दुर्भाग्य ऐसे पंक्चरतंत्र में रहने का



सालों-साल पुराना पंचतंत्र याद आ गया और वो भी पंक्चरतंत्र के समय पर। जी बिल्कुल, वही पंक्चर गाड़ी जैसा तंत्र यानी सिस्टम। पंचतंत्र की एक कहानी है। चार विद्वान थे। चारों की विद्वत्ता विखंडित किस्म की थी। गुरुकुल नामक महान संस्था से जैसी भी मिली, शिक्षा हासलि करने के बाद वे घरों को लौटने लगे। रास्ते में एक मरे हुए शेर की हड्डियां दिखीं। एक बोला, मैं इससे शेर की संरचना तैयार कर सकता हूं। दूसरा उपत कर हाजिर हुआ कि वह उस संरचना को हाड़-मांस का स्वरूप प्रदान कर देगा। तीसरा शेर के निर्जीव जिस्म में रक्त के बहाव सहित जीवन योग्य आवश्यक अन्य क्षमताओं के प्रवाह का दावेदार था। तीनों ने अपना-अपना कहा हुआ कर दिखाया। अब चौथे की बारी थी। वह बोला कि मरे हुए को जीवित करने की कला उसे आती है। उसने ऐसा कर दिखाया। देखते ही देखते शेर जिंदा हुआ और चारों को खा गया। अब उस शेर को तो शेर ही बोलेंगे। लेकिन उन मूर्ख विद्वानों के लिए किस ‘सुपात्र’ का नाम दें


क्योंकि तलाश उस शिरोमणि की है, जो यह साफ-साफ बता सके कि मध्यप्रदेश में आंदोलनरत पटवारियों का माई-बाप कौन है? और इस सवाल का उत्तर भी खोज सके कि आंदोलन की इस खिचड़ी को तपिश कौन-कौन आदरणीय प्रदान कर रहे हैं। युवा कांग्रेस के पुराने अध्यक्ष और ‘श्रीमंत’ से लेकर ‘राजा साहब’ के बीच खुद का रास्ता बनाने वाले गोविंद राजपूत गजब हैं। उनका कमाल है। बुंदेलखंड के पानी का असर है। तो इन्हीं राजपूत ने ठकुरास से भरा ऐलान कर दिया कि राज्य के पटवारियों की मांग ‘पार्टी गयी तेल लेने’ मार्का जीतू पटवारी ने पूरी कर दी है। पटवारियों की मांग थी कि कमलनाथ मंत्रिमंडल के पटवारी अपने कहे के लिए उनसे माफी मांग लें। राजपूत की बात सुनकर बस्ते वाले पटवारी कृतार्थ हो गये। निहाल हो गये। फिर बस्ता खोलकर मालामाल होने को उद्यत हो पड़े। लेकिन बस्ते और तेल का कोई साम्य होता ही नहीं है। तेल बस्ते में गिरे तो उसे बर्बाद कर देता है। पता नहीं क्यों, तेल वाले पटवारी को बाकी पटवारियों से नाखुशी हो गयी। लिहाजा वह ट्विटर पर कह गुजरे कि वे अपने कहे पर कायम हैं।


लिहाजा, जमीन के पटवारियों ने बस्ता फिर बांध कर किनारे रख दिया। दिवंगत राजेंद्र नूतन भोपाल के सम्मानीय पत्रकारों में से एक थे। अब वे नहीं हैं लेकिन उनका कहा याद आ रहा है। एक मर्तबा उन्होंने मलेच्छ आचरण पर कहा था, ‘काम के समय चिंघाड़ने वालों की बात सुनो, हिनहिनाने वाले की शक्ति पर भी भरोसा कर लो, किंतु रेंकने वाले को त्याज्य समझ कर चलो।’ तो साहब यही कारण कि दिग्विजय सिंह इस पूरे पंचतंत्र में कहीं नहीं दिखते। शायद नूतनजी से संबंधित वार्तालाप के लिहाज से तराजू का वह पलड़ा ही नहीं बना, जिस पर दिग्विजय को रखा जा सके। तो दिग्विजय सिंह अगर बराबर चेले को दम भर रहे हों तो फिर मंत्रिमंडल वाला पटवारी सरकार को भी तेल लेने तो भेज ही सकता है। खैर, ज्यादा कड़वाहट उचित नहीं है। इसलिए विषयांतर कर लें। तो यह पंक्चरतंत्र उस समय पूरे चरम पर है, जब राज्य का किसान बेहाल है। अतिवृष्टि ने उसकी फसल सहित पूरी की पूरी उम्मीदें बर्बाद कर दी हैं।


