें तो ये लोग आपको शौचालय में शीर्षासन करते हुए 'हल्का' होने की कोशिश करते नजर आ सकते हैं। पूर्वाग्रह से ग्रस्त ऐसे कलयुगी हठयोगियों से एक सवाल पूछा जाना चाहिए। वह यह कि आगा हिलाली की स्वीकारोक्ति पर वे प्रतिक्रिया देने की हिम्मत जुटा पाएंगे या नहीं? हिलाली पाकिस्तान के पूर्व वरिष्ठ राजनयिक हैं।


उन्होंने माना है कि भारतीय सेना की फरवरी, 2019 की बालाकोट सर्जिकल एयर स्ट्राइक में पाकिस्तान में पल रहे 300 आतंकवादी मारे गए थे। इमरान खान सरकार के एक मंत्री भी कुछ समय पहले इसी आशय की बात पाकिस्तानी संसद में ही कबूल कर चुके हैं। लेकिन हिलाली या इन मंत्री की बात के बाद दोनों सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाले अब प्रतिक्रिया वाले परिदृश्य में नजर नहीं आएंगे। उन्हें दही की दुकान पर तलाशिए जहां वे आपको इस खाद्य पदार्थ को खरीदकर उसे अपने मुंह के भीतर जमाने की प्रक्रिया से दो-चार होते नजर आ सकते हैं। ताकि कुछ भी बोलने से बचा जा सके। मगर देश तो बोल और सुन रहा है। उसे बखूबी याद है कि कैसे सेना के शौर्य को सियासत की दागदार तराजू पर तौलने के इन लोगों ने क्या प्रयास किये थे।


वो अरविन्द केजरीवाल, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे थे, और वो दिग्विजय सिंह, जो बालाकोट आतंकी हमले को 'हादसा' मानते हैं, ये सभी जनता के सामने सच्चाई के हमाम में नंगे हो चुके हैं। लेकिन ऐसे लोग सुधरेंगे नहीं। उनसे असहमत लोगों की यह आशा और सहमति वाले लोगों की आशंका, दोनों ही सिरे से नकारेंगे। क्योंकि वे नए-नए सेक्टर्स में अपनी इस प्रतिभा का परिचय देते जाएंगे। 'हार नहीं मानूंगा' टाइप की फीलिंग इस जमात पर पूरी तरफ फिट बैठती है। इसे कृपया अटलजी की कविता से मत जोड़िए। उन्होंने तो कहा था, 'हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं।' लेकिन इनके बस में नया गीत गाने की कूवत नहीं है। इसलिए वे नयी जगह फिर सक्रिय हो गए हैं। हांडी का एक चावल ही उठा लीजिए।


दिग्विजय सिंह ने कोरोना जैसी विभीषिका में भी राजनीतिक बघार लगाने का इंतजाम कर ही लिया है। वे सवाल उठा रहे हैं कि राजधानी में कोरोना की को-वैक्सीन का ट्रायल झुग्गी बस्ती में रहने वालों पर ही क्यों किया जा रहा है। सिंह के परिवार से तीन लोग जनसेवा की सतनामी चादर ओढ़कर राजनीति के घी में पांचो अंगुलियां डुबाये बैठे हैं। दिग्विजय सहित उनके चिरंजीव जयवर्द्धन सिंह और अनुज लक्ष्मण सिंह दिग्गजों की श्रेणी में गिने जाते हैं। लेकिन क्या इन तीनों में से एक ने भी खुद को को-वैक्सीन के ट्रायल के लिए प्रस्तुत करने की पेशकश की है? न ही इन विभूतियों में से किसी ने भी अभिजात्य वर्ग से इसके लिए कोई अपील ही की है। तो फिर, जो प्रक्रिया चल रही है, उसमें ये दुश्वारी पैदा करने की कोशिश भला क्यों की जाना चाहिए! निश्चित ही इस ट्रायल के लिए आगे न आने या जागरूकता का प्रसार न करने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, लेकिन सिंह से यह सवाल इसलिए उठाएं हैं कि वे खामखां एक मसले पर राजनीति का आवरण ओढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। अपनी राजनीतिक जमीन खोते जा रहे कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल ऐसा ही कुछ किसान आंदोलन में भी करने की कोशिश कर रहे हैं। यह अफसोसजनक है या दुर्भाग्य माना जाने लायक, इसका फैसला लोगों को खुद कर लेना चाहिए।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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