कांग्रेस में अब सुनामी की जरूरत



दिल्ली में भाजपा एवं कांग्रेस के लिए ‘मारे गये गुलफाम’ वाली स्थिति के साथ ही अरविंद केजरीवाल की ‘तीसरी कसम’ का मार्ग प्रशस्त हो गया है। जो जीत गये, उनके लिए यह खुशी का समय है। जश्न का मौका है। लेकिन जो हार गये, उनका अब क्या? यह तय बात है कि भाजपा इस करारी पराजय पर आत्ममंथन कर लेगी। यह इस दल की कार्यशैली का हिस्सा है। वह शिकस्त से सबक लेने का जतन कर सकती है। परिणामों की सख्त एवं निरपेक्ष व्याख्या कर उनके अनुरूप सुधारवादी कदम उठाने में भी शायद कोताही नहीं बरते। निश्चित ही बिहार के आसन्न विधानसभा के चलते दिल्ली को लेकर भाजपा इस प्रक्रिया को फिर निबाहेगी ही। किंतु कांग्रेस को लेकर इस दिशा में विचित्र स्थिति नजर आती है। ‘मेरे घर की दीवार गिरी तो क्या हुआ! कम से कम पड़ोसी की बकरी तो मर गयी...’ की तर्ज पर दिल्ली के नतीजों की बचकानी व्याख्या उसके नेता शुरू कर चुके हैं


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ तो साफ कह चुके हैं कि भाजपा की हार सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस ने दिल्ली चुनाव को गंभीरता से लिया ही नहीं था। पी चिदंबरम ने जो ‘बौरायी-सी’ प्रतिक्रिया दी है, उस पर ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। तिहाड़ जेल के एकांत में जो खास किस्म का ‘बोधिसत्व’ उन्होंने हासिल किया है, उसके बाद वे स्वयं की पार्टी जैसे भौतिक विचारों से ऊपर उठ गये हैं। उनके लिए अब जो मायने रखता है, वह भाजपा के साथ होने वाला हर बुरा घटनाक्रम है। एक राष्ट्रीय मीडिया समूह कांग्रेस की सिफर वाली पराजय से शायद बहुत दु:खी हो गया। उसने लिखा कि इस दल ने खुशी से खुदकुशी कर ली है। ताकि भाजपा को जीतने से रोका जा सके। लेकिन यह तथ्य सही नहीं है। कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की ही तरह दिल्ली में भी किस्मत से छींका फूटने की उम्मीद थी। यही वजह रही कि उसने अरविंद केजरीवाल की कोशिशों के बावजूद इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन से साफ इनकार कर दिया था।


लाख रुपए का सवाल यह कि क्या यह दल इस पराजय के बाद पूरी निष्पक्षता से इसके कारणों की समीक्षा कर सकेगा? क्या उसके शुभचिंतक उस सुरंग में घुसकर हार की वजहों पर प्रकाश डाल पाएंगे, जिस सुरंग के भीतर गांधी-नेहरू परिवार नामक अंधेरा लम्बे समय से कुंडली मारकर बैठा हुआ है? ‘परिवार पूजन’ के कर्मकांड में आकंठ डूबी कांग्रेस यह समझ ही नहीं पा रही कि उसके अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद से पार्टी को अधिकांश मौकों पर शर्मनाक हार सहने की आदत-सी पड़ गयी है। सोनिया गांधी का स्वास्थ्य अब उनका साथ नहीं दे पा रहा। लिहाजा प्रियंका वाड्रा को आगे लाया गया। श्रीमती वाड्रा के सियासी बायोडाटा में यह उपलब्धि उल्लेखनीय है कि बीते लोकसभा चुनाव में उन्होंने जिस उत्तरप्रदेश की कमान संभाली थी, उस राज्य में उनके सगे भाई राहुल गांधी ही चुनाव हार गये। पार्टी की सदस्य संख्या दो से घटकर एक रह गयी।


दिल्ली चुनाव के संदर्भ में भी प्रियंका का अचीवमेंट यह रहा कि नागरिकता संशोधन कानून एवं एनआरसी पर उनकी लगातार सक्रियता भी पार्टी को जीरो के आंकड़े से इंच भर भी आगे नहीं ले जा सकी। यानी पहले भाई और अब बहिन, दोनों घोर असफल साबित हुए हैं। यदि आप मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जीत को राहुल की सफलता मानते हैं तो यह याद रखिये कि गांधी की कोशिशों के बावजूद मध्यप्रदेश में कांग्रेस को पर्याप्त बहुमत नहीं मिला था। पंद्रह साल की एंटी-इन्कम्बैंसी के बाद भी भाजपा ने इतनी सीट हासिल कर ली थीं कि पांच-छह से भी कम विधायकों की तोड़-फोड़ के जरिये वह फिर सत्ता पर काबिज हो सकती थी। राजस्थान वह राज्य है, जहां पांच साल भाजपा और अगली इतनी ही अवधि तक कांग्रेस की सरकार बनने की परिपाटी चली आ रही है। छत्तीसगढ़ में एंटी इन्कम्बैंसी ने पूरा खेल खेला था।


देश का सबसे पुराना और बड़ा राजनीतिक दल आज उस गुलिवर की स्थिति का हो गया दिखता है, जो एक कहानी में अपने से बहुत विशालकाय कद-काठी वालों के बीच फंस जाता है। हालत यह कि जिस भी राज्य में कोई क्षेत्रीय दल ताकतवर है, कांग्रेस की हैसियत वहां तीसरी या चौथी पायदान वाली हो गयी है। बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, दक्षिण के राज्यों में हालात ऐसे ही हैं। यह एक देशव्यापी पहचान रखने वाली, पांच दशक तक देश पर राज्य करने वाली पार्टी की दुखद स्थिति है। कुल जमा सात-आठ राज्यों में ही उसका सीधा मुकाबला भाजपा से रह गया है। किसी समय देश की सत्ता का शीर्ष तना रही कांग्रेस आज अपने से बहुत छोटे दलों की बैसाखी की मोहताज बनकर रह गयी है। उसका अपना कोई विचार नहीं रह गया दिखता है। एक ही एजेंडा, भाजपा का विरोध, उसकी ऐसी विवशता बन गया है, जिसने इस दल की मूल पहचान को बहुत पीछे छोड़ दिया है। सियासी उपलब्धियों के लिहाज से ‘भुतहा महल’ वाली स्थिति में आ गयी कांग्रेस को अब उस सुनामी की जरूरत है, जिसमें सच्चे एवं खुले विचारों की तीव्र लहरों का संचरण हो सके। यह बात हर मंच से उठ सके कि पार्टी को नेतृत्व की आवश्यकता है, एक परिवार विशेष की नहीं। क्योंकि यह साबित हो चुका है कि राहुल गांधी या प्रियंका वाड्रा नीतियों के लिहाज से बहुत कमजोर हैं। उनका अपना कोई कार्यक्रम नहीं है। जो है, वह केवल यह कि भाजपा के खिलाफ मिले हर मुद्दे को उठाया जाए। इसका परिणाम दिल्ली के नतीजों से एक बार फिर स्पष्ट है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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