देश के खिलाफ एक और साजिश की तैयारी....



यहां ले-देकर बमुश्किल सत्तर साल बाद कश्मीर को वाकई देश के अभिन्न हिस्से के रूप में शामिल किया गया है। और यहां एक और विभाजन की तैयारियां शुरू कर दी गयी हैं। मामला 'आदिवासी दिवस' का है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारें शुक्रवार को इसका आयोजन करने जा रही हैं। खास बात यह कि इसी दिन संयुक्त राष्ट्र विश्व मूलनिवासी दिवस मना रहा है। हालांकि देश की दलित जातियां और पिछड़े वर्ग के अलावा धर्मपरिवर्तन कर अल्पसंख्यक बने समुदाय भी अपने को देश का मूल निवासी मानते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकारों ने इसे आदिवासी दिवस के तौर पर मनाने का एलान कर दिया है। दोनों प्रदेशों में 9 अगस्त को आदिवासी दिवस की छुट्टी भी घोषित की गई है। अब अतीत की ओर देखें। भारतीय संविधान में किसी भी जगह आदिवासी या हरिजन शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। इनकी जगह क्रमश: अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति का इस्तेमाल किया गया है। इस पर देश का रुख संयुक्त राष्ट्र के सामने भी साफ कर दिया गया था। इस वैश्विक संस्था ने सन 1989 में राइट्स आफ इंडिजिनस पीपल (मूल निवासियों के अधिकार) कन्वेंशन की घोषणा की थी। संस्था में तब 182 देश थे, जिनमें से मात्र 22 ने इसे स्वीकार किया


भारत ने इसे इस आधार पर स्वीकार नहीं किया था कि यहां सभी मूल निवासी हैं। उसने संयुक्त राष्ट्र में साफ कहा कि उसके लिए देश का हरेक नागरिक मूल नागरिक ही है। इसलिए किसी को अलग से इस शब्द के माध्यम से परिभाषित करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। हालांकि सन 2007 में भारत ने इस संधि के पक्ष में मतदान किया, किंतु उसने इससे पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि वह मूल निवासियों की अपनी अवधारणा पर कायम है। आज के संदर्भ में एक तथ्य पर गौर कर लें कि 1989 और 2007 में देश में कांग्रेस की या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार थी। 2007 की कांग्रेस गठबंधन सरकार में कम्युनिस्ट भी महत्वपूर्ण भूमिका में थे। यहां संयुक्त राष्ट्र की आदिवासियों की परिभाषा को जानना जरूरी है। इसमें लिखा गया है, किसी स्वतंत्र देश में वह लोग, जिनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियां उन्हें राष्ट्र के समुदाय से अलग करती हैं और जिनकी स्थिति पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से उनके स्वयं के रीति-रिवाजों या परंपराओं या विशेष नियमों द्वारा विनयमित होती हैं, वह जनजाति है। अब यह भी देखें कि यह संस्था मूलनिवासी को किस तरह परिभाषित करती है।


उसके अनुसार, स्वतंत्र देशों के वह लोग, जो एक आबादी में हैं, जो वंश के कारण देशज के रूप में माने जाते हैं, जो किसी देश या एक भौगोलिक क्षेत्र जो उस देश से संबंधित है, उससे किसी जीत या उपनिवेश के दौरान या वर्तमान सीमाओं की स्थापना के समय या अन्य कारणों से कानूनी स्थिति के बावजूद अपनी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक विरासत और संस्थानों को कुछ हद तक या पूर्णत: बचा पाए हैं, मूलनिवासी हैं। जाहिर है कि न तो आदिवासी और न ही मूलनिवासी, किसी भी परिप्रेक्ष्य में यह परिभाषा भारत पर लागू नहीं होती है। इसके बावजूद तमाम तथ्यों से आंख मूंदकर भारत में मूलनिवासी दिवस को आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यह प्रक्रिया बेहद सोची-समझी चाल का हिस्सा है। यह दिवस पहले तो असंगठित रूप में मनाया गया, किंतु अब दल विशेष की सरकारों द्वारा इसे अपने-अपने राज्य में मान्यता प्रदान कर संस्थागत स्वरूप दे दिया गया है। यह उन मंसूबों को पूरा करने की साजिश है, जिसके तहत अंग्रेजों ने भारत के मूल निवासियों को आर्य तथा द्रविण में बांटकर यहां सामाजिक बिखराव की बिसात बिछायी थी।


