गजब का ढोकतंत्र



तीन आदमी बात कर रहे थे। एक बोला, ‘मैं तो अपनी आय का एक प्रतिशत हिस्सा नियमित रूप से अपने धार्मिक स्थल में जाकर दान करताा हूं।’ दूसरे ने बताया कि वह अपनी तन्ख्वाह का आधा भाग गरीबों की मदद के लिए इस्तेमाल करता है। तीसरे ने कहा, ‘मैं तो अपनी रोज की कमाई लेकर धर्म स्थल जाता हूं। सारा पैसा हवा में उछालता हूं। जितना ऊपर रह गया, वो ऊपर वाले का और बाकी जितना नीचे गिरा, वो मैं अपने पास रख लेता हूं। ऊपर वाले का आदेश मानकर।’ खास बात यह कि तीनों ही शख्स एक ही धर्म के अनुयायी थे। एक साथ काम करते थे और दावा करते थे कि उनके बीच वैचरिक रूप से कोई मतभेद नहीं है। आज जिस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सेक्यूलजिरज्म पर पूछे गये सवाल पर भड़के, उसे देखकर लगा कि मामला इस लतीफे जैसा ही है


वह समय हवा हुआ, जब शिवसेना ने कहा था कि मुस्लिमों का मताधिकार कुछ समय के लिए छीन लिया जाना चाहिए। बुर्के पर रोक लगायी जाए, क्योंकि इससे देश की सुरक्षा को खतरा है। इसी दल की ओर से यह दंभोक्ति भी समय-समय पर की गयी कि यह शिवसैनिक ही थे, जिन्होंने महज 17 मिनट में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा दिया था। ठाकरे ने सेक्यूलरिज्म के सवाल पर जब यह कहा कि उनका दल सहित कांग्रेस और एनसीपी मिलकर फैसले लिया करेंगे तो यह उस आदमी जैसी ही दलील थी जो धार्मिक स्थल पर जाकर पैसे हवा में उछाल देता था। गीता में कहा गया है कि आत्मा शरीर को वैसे ही त्यागती है, जैसे कोई मनुष्य वस्त्र बदलता है। यह मृत्यु के लिए कहा गया। शिवसेना की आत्मा ने उसका परित्याग नया जीवन पाने के लिए किया है।


लेकिन इस नये जीवन की पुरानी स्लेट पर लिखी इबारतों को मिटाना क्या उसके लिए आसान होगा? महाराष्ट्र में ‘आदमी ठीक से देख पाता नहीं, और परदे पे मंजर बदल जाता है’ की तर्ज पर सियासी निष्ठाएं बदल गयी हैं। किंतु आदमी तो सब-कुछ ठीक से देख पा रहा है। परदे पे मंजर बदल गया है, लेकिन आम इंसान की याददाश्त पर इससे परदा नहीं डाला जा सकता। सब को सब कुछ याद है। उन कट्टरपंथियों को भी, जिन्होंने शिवसेना के पूर्ववर्ती एकतरफा हिंदुत्व के चलते उसे पसंद किया था। वह अल्पसंख्यक भी कुछ नहीं भूलेंगे, जिन्होंने शिवसेना के इसी रुख के चलते इस दल को हमेशा आशंका और शक की निगाह से देखा था। बीते दो रोज से भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर महात्मा गांधी के हत्यारे का समर्थन करने की तोहमत मढ़ी जा रही है।


यह हल्ला करने वाले भी नहीं भूले होंगे कि इसी शिवसेना ने जरा पहले ही विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की थी। याद दिला दें कि आज भी सावरकर का नाम महात्मा की हत्या से जोड़ा जाता है। हालांकि देश की अदालत ने सावरकर को इस मामले में दोषी नहीं पाया था। शिवसेना की हालत उस बहू जैसी हो गयी है, जो मूलत: बेहद दकियानूसी विचारधारा की है। किंतु प्रगतिशील खानदान में विवाह करने के लिए उसने अपने आप को अत्याधुनिक विचारधारा वाला बता दिया। किंतु न तो पाणिग्रहण किसी के मूल स्वभाव को बदल सकता है और न ही मुख्यमंत्री पद का शपथग्रहण ऐसा कर पाने में सक्षम है। एक कल्पना पूरी ताकत से दिमाग पर दस्तक दे रही है।


आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति में कोई ऐसा बड़ा पेंच पैदा ‘किया जाएगा,’ जो शिवसेना के कट्टर हिंदुत्व की ओर लौटने की जरूरत प्रतिपादित करेगा। फिर यही दल अपने आज मटियामेट किये गये सिद्धांतो को झाड़-पोंछकर बाहर निकालेगा। उन्हें गले लगाकर सत्ता सुंदरी को अपने बाहुपाश से दूर कर देगा। यह कहते हुए कि हमने उसूलों की खातिर सरकार का भी मोह नहीं किया। इसके बाद सुबह का भूला शाम को उसी घर में लौटेगा, जिसे इस काल्पनिक दृश्य में भारतीय जनता पार्टी कह सकते हैं। सत्ता के लिए अब किसी भी हद तक जाने पर आमादा भाजपा के लिए शिवसेना को ना कहना मुमकिन नहीं होगा। फिर परदे पे मंजर बदलेगा। हम फिर कागज काले करने पर पिल पड़ेंगे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पुन: चौबीसों घंटे तथा कुछ दिन के लिए इस बदलाव को कव्हर करने लगेगा। मतदाता सिर खुजाते हुए ‘फिर बना दिया बेवकूफ’ का पछतावा करेगा। और फिर सब-कुछ सामान्य ढंग से चलने लगेगा। क्योंकि यह ढोकतंत्र है। वह तंत्र जिसमें ताकतवर के सामने ढोक लगाने के लिए हम सभी अभिशप्त हैं। सत्ता की ताकत इसमें सबसे बड़ी है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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