सामूहिक बलात्कार, निर्भया, मोमबत्तियां, सोशल मीडिया, कानूनी बदलाव, टेलीविजन चैनल



बात केवल यह नहीं कि बलात्कार की वारदातें रुकने का नाम नहीं ले रहीं। बहस यह भी नहीं कि रेपिस्ट को फांसी की सजा दी जाए या दंड की चालू व्यवस्था जारी रखें। पूरी चिंता यह नहीं कि तेलंगाना में एक महिला डॉक्टर की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या ने यह अहसास गाढ़ा कर दिया कि हम निर्भया के भय से अब तक मुक्त नहीं हो सके हैं। हां, इस सारे विमर्श में बलात्कार का मुद्दा कॉमन है। बराबरी से डराता हुआ। समानता के साथ शर्मसार करता हुआ। देश गुस्से में है। हैदराबाद की बेटी के साथ जो हुआ, वह यकीनन क्रोध दिलाएगा। आज भी हमारा यह भाव यदि प्रदर्शन करने, मोमबत्तियां जलाने या सोशल मीडिया पर निंदा करने तक ही सिमटा रहा तो समझ लीजिए कि भविष्य में फिर ऐसे ही किसी घोर पैशाचिक कृत्य को सुनने/देखने के लिए तैयार रहना होगा। असल में हम अपनी एक बहुत बड़ी कमी उजागर कर चुके हैं। वह भी उनके सामने, जो चाहते हैं कि हम ऐसी एक न एक कमी से लदे रहें। वह खामी यह कि निर्भया के बाद हुए कानूनी बदलाव को हमने अपनी जंग की सफलता के रूप में ले लिया। मान बैठे कि गंभीर अपराध होने पर नाबालिग को बालिग की श्रेणी का माना जाना इस तरह की वारदातों पर स्थायी रोक लगा देगा


हम तो सोने पे सोहागा की शैली में इस बात से भी हर्षित हो गए कि नाबालिगों के साथ रेप के मामले में फांसी की सजा का प्रावधान कर दिया गया है। गरीबों के एक नेता को लेकर कहानी लिखी गयी। वह घोर गरीबी में पला-बढ़ा था। हिम्मती था। गुस्सैल भी। गरीबों ने उसे अपना नेता चुन लिया। अमीर डर गये। वह उसकी ताकत से वाकिफ थे। तब एक सयाने अमीर ने रास्ता निकाला। गरीबों के नेता को अपने पास बातचीत के लिए बुलाया। उसे अपने मेहमानखाने में ठहराने के इंतजाम किए। कहा, ‘आप कुछ दिन आराम कीजिए। तब तक मैं बातचीत का मसविदा तैयार करता हूं।’ गरीबों का नेता मान गया। उसने दनादन एक ही सांस में अपनी मांगें गिना डालीं। फिर उनके मसविदे में शामिल होने की बात से आश्वस्त होकर वह आलीशान मेहमाननवाजी का आनंद लेने लगा। उसे जमकर महंगा खाना खिलाया गया। विलायती शराब से तो मानो उसने स्नान करना सीख लिया। खिदमतगार इतने कि उसे पानी पीने के लिए भी गिलास उठाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। यह सिलसिला करीब एक महीने चला। गरीब यह भूल ही गया कि मसविदा अब तक नहीं बना है।फिर एक दिन मेजबान ने उससे मुलाकात की। पूछा कि उसकी खातिर मे कोई कमी तो नहीं है। गरीब ने अपनी खुशी प्रकट की।


इसके बाद अमीर ने मसविदे की बात छेड़ी। मेहमान द्वारा की गयी मांगें दोहरार्इं। अपनी ही बतायी उस फेहरिस्त को सुनते-सुनते गरीबों का नेता घबरा गया। उसे याद आया कि अब चर्चा का समय आ गया है। यह खत्म हुई और उसे फिर वापस उसकी निर्धनता के जीवन में लौट जाना होगा। महीने-भर के ऐशो-आराम ने उसकी तबीयत बदल दी थी। उसने अमीर से गुजारिश की कि वह अपनी सारी मांग वापस ले रहा है, बशर्ते उसे उसी मेहमानखाने में रहने की इजाजत दे दी जाए। अमीर कामयाब हो गया। उसने गरीब को उसी जगह पर नौकरी दे दी। ध्यान से सोचे तो पाएंगे कि बलात्कार के मामलों में ऐसा ही किया गया है। हो सकता है कि यह अलग-अलग मोर्चों पर किया गया हो, लेकिन किया इसे समान भाव से है। सबसे पहले वह मीडिया इसका षड़यंत्रकारी बना, जिसने निर्भया आंदोलन को हमारी बहुत बड़ी सफलता बताकर पेश किया। हम निहाल हो गये। यह सोचकर कि हमारे संघर्ष की सच्चाई के चलते हमें अखबार और टेलीविजन चैनल में जगह पाने का मौका मिल गया। कुछ टीवी डिबेट में भी प्रकट होने का अवसर पा गये। अगले चरण में राजनीतिज्ञ सक्रिय हुए। आंदोलन के आगे कुछ यूं झुके कि लोग निहाल हो गये।


