भगवान के लिए बचा लो इस भगवान को......



मैं सौ फीसदी इस बात पर यकीन रखता कि डाक्टर भगवान का रूप होता है। आज की तारीख में खुद इस भगवान की स्थिति क्या है, यह किसी से भी नहीं छिपा है। कहा जाता है कि भगवान गरीबों के दिल में निवास करता है। लेकिन हमारी सारी व्यवस्था गरीबों के ही पेट पर लात मारने में मगन है। इस परम सत्ता को सब कुछ देने में सक्षम बताया जाता है। हमें सिखाया गया है कि सवा रुपए के चढ़ावे का लालच देकर भी उन्हें अपने पक्ष में फुसलाया जा सकता है। ईश्वर को सृष्टि को संचालन करने वाली शक्ति भले ही कहा जाए, लेकिन हकीकत यह कि इस परम सत्ता के तमाम पूजा स्थल उसके पूजने वाली की मर्जी से खोले और बंद कर दिए जाते हैं। पूजा स्थल के अंदर बैठे टुकुर-टुकुर ये परम सत्ता सब देखती रह जाती हैं। कहने को तो ईश्वर कण-कण में हैं। लेकिन उसके नाम की दुकानों में उनके आसान दर्शन के लिए पैसा भी चुकाना पड़ता है। धर्म के शर्मनाक पूंजीपति स्वरुप के इस उदाहरण में गरीब श्रद्धालु घंटों लाइन में लगकर दर्शन की प्रतीक्षा करता है और भगवान भी इसमें उसकी कोई मदद नहीं करते। तो है यह कि भगवान को हर और पाखंड के भीतर कैद कर लिया गया है। यही हालत उसके जमीनी स्वरूप डाक्टरों की भी कर दी गयी है। पंडे-पुजारी रूपी नौकरशाहों ने भगवान के इस रूप को अपने हक में भुनाने का जरिया मात्र बना लिया है


कोरोना का निदान करने, मरीजों की सेहत सुधारने एवं उनके इलाज के लिए केवल मेडिकल स्टाफ सक्षम है। पूरी दुनिया में यह लड़ाई स्वास्थ्य कर्मियों की बदौलत ही लड़ी जा रही है। कोरोना के खिलाफ फ्रंट पर लड़ने वाले योद्धा यही हैं। लेकिन इस लड़ाई में हमारे देश में तो उसे पीछे धकेल दिया गया है। नौकरशाह हुक्म चलाना जानते हैं और डाक्टर को इलाज करना आता है। लेकिन हो यह रहा है कि मध्यप्रदेश में डाक्टरों को नौकरशाहों के हुक्म के मुताबिक इलाज का काम करना पड़ रहा है। बड़े शहरों में कलेक्टर और जिला और जनपद पंचायतों के सीईओ, एसडीएम वगैरह डाक्टरों को बता रहे हैं कि उनका कोरोना के लिए लाइन आफ ट्रीटमेंट क्या होना चाहिए। भले ही यह स्थिति अकेले मध्यप्रदेश की ना भी हो लेकिन अपनी खबरें तो यहीं की हैं। लिहाजा, शिवराज सरकार ने कोरोना से निपटने के नाम पर सिखों के मोहल्ले में हज्जाम की दुकान खुलवा दी हैं। अब मान लें किसी जिले में अचानक बीमारों की संख्या बढ़ने लगे. तो वहां क्या होगा। होगा यह कि डाक्टर अपनी छाती पर मूंग दल रहे प्रशासनिक अफसर को इसकी जानकारी देगा। अफसर उसे बताएगा कि अब क्या किया जाना चाहिए। बेचारा डाक्टर, पांच-दस साल की पसीने छुड़ा देने वाली पढाई और उसके बाद की तमाम अध्ययन प्रक्रियाओं से मिले ज्ञान को भूलकर प्रशासन के महारथी शख्स की बात मानने के लिए मजबूर होगा। ऐसे तो हो चुका कोरोना का इलाज।


अफसरों ने सरकार को भी 'मैं हूं ना' वाली तर्ज पर भुलावे की अफीम चटा दी है। वरना तो कोई वजह ही नहीं थी कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री कोविड-19 के निरंतर बेकाबू होते हालत के बीच तकनीकी सलाहकार समिति की एक भी बैठक नहीं लेते। जाहिर है कि इस बैठक में डाक्टर यह बता पाते कि राज्य में बीमारी के हालात क्या हैं? लेकिन मैं यहां भी गलत हूं। इस समिति में भी दो एमबीबीएस डाक्टर आईएएस हैं लेकिन उनका रवैया भी अब शासक का ही है लिहाजा, जो डाक्टर हैं, वे हां में हां के अलावा और कर भी क्या रहे होंगे? फिर भी अगर स्वास्थ्य मंत्री इस समिति की बैठक लेते तो हिसाब से सरकार परिस्थितियों पर नियंत्रण की नीति बना सकती थी। ऐसा नहीं किया जा रहा है। 'आल इज वैल' वाली अफसरों की टोली सरकार तक सच पहुंचने ही नहीं दे रही है। 'आल इस वैल' का जुमला फिल्म 'थ्री ईडियट्स' की देन है और मध्यप्रदेश में कोरोना के बिगड़ते हास्यास्पद हालात अनेकानेक 'फ्री ईडियट्स' की देन हैं। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में कोरोना के केवल गंभीर मरीज जा रहे हैँ। वहां सात मरीज भर्ती हैं और सातों वेंटिलेटर पर। यहां विशेष तौर पर तैयार वार्ड में सौ बैड हैं। उस पर भी अफसरों का आरोप कि हमीदिया की समूची व्यवस्था वार्ड बॉयज के हवाले है।


