चावल बिक गए, हम का जानी



मामला गंभीर है। इसलिए चलिए, शुरू में ही माहौल कुछ हल्का कर लेते हैं। एक पंडितजी को सालिगराम की पिंडी जान से भी अधिक प्यारी थी। वे नियम से उन्हें स्नान कराते। रगड़-रगड़कर साफ करते। दिन में कई बार पिंडी को धोकर चन्दन लगाते। फिर बरसात का मौसम आया। उनके मंदिर के आसपास ढेर सारा जामुन फल गया। बरसात की फुहारों के बीच पंडितजी को दोपहर में झपकी आ गई। एक चेले को जामुन की भूख सता रही थी। लेकिन वह ऊंचे पेड़ पर लगे थे। आसपास कोई पत्थर नहीं दिखा। चेले ने सालिगराम जी की पिंडी उठाई और पत्थर की तरह जामुनों की तरफ उछाल दी। फल तो नीचे आ गिरे, लेकिन पिंडी कहीं दूर जा गिरी। वह नहीं मिली तो चेले ने एक बड़े आकार की जामुन को ही लाकर पिंडी वाली जगह पर रख दिया। संध्या पूजन का समय हुआ


पंडितजी ने जामुन उठाया और पिंडी समझकर उसे पानी से धोते हुए रगड़ने लगे। जामुन का छिलका तुरंत उतर गया। पंडितजी आगबबूला हो गए। चेले की पिटाई करने लगे। तब चेला बोला, 'पुनि-पुनि चन्दन, पुनि-पुनि पानी, ठाकुर गल गए, हम का जानी।' यहां भी मामला ऐसा ही है। मध्यप्रदेश में जब सत्ता-रूपी सुखद बरसात की शुरूआत हुई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ भी सुख की नींद में सो गए थे। चेले-चपाटी पंद्रह साल से भूखे थे। इधर मुखिया की आंख लगी, उधर उन्होंने पीडीएस का चावल तस्करों के हवाले कर दिया। मुख्यमंत्री का बचा हुआ पूरा समय तो वल्लभ भवन, नई दिल्ली और छिंदवाड़ा में रखे अदृश्य सालिगरामों की पूजा-अर्चना में ही निकल जा रहा था। खुफिया एजेंसी ने उन्हें चेताया।


चावल के खेल की उन्हें जानकारी दी। मगर नाथ तो ध्यानमग्न थे। उनकी तन्द्रा भंग नहीं हुई। अब जब मामला सामने आया है, तो देर हो चुकी है। वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बगैर कोई मौका गंवाए मामले की जांच ईओडब्ल्यू को सौंप दी। अब नाथ सरकार की खास मंत्रियों में शुमार रहे पीसी शर्मा भी पंडितजी की चेले जैसी बात ही कह रहे हैं। उनकी दलील है कि भले ही नाथ को इस घोटाले की जानकारी मिल गयी थी, लेकिन उस समय के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री भाजपा के साथ जाकर प्रदेश से बाहर बैठ गए थे, इसलिए सरकार इस दिशा में कार्यवाही नहीं कर सकी। है न जोरदार जवाब! अंदाज बिलकुल 'छाया था संकट, याद आयी थी नानी, चावल बिक गए, हम का जानी,' वाला।


गोया कि नाथ सरकार का संचालन शायद तोमर ही कर रहे थे। पीसी भाई यूं समझदार व्यक्ति हैं। ऐसा बचकाना बयान नहीं देते, लेकिन आखिर वह भी इंसान हैं। उन असंख्य कांग्रेसियों की तरह व्यथित हैं, जो केवल पंद्रह महीने सत्ता का सुख भोग पाए और फिर विपक्ष में लाकर बिठा दिए गए। शर्मा ही क्या, तमाम कांग्रेस वालों के लिए दिसंबर, 2018 के दूसरे पखवाड़े के बाद का समय अपने-अपने स्तर की पंचवर्षीय योजनाएं बनाकर उन पर पर अमल करने का था। शर्मा भी उस समय जनसेवा के भाव से सपरिवार ओतप्रोत थे। सेवा में कोई कमीं नहीं रह जाए, कहा जाता है कि इस पुनीत उद्देश्य से ही उन्होंने उस समय विदेश में रह रहे अपने बेटे को स्वदेश बुलवा लिया था।


कोई एक उपन्यास पढ़ा था, नाम याद नहीं आ रहा, उसमें सुनियोजित तरीके से बनाई गयी किसी योजना में भी पलीता लगने का जो हैरतअंगेज घटनाक्रम दिखाया गया था, वैसा ही मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार और उसके प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष 'हितग्राहियों' के साथ हुआ। ऐसे में वैसा बयान देने जैसी मानसिकता का उपज जाना पूरी तरह स्वाभाविक है, जैसा शर्मा ने चावल घोटाले पर कहा है। हां, उनकी इस मांग में दम है कि मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जाना चाहिए। ठीक है, राज्य की एजेंसी से ही जांच का मामला हो तो, 'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में फैसला देगा' वाली आशंका वाजिब तौर से सामने आ जाती है। निश्चित ही मामले की जांच निष्पक्ष एवं शीर्ष स्तर पर होना चाहिए। लेकिन जांच तो इस बात की भी हो ही जाए कि कहीं पीसी शर्मा उस समय कमलनाथ से अधिक महत्व प्रद्युम्न सिंह तोमर को तो नहीं दे रहे थे?


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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