फिर वे स्तंभकार आगे आये, जिन्होंने इस आंदोलन को स्वतंत्रता संग्राम से भी जोड़ने में देर नहीं की। कुल मिलाकर यह माहौल बना दिया गया कि हम जीत चुके हैं। लेकिन क्या वाकई हम विजयी हुए थे? नहीं, निर्भया का एक-एक कातिल अब भी जिंदा है। मध्यप्रदेश में नाबालिगों से रेप करने वालों को फांसी की सजा देने के कानून का आज तक एक भी मामले में अमल नहीं आ सका है। यह डर का माहौल कायम न होने की ही वजह है कि हैदराबाद में लेडी डॉक्टर को सामूहिक रेप के बाद मार डाला गया। वजह यह कि आत्ममुग्धता के चलते हमने यह देखने का प्रयास ही नहीं किया कि कानून बन तो गया, किंतु उसके प्रभावी अमल की दिशा में कोई भी कदम नहीं उठाया गया है। दरअसल हमें फूल कर कुप्पा होने का नशा चढ़ा हुआ है। हमारी हिम्मत और ताकत कुछ नारेबाजी तथा शोशेबाजी तक ही सिमट कर रह गयी है। आबादी से लेकर संसाधन तक की तुलना में हमसे छोटे चिली और ईराक जैसे देश अपने यहां सुधारों को लेकर लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। लोग सड़कों पर शहीद हो गये। अनगिनत जख्मी हुए हैं। दुनिया का मीडिया उन्हें निर्भया आंदोलन के समान ही महत्व दे रहा है, लेकिन आंदोलनकारी किसी बहकावे में नहीं आ रहे। उनका लक्ष्य स्पष्ट है।


उस तक पहुंचने के लिए वे सतत रूप से डटे हुए हैं। मैं नहीं कहता कि हम भी बलात्कार के खिलाफ आंदोलन में शहीद हों। लेकिन यह तो हो ही सकता है ना कि लड़ाई को अंजाम तक ले जाने के जज्बे से मुंह न मोड़ा जाए। बलात्कार इस व्यवस्था का ऐसा कोढ़ है, जिसका पूरी तरह इलाज संभव नहीं दिखता। लेकिन हम अपनी चेतना को निरंतर जाग्रत रखकर उसके खिलाफ बेहद सख्त कानून अमल में लाने लायक माहौल तो बना ही सकते हैं। एक बात और ध्यान रखिए। निर्भया कांड के बाद से एक समूह की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह वह लोग हैं, जो सजा-ए-मौत के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। ऐसा उस समय बहुत तेजी से हुआ, जब मौत की सजा बलात्कार के मामलों के लिए पुरजोर तरीके से मांगी जा रही है। जाहिर है कि यह हमें वैचारिक रूप से दबाने की कोशिश है। वह स्वर कमजोर करने का षड़यंत्र है, जो चाहता है कि बलात्कार के मामलों में ऐसी सख्त सजा हो कि बाकियों के मन में खौफ बैठ जाए। निर्भया से हैदराबाद तक का यह दु:खद सफर हमने इसलिए तय किया कि हम आधी लड़ाई लड़कर उसे पूरी जीत समझ बैठे। यह गलती अब न करें। मोमबत्ती जलाने की बजाय जनआक्रोश का वह प्रकाश फैलायें, जिससे कानून बनाने और उनका पालन कराने वाली एजेंसियों की नीयत खुलकर सामने आ जाए। फैज अहमद फैज ने लिखा है कि ‘...चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आयी।’ तो उठिए। फिर चलिए। उस मंजिल की ओर, जो अभी भी छलपूर्वक बहुत दूर लगातार सरकायी जा रही है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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