अलविदा सुषमाजी



मृत्यु भावहीन होती है। किंतु कल वह इस गर्व से भर गयी होगी कि सुषमा स्वराज ने उसका वरण किया है। व्यक्तित्व पर कभी झुर्रियां नहीं पड़ती हैं। लेकिन एक व्यक्त्वि यह जानकर झुर्रियों के जाल से घिर गया होगा कि उसके भीतर से स्वराज नामक आत्मा ने कूच कर लिया है। मानव अमर नहीं होता है। मगर मामला स्वराज जैसी महा-मानव का हो, तो कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व और कृतित्व सहित स्मृतियों के लिहाज से वह सदा के लिए अमर हो गयी हैं।  कल एक पल के लिए तो काल के पांव भी ठिठके होंगे


स्वराज के शरीर को प्राण-विहीन करने से पहले उसके हाथ भी थरथराए होंगे। क्योंकि उसे भी इस बात का अहसास हो गया होगा कि जिस माटी के पुतले को वह माटी बनाने जा रहा है, वह दरअसल ऐसे व्यक्तित्व का मामला है, जो खरे सोने से भरा हुआ था। मुझे तो हैरत है कि उस हृदय में किसी आघात को जगह कैसे मिल गयी, जो पूरी तरह भरा हुआ  था। जनसेवा के भाव से। लोगों के कल्याण की चिंता से। अपने कर्तव्य के प्रति जुझारूपन के जज्बे से।  मृत्यु अनंत सत्य है। स्वराज भी उसका अपवाद नहीं थीं।


किंतु खास बात यह कि जिस गरिमा के साथ उन्होंने सार्वजनिक जीवन जिया, उसी गरिमामयी अंदाज में इससे विदाई ली और उतने ही सम्माजनक भाव से नश्वर शरीर को त्याग दिया। स्वराज के जीवन का बही-खाता टटोल लीजिए। शायद ही कोई ऐसा हिसाब नजर आये, जिसमें उनके द्वारा किसी सही बात से इनकार करने का उदाहरण मौजूद हो। बमुश्किल कुछ ऐसा दिख पाए, जिसके लिए आप उन्हें गलत को गलत न कहने वाला बता सकें। सुषमा की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने राजनीति को उसके मूल धर्म यानी जनसेवा का पर्याय बना दिया।


विदेश मंत्री के तौर जितने लोगों की उन्होंने मदद की, उसका उदाहरण आजाद भारत के इतिहास में इससे पहले कहीं देखने को नहीं मिला। सच कहा जाए तो वह आशाओं का एक ऐसा पुंज बन गयी थीं, जिससे अनगिनत लोगों की आस्था खुद-ब-खुद जुड़ी और उनमें से शायद ही किसी को निराश होना पड़ा हो।  उनका स्मरण हमेशा ऐसे इंसान के तौर पर किया जाएगा, जिसने खुद के लिए, खुद के कर्म से, खुद के हृदय से और असंख्य लोगों की पूरी की गयी आशाओं से स्वयं को सच्चे एवं अनुकरणीय इंसान के तौर पर गढ़ा।


यह भावुकता नहीं, बल्कि मेरा विश्वास कह रहा है कि आने  वाले समय में यदि राजनीति के क्षेत्र में एक भी एकलव्य पैदा हुआ तो यकीनी तौर पर वह उस माटी की मूर्ति से ही खुद को ऐसा बना पाएगा, जिस मूर्ति को सुषमा स्वराज कहा जाएगा। विचारक मेल बू्रक ने लिखा था, ‘अमरता अच्छे कर्मों का एक सह-उत्पाद है।’ स्वराज भी अपने तमाम अच्छे कामों के चलते अमर रहेंगी। भारत वर्ष की राजनीति शायद ही कभी उस ऋण से मुक्त हो सके, जो स्वराज की बदौलत उसके खाते में आये। यकीनन यह बहुत शोक का समय है, किंतु वर्तमान पीढ़ी के लिए यह हमेशा फख्र की बात रहेगी कि उसने स्वराज को अपने बीच देखा। सच्ची जनसेवक के तौर पर और सच्चे इंसान की शक्ल में। विनम्र श्रद्धांजलि 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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