घोर असफल कमलनाथ



ये मैनेजर्स की पौध बड़ी गजब होती है। गीता हाथ में नहीं उठाती। लेकिन हलफ उठाते समय का आत्मविश्वास ऐसा कि उसके आगे अर्जुन को गीता का उपदेश देते कृष्ण भी फीके पड़ जाएं। इसी टिड्डी दल ने बीते लम्बे समय से राजनीति की खेती पर भी धावा बोल रखा है। नेताओं की इमेज ब्रांडिंग के नाम पर उन्हें जमकर बेवकूफ साबित किया जा रहा है, वह भी उसी नेता से ही पैसा लेकर। कमलनाथ को ही लीजिये। एक वीडियो की शक्ल में प्रदेश की जनता के सामने प्रकट हुए हैं। अंदाज 'कंस का अंत सुनिश्चित' टाइप का है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री का मुखारविंद देखते ही बनता है, लेकिन लाख कोशिश के बावजूद उनकी आवाज सुनायी नहीं देती है। खालिस सलीम-जावेद की शैली के संवाद


जनता के विश्वास को अपने लिए दही की तरह जमाये रखने और सत्ताधारी भाजपा के लिए फटे दूध की तरह ठहराने जैसी बातें। बातचीत में इतने लच्छे कि जो काम करना तो दूर, उनकी ईमानदार कोशिश तक नहीं की, उन्हें भी अपनी उपलब्धि बताकर गिना दिया। किसानों की कर्ज माफी के जिस वादे ने अंतत: फाइलों में ही दम तोड़ दिया, उसी मर्ज के इलाज का नाथ दावा कर रहे हैं। पंद्रह महीने के दौरान जिस मुख्यमंत्री ने राज्य मंत्रालय की दीवारों के भीतर खुद को समेटे रखा, वह पूरे वीडियो में जनता के बीच इधर से उधर जाता दिख रहा है।


यदि प्रदेश की जनता स्मृति विश्राम की शिकार होती तो यकीनन यह सब देखकर वह मान लेती कि उसने उस महान विभूति को असमय ही खो दिया, जो शायद मिस्टर इंडिया की तर्ज पर हमेशा उनके साथ तो रहा, लेकिन दुर्भाग्य से कभी दिख नहीं सका। लेकिन इस सबका हासिल आखिर क्या है? नाथ चले तो थे राज्य सरकार से जवाब मांगने, लेकिन खुद ही सवालों के लपेटे में आ गए।


जिस श्रीमुख से वह विश्वास हासिल करने की बात कर रहे हैं, क्या उसी मुंह से यह बता पाएंगे कि फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया का यकीन कायम रखने में वह क्यों नाकाम रहे? यदि वे इतना ही अच्छा शासन चला रहे थे तो आज तक एक भी ऐसा बेरोजगार क्यों नहीं सामने ला सके, जिसे उनके समय बेरोजगारी भत्ता दिया गया हो? भाजपा तो लगातार नाथ को ऐसा करने की चुनौती दे रही है, लेकिन कमलनाथ हैं कि कमल वाली पार्टी के इस सवाल पर कोई जवाब ही नहीं दे पा रहे हैं। वीडियो का बहुत मनोरंजक हिस्सा यह कि इसमें भी नाथ ने अंगड़ाई लेने तक का परिश्रम तक नहीं किया। पुराने फुटेज में उनको दिखा दिया गया। जो बात पूर्व मुख्यमंत्री को कहनी थी, उसके लिए भी किसी वॉइस ओव्हर वाले आर्टिस्ट की मदद ली गयी।


गौर करें, यदि इसी तरह का वीडियो शिवराज सिंह चौहान ने जारी किया होता तो क्या हिसाब रहता। निश्चित ही उसमें आपको खुद चौहान की आवाज सुनायी देती। यह लोकल कनेक्ट का ऐसा तरीका है, जो शिवराज की जनता के बीच लोकप्रियता में लगातार इजाफा करता है और जिसके अभाव में ही कमलनाथ मुख्यमंत्री बनने के बावजूद भीड़ के बीच का चेहरा नहीं बन सके थे। यदि सरकार चले जाने के बाद भी आप अपने एटीट्यूड को नहीं बदल सकते तो समझ लीजिये कि आपने भविष्य के लिए भी खुद की विफलताओं का दरवाजा आज भी खोल रखा है। प्रदेश से भाजपा सरकार की रुखसती के बाद वाले शिवराज का स्मरण कीजिए। उन्होंने वीडियो का सहारा नहीं लिया। यहां से वहा जनता के बीच 'टाइगर अभी जिंदा है' कहते हुए सक्रीय रहे। नतीजा, सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में आम लोग भी यह अफसोस जताने लगे थे कि उनकी सरकार क्यों फिर नहीं बन सकी। यह शिवराज का अपनी यूएसपी बनाये रखने का सफल तरीका था। यदि सिंधिया बगावत न करते, यदि फिर शिवराज सत्ता में नहीं लौटते, तब भी उनकी इन कोशिशों से उनका पलड़ा आम जनता के बीच भारी ही रहना था। लेकिन नाथ परछाइयों से बाहर आना नहीं जानते। मुख्यमंत्री रहते हुए वे मगरूरियत के अंधेरे में बैठे उजाला तलाशते रहे और अब सरकार छिन जाने के सदमे में आकंठ डूबे 'अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर उन पर भी कुछ डालो' जैसा रुदन करते दिख रहे हैं। वे पहले असफल साबित हुए और अब घोर असफल नजर आने लगे हैं।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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