यदि समाचार पत्रों में नरेंद्र मोदी से हजारों करोड़ रुपए की सहायता मांगते हुए किसी मुख्यमंत्री के छायाचित्र मात्र से अन्नदाता की समस्या समूल खत्म हो जाती, तो क्या बात थी! लेकिन बात बिकाऊ की है, टिकाऊ की नहीं, इसलिए यही सोचकर संतोष किया जा सकता है कि कम से कम भाग्य की वजह से राज्य के ‘नाथ’ बने शख्स ने यहां के दुर्भाग्य के प्रतीक किसानों की बात तो दिल्ली तक पहुंचा ही दी। सब जानते हैं कि दिल्ली अपनों के लिए दिलदार और परायों के लिए बेदिल हो जाती है। इसलिए नाथ के इस संदेश का क्या हश्र होना है, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन एक सवाल उठता है। वल्लभ भवन से निकलकर स्टेट हैंगर से विमान पकड़कर दिल्ली जाने से पहले क्या यह नहीं हो सकता कि इस भवन में बैठे-बैठे ही जुबानी जमा खर्च करने वाले किसी मंत्री की जुबान पर अंकुश लगाकर यह सुनिश्चित कर लिया जाये कि किसानों के लिए इस समय जमीनी स्तपर पर बहुत महत्वपूर्ण राजस्व अमले के आंख, नाक, कान पटवारी हड़ताल पर न जाएं।


वह काम करते रहें, ताकि आपदा के इस वक्त में किसानों को सरकारी इमदाद के रूप में अगर कुछ मिलता हो तो कम से कम उसका बैकग्राउंड तो तैयार रहे। शिवराज की सरकार चाहे जैसी चलती रही हो लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी कि ऐसे मौकों पर मरहम लगाने वो खुद मैदान में होते थे। यहां तो सरकार के पटवारी, जमीन के पटवारियों सहित किसानों के जले पर नमक छिड़क रहे हैं। कई बिरले ऐसे होते हैं, जो स्वयंजनित महानता से खुद के उत्थान का मार्ग निकाल लेते हैं। बीते विधानसभा चुनाव के समय जिन जीतू पटवारी ने जनसंपर्क के दौरान, ‘पार्टी गयी तेल लेने’ के जरिये अपनी होशियारी का परिचय दिया था, उसी को उन्होंने अपनी ताकत बनाने का असफल प्रयास कर लिया। सब जानते हैं कि वह असफल रहे और शायद इसी नाकामी की भड़ास उन्होंने पटवारियों पर निकाल दी। इसका खामियाजा निर्दोष किसान भुगत रहा है। जब रोम जल रहा था, तब नीरो बांसूरी बजा रहा था। जब मध्यप्रदेश का किसान जल रहा है, तब नीरो वल्लभ भवन में खर्राटे भरते हुए हवा में उड़ते हुए नरेंद्र मोदी से मदद मांगते हुए बांसूरी नहीं, पूरे प्रदेश के बाढ़ पीड़ितों और किसानों की पुंगी बजा रहा है। बेलगाम, बदजुबान और भ्रम से घिरे मंत्रियों वाले इस नीरो के लिए निंदा नहीं, बल्कि बतौर मुख्यमंत्री मर्सिया लिखने का समय आ गया लगता है। पंचतंत्र से समूचे पंक्चर तंत्र का यह हाल देखना अपने पत्रकार होने के दुर्भाग्य का जीता-जागता दर्द है। जिसके खत्म होने की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं दिखती। ये स्वाभाविक मौत मरे उस शेर को अपनी मूर्खतापूृर्ण विद्वत्तता से जीवित करने जा रहे हैं, जो अंतत: इन्हें ही अपना ग्रास बना लेगा।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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