चुप न रहें इस गंभीर मसले पर



श्रीनिवास तिवारी तब मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हुआ करते थे। गुस्सा उनका मारक अस्त्र था। जब जहां मौका मिला, दन्न से इसका प्रयोग कर विरोधियों को चित कर देते थे। इसका असर यह कि सदन के अंदर विधायक और बाहर मीडिया तक उन्हें 'अध्यक्ष महोदय' कहकर संबोधित करता था। तिवारी के राजनीतिक और दैहिक अवसान के बाद अध्यक्ष पद में ऐसा दम-खम देखने को नहीं मिला। लेकिन इस पद को वर्तमान में सुशोभित करते रेवा पुत्र नर्मदा प्रसाद प्रजापति के तेवर देखकर लग रहा है कि यह तिवारी युग की वापसी का प्रयास है। क्योंकि विधानसभा या अपनी आसंदी से बहुत दूर बैठे-बैठे भी वे सदन के कठोर तरीके से संचालन का जतन करते दिख रहे हैं। बहुत गजब की ऐसी व्यवस्था दे गुजरे हैं, जो वाकई ध्यानाकर्षण के योग्य है। जिसमें स्थगन प्रस्ताव जैसी ताकत है। व्यवस्था यह कि प्रदेश की राजधानी का पर्यावरण राज्य के विधायकों की जरूरतों के आगे गौण है। उसकी कोई औकात ही नहीं है। पर्यावरण की चिंता करने वाले नालायक हैं और विधायकों का हित ही सर्वोपरि है


मसला यह कि प्रजापति महोदय पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच से खफा हैं। उनका मत है कि नये विधायक विश्राम गृह के लिए असंख्य वृक्षों की बलि देने का विरोध केवल और केवल छपास के रोग से प्रभावित है। चौहान के संदर्भ में प्रजापति का यह आंकलन गलत नहीं है। क्योंकि इस प्रोजेक्ट को शिवराज ने ही मुख्यमंत्री रहते हुए मंजूरी दी थी। फिलहाल हो यह रहा है कि उन्हें खबरों में बने रहने के लिए नित-नये मुद्दे की जरूरत है। लिहाजा वृक्षों की चिंता के बहाने भी वह ऐसा ही कर रहे हैं। लेकिन श्रीमती बुच को लेकर इस तरह का कटाक्ष घोर आपत्तिजनक आचरण का प्रतीक ही कहा जा सकता है। मैंने श्रीमती बुच को एक आईएएस और फिर मुख्य सचिव के तौर पर भी काम करते देखा है। श्रीमती बुच और उनके दिवंगत पति महेश नीलकंठ बुच अपने व्यक्तित्व के लिहाज से प्रदेश के उन लोगों में रहे हैं, जिन्हें स्वच्छ छवि वाले लोगों की दरकार वाला कोई भी राजनीतिक या सामाजिक संगठन हाथों-हाथ लेता।


प्रसिद्धि के लिए अव्वल तो इस दंपति को कभी किसी प्रयास की जरूरत ही नहीं रही, तिस पर छपास जैसे रोग का संक्रमण उन पर होने की कोई निशानी कहीं भी नहीं दिखती है। भोपाल की हरियाली पर लाये जा रहे संकट को लेकर श्रीमती बुच की चिंता स्वाभाविक है। वह सामाजिक सारोकारों पर पहले भी पूरी ताकत और निरपेक्षता के साथ अपनी बात रखती आ रही हैं। इंसानी जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक पर्यावरण को लेकर भी उनकी चिंता वाजिब है। ऐसी चिंता एवं कोशिशों को निहायत ही घटिया अंदाज में राजनीतिक रंग देने की कोशिश करना निंदनीय ही कहा जाना चाहिए। विधायक तो जन प्रतिनिधि होता है। जनता की सेवा की बात कहते हुए चुनाव में उतरता है। तो फिर ऐसा क्या कि यही शख्स विधायक बनते ही खुदा की भेजी रूह जैसा महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि मौजूदा विधायक विश्राम गृह में कुछ कमियां हैं, तो उसी भवन को ध्वस्त कर वहां नया निर्माण किया जा सकता है। यही होगा ना कि एकाध विधानसभा सत्र के दौरान विधायक महोदय विश्राम गृह की सुविधा से वंचित रहेंगे।


इससे कम से कम राजधानी के हजारों वृक्षों की जान तो बच ही जाएगी। गैमन इंडिया के नाम पर साउथ टीटी नगर के हजारों पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। इसके बाद शहर के तापमान में जो वृद्धि हुई है, वह बताता है कि कैसे हरियाली की कमी का वातावरण पर बहुत बुरा असर हुआ है। अब स्मार्ट सिटी के लिए भी हरियाली की बलि दी जा रही है। इसके बाद विधायकों के नये सरकारी ठिकाने की खातिर भी ऐसे ही कुल्हाड़ी चलेगी तो फिर शहर के पर्यावरण का विनाश की कगार पर पहुंच जाना तय है। पता नहीं वो लोग कहां हैं, जो इस और बीते साल की गरमी में तापमान की भयावहता पर चिंता जताते हुए भोपाल शहर की हरियाली में इजाफा और वृक्षों की कटाई पर रोक की पुरजोर वकालत कर रहे थे। यह तो समय है कि श्रीमती बुच के समर्थन में आगे आकर शहर का सच्चा हितैषी होने का परिचय दिया जाए। क्या हम इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि हमारी सहभागिता के बगैर ही एक विशाल जन आंदोलन खड़ा हो जाए, ताकि राजधानी की सेहत को बचाया जा सके।


इस गलतफहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि राजनीतिक दल आपके साथ आएंगे। अपनी-अपनी सुविधा के नाम पर वे पूरी तरह एकजुट हैं। इस बात की कल्पना करने का तो कोई मतलब ही नहीं कि खुद विधायक ही नये विश्राम गृह के औचित्य पर सवालिया निशान लगा देंगे। केवल यह कल्पना करें कि हजारों और वृक्षों की कुबार्नी लेने के बाद आने वाले समय में आप और आपके बाद वाली पीढ़ी हर साल मई से जुलाई के मध्य तक किस कदर भट्टी में झुलसेगी। किस तरह राजधानी का हाल उस रायपुर जैसा हो जाएगा, जहां हरियाली के अभाव में हर मौसम नारकीय अहसास दिलाता है। यह समय अपनी और समूचे समाज के हित की चिंता के फेसबुकिये और व्हाट्सएपिये जतन से बाहर आकर जमीनी काम करने का है। कुछ और नहीं तो कम से कम श्रीमती बुच की आवाज में आवाज ही मिला लीजिए। हर चीज को राजनीति के गंदे चश्मे से देखने वालों को इस बात का अहसास दिलाया जाना चाहिए कि छपास के रोग की असलियत क्या है और इसके असली बीमार कहां बसते हैं। शहर से जुड़े इस अहम मसले पर चुप रहने के पाप का भागीदार होना राजधानी के पर्यावरण के प्रति अपराध की श्रेणी में ही आएगा। इसलिए भोपाल की हरियाली की हत्या करने वालों को पराजित करने की दिशा में खुलकर अपनी आवाज बुलंद करें ।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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