गलत नहीं हैं सुरेंद्र नाथ सिंह



सुरेन्द्रनाथ सिंह को मैं पिछले तीस साल से बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। बेहद संघर्ष भरी राजनीति करते हुए मैंने उन्हें राजनीति में बहुत कुछ पाते और खोते देखा है। भोपाल के भाजपा संगठन में जैसी पकड़ सुरेन्द्रनाथ सिंह और भगवान दास सबनानी की देखी है, वैसा मुझे कोई दूसरा भाजपा जिलाध्यक्ष इन तीस सालों में नहीं दिखा है। लोगों के बीच मम्मा के नाम से जाने जाते रहे सुरेन्द्रनाथ सिंह ने संगठन पर कब्जे की लड़ाई में भोपाल भाजपा के दिग्गज नेताओं बाबूलाल गौर और लक्ष्मीनारायण शर्मा की जोड़ी को दो-दो बार पराजित कर अपना स्थान बनाया। बावजूद इसके मैं कह सकता हूं कि अगर शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बनते तो शायद सुरेन्द्रनाथ सिंह न कभी बीडीए अध्यक्ष बन पाते ना शायद विधायक ही। भोपाल भाजपा में आज के कई सारे नेता मम्मा के दौर की ही पैदाइश है। पर सुरेन्द्रनाथ गणेश परिक्रमा की राजनीति से बहुत दूर है, और आज की राजनीति में यह व्यवहार एक बुराई जैसा है। लिहाजा, सुरेन्द्रनाथ सिंह में आज जो कुछ भी राजनीतिक ताकत है, वो उनकी संघर्ष की राजनीति की ही देन है। उनकी सोशल मीडिया पर चल रही मुख्यमंत्री के नाम लिखी चिट्ठी को पढ़ने के बाद कम से कम मैं तो इस पूर्व विधायक को गलत नहीं मानूंगा। यद्यपि भोपाल की सड़कों पर खून बहाने वाली उनकी बात पर मेरी सख्त आपत्ति है


और इन अमर्यादित शब्दों के लिए मम्मा की आलोचना की जानी चाहिए। किंतु पसीना बहाने वालों के लिए उनकी चिंता का मैं समर्थन करता हूं।  गुरू नानकदेव जी से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग बचपन में पढ़ा था। कहा जाता है वह किसी गांव में गये। वहां के अमीर ने उनके ठहरने के स्थान पर छप्पन भोग उनकी सेवा में पेश कर दिये। इधर, एक बेहद गरीब किसान गुरूजी के सम्मान में केवल रोटी लेकर पहुंच सका। गुरूजी ने वही सूखी रोटी ग्रहण की। रईस ने कारण पूछा। नानकदेवजी ने रईस की रोटी पकड़ कर दबाई। उससे खून टपकने लगा। फिर उन्होंने गरीब की रोटी के साथ ऐसा ही किया तो उससे दूध निकल आया। मामला साफ था कि रईस ने जो कमाया, वह दूसरों का खून चूसकर अर्जित किया गया था। जबकि किसान ने खालिस मेहनत के दम पर वह रोटी हासिल की थी। यहां भी तो मामला उस तबके का है, जो सारा दिन हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी का बंदोबस्त कर पाता है। निश्चित ही इस तबके ने एमपी नगर सहित अन्य कई जगह अतिक्रमण किया है, लेकिन क्या ऐसा करने के सिर्फ और सिर्फ वे ही दोषी हैं? रोजी रोटी के लिए ठेले या खोमचे लगा कर अगर वे सालों से कमा खा रहे है तो या तो उन्हें व्यवस्थित बसाने का काम नगर निगम को तभी करना था या फिर हटाने का मकसद दूसरे नए अतिक्रमणों को प्रोत्साहन देना है।


ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि प्रेस काम्पलेक्स और एमपी नगर में मेरी पत्रकारिता के भी कम से कम तीन दशक तो गुजरे ही है। विभिन्न अखबारों में काम कर रहे सैकड़ों प्रेस कर्मियों के लिए चाय-नाश्ते का देर रात तक इंतजाम इन्हीं के माध्यम से होता रहा है। लेकिन ये गुमठियां या खोमचे इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी बड़ी समस्या यहां के बडे मगरमच्छ हैं।  ये मगर मच्छ वो हैं, जिन्होंने इसी एमपी नगर में अजगर की तरह सरकारी जगह निगल ली हैं? जिन्होंने भारी-भरकम भवनों में पार्किंग के स्थान तक को व्यावसायिक इस्तेमाल की जगह बना दिया है? बात फंतासी कथा-सी लगती है, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि यदि किसी दिन इस गरीब अतिक्रमणकारी का समोसा या कचौड़ी निचोड़ी जाए तो संभव है कि उसके भीतर से दूध निकल आएगा। लेकिन इन आलीशान इमारतों के कर्ताधर्ताओं का निवाला पीसने पर उससे खून ही बाहर आएगा। यहां तो उन बड़े-बड़े अखबारों के परिसरों में भी मालिकों की गाडियां खड़ी होती है, इन अखबारों में काम कर रहे तमाम कर्मियों के खड़े रहने वाले वाहन तो इन्हीं सड़कों पर अतिक्रमण की मिसाल है। सिंह पर कानूनन जो कार्रवाई होगी, वो होना चाहिए और होगी भी। किंतु मेरा कमलनाथ सरकार से एक सवाल है। गुमठी और ठेले वालों को खदेड़ने के बाद किस समय ऐसा होगा कि बड़े भवन के मालिकों के खिलाफ भी ऐसी ही कार्रवाई शुरू की जाएगी।