यह संभव नहीं है लेकिन जिन डाक्टरों को इलाज करना है, वे कलेक्टर सहित अपनी प्रशासनिक अफसरों का मुंह ताकने को मजबूर कर दिए गए हैं। व्यवस्था के साथ अनाचार का आलम यह कि जिले के सबसे बड़े इस सरकारी अस्पताल और मेडिकल कालेज में पलंग खाली पड़े हैं और राज्य के वे प्राइवेट अस्पताल कोरोना के 'स्टेबल' श्रेणी वाले मरीजों से भरे हुए हैं। निजी अस्पतालों की चांदी काटने की इस व्यवस्था का फायदा किस-किस के हिस्से में जा रहा होगा? मजे की बात यह कि स्वास्थ्य विभाग के नीचे के स्टाफ को केवल सर्वेक्षण के लिए ही बाध्य किया जा रहा है। इस तरफ किसी का धयान नहीं जा रहा कि आमतौर पर लोग इस रोग के लक्षण खुद ही बताने से कतराते हैं, इसलिए उनके बीच कायदे से जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए। इसकी बजाय घर-घर मरीज तलाशने का काम कराया जा रहा है। सैकड़ों जगह स्वास्थ्य विभाग का पूरा अमला सर्वे के लिए घर-घर जाकर बेइज्जत हो रहा है और इसका उसके मबोबल पर विपरीत असर होना तय है। कोरोना से लड़ाई दो दिन में तो खत्म होने से रही, यह लंबी चलेगी लेकिन सर्वेक्षण के काम भारी-भरकम टारगेट के साथ कराए जा रहे हैं। क्या ये उस देश में संभव है, जहां औसतन प्रति हजार मरीजों पर बमुश्किल दो डाक्टर ही मौजूद हैं! वैसे बता दें कि सर्वे का काम इसलिए हो रहा है, ताकि इसकी आड़ में महंगी जरूरी मशीनें खरीदने की प्रक्रिया शुरू की जा सके।


इस भयावह आपदा काल में भी राज्य में 'मिशन कमीशन' का सूत्रपात कर दिया गया है। प्रशासनिक अमला इस रोग की आड़ में कई विचित्र निर्णय भी ले रहा है। मूर्खता के चावल से भरी इस हांडी का एक दाना यानी भोपाल के जहांगीराबाद क्षेत्र को ही लें। वहां कोरोना से पीड़ित हो सकने की आशंका वाले या फिर ठीक हुए लोगों को कहीं और शिफ्ट करने की प्रक्रिया चल रही है। क्या ऐसे कर पाना किसी भी लिहाज से व्यावहारिक है? अब मामला 'साला मैं तो साहब बन गया' वाली मगरूर और शक्ति से सम्पन्न मानसिकता का है। इसलिए सीएमएचओ सहित बाकी डाक्टर्स भी चुपचाप ये हुक्म बजाने पर विवश हो गए हैं। ऐसे बेढब हालात के बीच अब जरूरी हो गया है कि देश में प्रशासनिक, पुलिस, राजस्व, फारेस्ट जैसी अखिल भारतीय सेवाओं की तर्ज पर ही 'अखिल भारतीय मेडिकल सर्विसेज' का गठन किया जाना चाहिए। कोरोना की इस आपदा ने देश को उसकी स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीरता से सोचने का मौका दिया है। वरना तो हर गंभीर हालात के मौके पर उस्तरा बन्दर के हाथ में ही होगा और उसका अंजाम सभी जानते हैं। अफसरशाही और डाक्टरों की बीच की इस दीवार को गिराना अब बहुत जरूरी हो गया है। 'दीवार' फिल्म का 'मेरे पास मां है' वाला संवाद तो याद होगा ही। तो समझ लें हम उन हालात में बीमार हैं, जहां हमें ठीक करने में सक्षम शख्स कहता है कि, 'मेरे पास आला (स्टेथोस्कोप) है और सामने से व्यवस्था के द्वारा उसे चित करने वाला जवाब आता है, 'मेरे पास आला अफसर हैं। यह दीवार जब तक नहीं गिरेगी, तब तक कोरोना हो या कुछ और, स्वास्थ्य सेवाएं रोना रोती रहेंगी। भगवान के लिए 'भगवान' को इन पाखंडों से बचाइए।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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