भाजपा का यह जूनून



बात कुछ पुरानी है। एक उद्योगपति मित्र से मुलाकात हुई। उन्होंने एक किस्सा सुनाया। उनका उत्पाद बेहद लोकप्रिय और भरोसेमंद था। एक विरोधी ग्रुप उनके ही क्षेत्र में उनके वाले ही उत्पाद की यूनिट लगाने जा रहा था। मित्र की कंपनी के सीईओ ने उन्हें प्रेजेंटेशन दिया। यकीन दिलाया कि प्रतिद्वंद्वी समूह से उनके उत्पाद की बिक्री और लोकप्रियता में दशमलव एक प्रतिशत का भी नकारात्मक अंतर नहीं आएगा। सीईओ तो ठीक, खुद मित्र भी इस दावे की असंदिग्धता के लिए पूरी तरह आश्वस्त थे। मगर उनकी जिद थी कि एक रणनीति तय की जाए। जिससे सामने वाला समूह उस क्षेत्र से खत्म किया जा सके। सीईओ ने कहा कि विरोधी समूह को काम करने दिया जाए। वह खुद ही हार कर चुप बैठ जाएगा। लेकिन उद्योगपति इस पर राजी नहीं हुआ। उसने रणनीति बनाई। विरोधी के मंसूबों को खत्म करके ही दम लिया


उसका कहना था कि बात केवल उसके एक प्रोडक्ट की नहीं है, बात उसकी पूरी कंपनी की मजबूती की है। बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष के भोपाल दौरे को देखते हुए मुझे यह बात याद आ गयी। संतोष दो दिन की बैठकें कर दिल्ली लौट चुके हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा से लम्बी और कई दौर की बातचीत कर चुके हैं। मंत्रियों को उन्होंने साफ कहा है कि उनके इलाके में उपचुनाव में यदि बीजेपी प्रत्याशी नहीं जीत सका तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना होगा। वे बूथवार जानकारी ले रहे हैं। पूरे सत्ताईस विधानसभा क्षेत्रों की नब्ज टटोल रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों? मुकाबला इतना कठिन तो नहीं दिखता। भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए केवल नौ सीटें ही जीतना जरूरी है।


लेकिन कांग्रेस को पूरी सत्ताईस सीटें जीतना जरूरी है। जाहिर है कठिन टास्क कांग्रेस के सामने है। कांग्रेस सत्ताईस में से अधिकांश सीटों पर कमजोर ही दिख रही है। उसके प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ मैदानी सक्रियता नहीं दिखा पा रहे हैं। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व खुद अंतरकलह से ऐसा जूझ रहा है कि मध्यप्रदेश की तरफ देखने की उसे फुरसत ही नहीं मिल रही है। जिन जगहों पर चुनाव होने हैं, उनमें से अधिकांश पर दिग्विजय सिंह की भी कोई खास पकड़ नहीं रही है।& बीएसपी ने जरूर सभी जगह चुनाव लड़ने का एलान किया है, लेकिन उसकी भी प्रदेश में अब पहले जैसी पूछ-परख नहीं रह गयी है। इसके बावजूद उसके लड़ने और कांग्रेस के कमजोर होने का फायदा भाजपा के खाते में ही दर्ज होगा।


ऐसे तमाम कमजोर विरोध के बावजूद भाजपा ने जिस तरह इस उपचुनाव के लिए ताकत झोंकी है, इसमें मुझे उस उद्योगपति जैसा ही जूनूनी मामला नजर आ रहा है। शिवराज, भगत, शर्मा और नरेंद्र सिंह तोमर सहित ज्योतिरादित्य सिंधिया भी लगातार सभाएं और अन्य कार्यक्रम कर रहे हैं। यह किसी एक चेहरे नहीं, 27 उम्मीदवारों नहीं, प्रदेश सरकार नहीं, बल्कि पूरी भाजपा का मामला है। उम्मीद यही है कि भाजपा को सत्ताईस में से अधिकांश सीटों पर विजय मिलना तय है, फिर भी वह चैन से नहीं बैठ रही। आत्ममुग्धता या अति-आत्मविश्वास की शिकार नहीं हो रही। क्योंकि उसका प्रयास है कि उम्मीद से भी अधिक सीटें जीतकर किसी चेहरे, प्रत्याशियों या सरकार की तुलना में पार्टी को अधिक ताकत प्रदान की जाए। यह गंभीरता इसलिए जरूरी है कि उन चेहरों की जीत सुनिश्चित की जाना है, जो कांग्रेस से भाजपा में आये हैं।


वे इस नए दल की चुनावी रणनीतियों और तैयारियों सहित अनुशासन के अभी अभ्यस्त नहीं हुए हैं। इसलिए मंत्रियों सहित पूरे पार्टी संगठन पर यह जिम्मेदारी आ गयी है कि इन नवागंतुकों की जीत का रास्ता तैयार किया जाए। दूसरी तरफ कांग्रेस में भ्रम दिखाई दे रहा है। कमलनाथ ने ग्वालियर-चम्बल संभाग का दौरा रद्द कर दिया। जबकि इस जगह पर कांग्रेस को सबसे ज्यादा ताकत लगानी है, खोयी सीटों सहित खोए हुए सम्मान की भी वापसी के लिए। मगर कमलनाथ पहले नई दिल्ली चले गए हैं। वहां वे आलाकमान को चुनावी तैयारियों की जानकारी देंगे। वहां से निर्देश लेंगे। फिर प्रदेश लौटने के बाद उनका दौरा कार्यक्रम तय किया जाएगा। यानि जहां भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खुद ही राज्य में आकर डेरा डाल चुका है, वहीं कांग्रेस के नेता 'दीवाने-खास' वाली मानसिकता से अब तक खुद को मुक्त नहीं कर सके हैं। चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो, किन्तु इससे भाजपा को संगठनात्मक रूप से उस ताकत का और डोज मिलना तय है, जिस ताकत का क्षरण ही आखिरकार पूरे देश में कांग्रेस की कमजोरी का कारण बन चुका है।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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