सुरेन्द्रनाथ सिंह ने तो तब भी नगर निगम की इन कोशिशों का विरोध किया था, जब वे प्रदेश में भाजपा की सरकार में ही विधायक थे। एमपीनगर के अतिक्रमण का दोषी कोई एक नहीं है। इसके लिए अर्जुन सिंह से लेकर कमलनाथ तक जितनी भी सरकारें रही हैं और इस दौरान जितने भी महापौर हुए हैं वे सभी बराबर के दोषी हैं।  जब आजकल अदालतों के आदेश से अवैध तौर पर बनाए गए बड़े-बड़े भवन बम लगाकर जमीदोंज किए जाते हैं, तब एमपी नगर में इन बड़े अतिक्रमण कारियों के साथ ऐसी सख्ती क्यों नहीं होना चाहिए। यहां ढेरों निर्माण तमाम नियमों को धता बताकर किए गए है। जिनके भीतर पार्किंग की व्यवस्था न किए जाने के चलते एमपी नगर की सड़कों पर  पैदल चलना तक मुश्किल हो गया है। बाबूलाल गौर ने एमपी नगर की सड़कों को अस्सी फीट तक चौढ़ा किया था। लेकिन इन सड़कों का इस्तेमाल केवल पार्किंग के लिए हो रहा है। दरअसल यह सरकार और जिला प्रशासन छोटे-मोटे लोगों को कुचलने पर आमादा है। लेकिन बड़े मगरमच्छों से इसे भय लगता है। यदि ऐसा नहीं होता तो यह संभव ही नहीं था कि एमपी  नगर का एक भी बड़ा भवन अपने भूतल में पार्किंग का इंतजाम नहीं करता। और अकेले सुरेन्द्रनाथ को गाली देने से भी कुछ नहीं होगा, क्योंकि इसी कांग्रेस सरकार में जो लोग भोपाल से मंत्री हैं, वे तो अतिक्रमण और झुग्गी बस्तियों के बड़े सरमाएदार रहे हैं।


सुरेन्द्रनाथ सिंह ने कम से कम भोपाल में झुग्गियां तो नहीं ही बसाई हैं।  सुरेंद्र नाथ सिंह को आज की स्थिति में देखेंगे तो आप पाएंगे कि वह मजलूम तबके के हक की लड़ाई में अकेले पड़ गये हैं। गरीब तथा वंचितों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने वाले कई भाजपाई भी उनके इस आंदोलन से कन्नी काट रहे हैं। प्रशासन उनकी सुन नहीं रहा। राज्य सरकार उनकी न्यायोचित मांग से आंख मूंदकर बैठी है। ऐसे में गुस्से में उन्होंने जो कहा, उसे उनकी इच्छा या षड़यंत्र का स्वरूप प्रदान नहीं किया जाना चाहिए। मम्मा की यह मांग क्या गलत है कि अतिक्रमणकारियों को खदेड़ने से पहले उनके लिए पुनर्वास का समुचित इंतजाम किया जाना चाहिए? एक प्रतिष्ठित अखबार ने समाचार पत्र में यह व्यवस्था लागू कर रखी है कि उसके यहां झुग्गी बस्तियों की समस्याओं से जुड़ी खबरें प्रकाशित नहीं होंगी। फुटपाथ पर रात बिताने को मजबूर लोगों से संबंधित समाचार को स्थान नहीं दिया जाएगा। वजह यह कि ऐसे लोग इस अखबार को खरीदने की हैसियत नहीं रखते हैं। लिहाजा समाचार पत्र ने टारगेट ग्रुप के नाम पर इन जीते-जागते इंसानों को कचरे की टोकरी में डालने जैसी व्यवस्था कर दी है। यह वही अखबार है, जिसने पूर्व विधायक के कल से जुड़े घटनाक्रमों की वास्तविकताओं को छिपाते हुए सिर्फ नकारात्मक पक्ष वाली खबर प्रकाशित की है। तो क्या कमलनाथ की सरकार और भोपाल का जिला प्रशासन भी टारगेट ग्रुप लेकर ही कारगुजारियां संचालित कर रहा है? ऐसा है तो बहुत गलत है, क्योंकि यह पाठकों का नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों का मामला है, जो चुनाव के समय मतदान के जरिये अपनी  नाराजगी निकालना बखूबी जानते हैं।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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