जबकि थॉमस किवसलिड सहित अन्य जानकार खोज के बाद यह कह चुके हैं कि भारतीय उप महाद्वीप में रहने वाले 98 प्रतिशत लोगों के माइटोक्रांडियल डीएनए एक ही माता-पिता से आये हुए हैं। तो फिर इस बात पर कैसे विवाद हो सकता है कि सभी भारतीय नागरिक इस देश के मूलनिवासी हैं! बहुत घातक बात यह कि इस आदिवासी दिवस की आड़ में एक ऐसा एजेंडा लागू करने का षड़यंत्र साफ दिख रहा है, जो इस राष्ट्र में अनुच्छेद 370 सरीखे और कई घातक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। क्योंकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा मूलनिवासियों के लिए बनाये गये कानून यहां लागू किए जाने की सूरत में विभाजन के नित-नये द्वार खुल जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र के कानून मूलनिवासियों (जिन्हें आदिवासी दिवस मनाने वाले आदिवासी कहते हैं) को आत्म निर्णय के तहत स्वायत्त सरकार का गठन करने सहित विदेशी वित्तीय व आर्थिक सहायता लेने का हकदार बनाते हैं। यानी मामला देश के भीतर समानांतर सरकार के गठन और उसके लिए विदेशी मदद (जैसा उदाहरण अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा तालिबानी शासन की स्थापना के समय पैसे देकर पेश किया गया था। पाकिस्तान ने भी पृथक खालिस्तान की मांग को हवा देने के लिए सिख आतंकवाद को भरपूर आर्थिक मदद मुहैया करायी थी) का माहौल तैयार करने वाला है।


अगला कानून इन आदिवासियों को अपने राष्ट्र से भिन्न राजनैतिक, कानूनी, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान का अधिकार देता है। यानी वही मानसिकता, जिसके तहत इस देश में नक्सलवाद का खूनी प्रसार किया गया। खास बात यह कि ये दोनों कानून राष्ट्र विरोधी की श्रेणी में आते हैं तथा भारतीय संविधान इन्हें मान्य नहीं करता। मूलनिवासियों के लिए अपनी अलग नागरिकता का अधिकार भी संयुक्त राष्ट्र द्वारा दिया गया है। फिर वही देश से अलग किए जाने वाली बात। बेहद घातक तथ्य यह भी कि इस संस्था ने आदिवासियों के लिए अपने रीति-रिवाजों व धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किसी भी अन्य देश को अपनाने की स्वतंत्रता भी दी है। यहां ध्यान रखना होगा कि इसी तरह की अघोषित आजादी के चलते जम्मू-कश्मीर में असंख्य लोगों की ऐसी फौज दिखती है, जो खुद को भारत की बजाय पाकिस्तान का नागरिक बताना पसंद करती है। इतने स्पष्ट तथ्य और सिर पर खड़े खतरों के बावजूद आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा को बढ़ावा देना बताता है कि देश के भीतर नये सिरे से विभाजनकारी मानसिकता के बीज बोये जा रहे हैं। इस पर रोक लगना ही चाहिए। वरना फिर हमें सात दशक से अधिक समय तक अनगिनत नये जम्मू-एवं कश्मीर (अनुच्छेद 370 के तहत दिये गये विशेष दर्जे वाले) से जूझना होगा। अनुसूचित जनजाति वर्ग में बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती, टांट्या भील तथा वीर नारायण सिंह जैसे देश के सच्चे सपूत हमारी श्रद्धा के पात्र हैं। क्यों नहीं ऐसा होता कि आदिवासी दिवस की बजाय इनके नाम से यह दिन मनाया जाए। यदि आप बिखराव के समर्थक नहीं है तो फिर इस सुझाव का निश्चित ही समर्थन करेंगे।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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