कांग्रेस की महाभारत के वेदव्यास



मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का कमल कुम्हलाये हुए करीब आठ महीने हो गये हैं। इसलिए बीते विधानसभा चुनाव का 'भूले-बिसरे गीत' की तर्ज पर स्मरण करने की कोई तुक नहीं रह जाती। लेकिन नया मामला भी तो घूम-फिरकर कमल पर ही ठहर गया है। यानी कमलनाथ। जिनके व्यक्तित्व का गर्व से खिला फूल न सिर्फ कुम्हला रहा है, बल्कि कमल के नीचे का कीचड़ उस पर हर ओर चिपक गया है। उमंग सिंघार ने अति-नाटकीय मुद्रा में हथियार डालने का उपक्रम किया है। कल उनकी मुलाकात नाथ से हुई। इसके बाद इस युवा मंत्री ने मीडिया से दूरी बना ली। कहा कि उन्हें जो कहना था, वह आलाकमान से कह चुके हैं


यह बात और है कि जो कहा गया, वह आलाकमान से पहले मीडिया तक पहुंचाने के बंदोबस्त भी सिंघार एवं उनकी मित्र मंडली ने ही किए। अब प्याज के छिलके की तरह राज्य सरकार एवं कांग्रेस संगठन की कलह सामने आती जा रही है। सच कहूं तो जो चल रहा है, उसे देखकर ...हर शाख पे उल्लू बैठा है... की याद आ गयी है। हमें भी अंजामे-गुलिस्तां की चिंता है। लेकिन हमारा यह गुलिस्तां न तो वल्लभ भवन है और न ही प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय। अपनी चिंता राज्य के प्रति है। क्योंकि अराजकता से भरी इस धींगामस्ती में प्रदेश का हर वो आम आदमी, जिसका वास्ता सरकार से पड़ता है, प्रभावित हो रहा है। नागरिकों की मूलभूत जरूरतों को नेपथ्य में कर दिया गया है।


दिग्विजय सिंह की, सिंधिया की, कमलनाथ की या फिर उमंग सिधार और अन्य मंत्रियों के निजी स्वार्थ में लिपटी सियासी आकांक्षाओं के पर पसारने के साथ ही राज्य के तमाम आवश्यक जनोपयोगी कामों पर किसी गिद्ध की दृष्टि गड़ गयी लगती है। सरकार बड़े आराम से ब्लेकमैल हो रही है। धार के आबकारी अधिकारी को हटाने का मामला ऐसा ही लगता है। उमंग की जिद पर अफसर हट गया। जिस नेता की इज्जत और स्वार्थ के लिए आडियो वायरल हुआ, उसका भी मतलब सध गया लेकिन कार्रवाई न तो रिश्वत लेने वाले पर, न मांगने वाले पर और न देने वाले पर करने का दम सरकार दिखा पाई।


इसका सीधा संदेश यही गया है कि नैतिक-अनैतिक चाहे जैसा दबाव डालकर सरकार को आसानी से ब्लेकमैल किया जा सकता है। सिंघार ने दिग्विजय पर माफिया से मिलीभगत के आरोप लगाये। इधर, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी प्रदेश सरकार की दुखती रग पर हाथ रखकर स्वयं के दर्द का इजहार कर दिया है। सिंधिया ने कहा है कि राज्य में सरकार अपनी दम पर चलना चाहिए, उसमें किसी अन्य का हस्तक्षेप होना ठीक नहीं है। सिंधिया की पीड़ा स्वाभाविक है। क्योंकि यह दिग्गी राजा का ही हस्तक्षेप है, जिसने उनके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के सपने को साकार होने से रोक रखा है। हालांकि सिंधिया खेमे का दबाव भी साफ दिख रहा है।


अखबारों में विज्ञापन से लेकर ग्वालियर-चंबल संभाग में लगे पोस्टर बैनर तक सब पर सिंधिया कोे प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष बनाने का दबाव डाला जा रहा है। इन सारे दबावों के बाद भी फायदे में हालांकि कमलनाथ ही हैं। पर सवाल यह कि प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को बहुमत अपने विकास के लिए दिया था या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद का मामला सुलझाने और अफसरों की पोस्टिंग और तबादलें करने के लिए? बीते दिसंबर से अब तक बहुत कम मौकों पर नाथ मुख्यमंत्री कम, ठेठ कांग्रेसी ज्यादा नजर आये हैं। विज्ञापन के लिए लगाये गये कुछ होर्डिंग पर नाथ दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ महाभारत के गणेश जैसी मुद्रा में दिखते हैं। हो सकता है कि यह उनका स्वर्गीय गांधी के प्रति सम्मान दिखाने का तरीका हो, लेकिन अघोषित/अप्रकाशित तथा अप्रसारित जिन तस्वीरों में वह वेदव्यास टाइप से दिग्विजय के समक्ष बैठकर प्रदेश एवं कांग्रेस की विनाशलीला वाली महाभारत लिख रहे हैं, उसका कोई क्या करे।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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