भदौरिया के इस गुस्से के मायने



अरविन्द भदौरिया यूं तो चम्बल के मीठे पानी वाले इलाके से आते हैं, लेकिन व्यवहार में ऐसा खारापन उनके भीतर इससे पहले शायद ही कभी देखने को मिला हो। हाल ही में शिवराज सरकार के सहकारिता मंत्री बने भदौरिया ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लेकर जो गुस्सा दिखाया, वह स्तब्ध कर देने वाला है। भदौरिया एक कार्यक्रम में आगबबूला दिखे। भदौरिया ने आरोप लगाया कि कांग्रेस में जब टूट हो रही थी तब दिग्विजय के इशारे पर पुलिस ने उनके भाई को घर से उठा लिया था। उनकी मां को भी परेशान करने की कोशिश की गई। करीब चार महीने पुराने इस घटना का जिक्र करते हुए भदौरिया ने शालीनता की सीमा-रेखा का अतिक्रमण कर दिया। ये भिंड में चंबल के पानी का असर भी हो सकता है या फिर ये अब सत्ता में होने का। संभव है कि माइक को सामने देखकर अरविन्द बेकाबू आचरण कर गए। या फिर यह भी मुमकिन है कि क्षेत्र की जनता की भीड़ ने उनके भीतर जोश के अतिरेक का संचार कर दिया हो


वजह चाहे जो भी हो, लेकिन ऐसा कहते और करते समय भदौरिया के चेहरे के एक्सप्रेशन बहुत स्वाभाविक लगे। उनका गुस्सा सियासी टच वाला नहीं दिखा। वह वाकई किसी बेहद तकलीफदेह लम्हे की जुगाली करते नजर आए। लेकिन वाणी पर संयम खोने के इस तरीके को मौजूद जनता की तालियों के बावजूद किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। राजनीति में अब ऐसी भाषा का चलन बढ़ गया है। मगर मध्यप्रदेश के लिहाज से यह सब खलने वाला मामला है। यहां राजनीतिक तो दूर, नेताओं के बीच के व्यक्तिगत मतभेद में भी ऐसी शब्दावली के इस्तेमाल के कम प्रसंग ही देखने को मिलते हैं। हां, याद करेंगे तो याद आएगा, जब 2003 में दिग्विजय सिंह के प्रति उमा भारती आग उगलती थीं तब उन्हें जनता की तालियां मिलती थीं। लेकिन वो बात अब पुरानी हो गई।


हां, सुर्खियों में बने रहने के लिए अमर्यादित आचरण के मामले राज्य में देखने मिले हैं, लेकिन भदौरिया को क्या अब किसी सुर्खी की जरूरत है? वह भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेताओं में से एक हैं। ग्वालियर-चम्बल संभाग से लेकर पूरे प्रदेश में इस दल के दिग्गजों में उनकी गिनती होती है। मंत्री के लिहाज से भारी-भरकम विभाग उन्हें मिल चुका है। यानी कोई भी ऐसी प्रत्यक्ष वजह नजर नहीं आती है, जिसके चलते कहा जा सके कि इस भाजपा नेता को चर्चा में बने रहने के लिए ऐसा हथकंडा अपनाने की जरूरत हो। तो फिर क्या हो सकता है इस बदजुबानी के पीछे? भदौरिया ने अपने भाई के साथ हुए व्यवहार के तुरंत बाद ऐसे तेवर दिखाए होते तो माना जा सकता था कि वह गुस्से में ऐसा कह गए। लेकिन यह नहीं हुआ। या शायद राजनीतिक जवाब देने का मौका ही उन्हें अब मिला हो। मामला फिलहाल कानूनी नहीं है, लेकिन एक अदालती मामले से इसे समझा जा सकता है।


सन 1959 में नौसेना के कमांडर मेजर केएम नानावटी ने अपनी पत्नी के प्रेमी की गोली मारकर जान ले ली। उन्होंने अदालत से कहा कि प्रेम सम्बंधों की बात सुनकर वह आपा खो बैठे थे। लेकिन कोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। जज ने कहा कि पहले नानावटी की पत्नी ने उससे बेवफाई की बात कबूली। इसके बाद आरोपी पत्नी और बच्चों को फिल्म दिखाने ले गया। इसी बीच किसी बहाने से वह अपने आॅफिस गया। वहां से उसने गन इशू करवाई। इसके बाद पत्नी के प्रेमी को उसके घर जाकर मार दिया। कोर्ट ने कहा कि सच पता चलने के बाद इतनी गतिविधियों को अंजाम देने के चलते यह तर्क नहीं माना जा सकता कि आरोपी ने यकायक तैश में आकर इस वारदात को अंजाम दिया था। ऐसा ही तो अरविन्द भदौरिया के मामले में भी दिख रहा है। वैसे दिख तो यह भी रहा है कि किस तरह बीते मार्च में अरविन्द भदौरिया अचानक पुलिस के लिए 'मोस्ट वांटेड' वाली श्रेणी में ला दिए गए थे।


तब कमलनाथ सरकार का सिंहासन डोल रहा था और सरकार पर 'बदलापुर' वाली राजनीति करने के खुलकर आरोप लग रहे थे। इसका शिकार संजय पाठक भी हुए थे और अरविंद भदौरिया भी। पुलिस ने भदौरिया के घर पर दबिश दी थी। उनके भाई को किसी पेशेवर मुजरिम की तरह थाने में बुलाया गया। बंद कमरे के भीतर पुलिस ने भदौरिया के भाई से छह घंटे तक क्या पूछताछ की। यहां तक कि उनकी बुजुर्ग मां को भी थाने में बिठा लिया गया था। उस समय की सियासी गतिविधियों को दिमाग में रखकर कहा जा सकता है कि किसी 'ऊपरी' इशारे पर दबाव में उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को परिवर्तित करने की कोशिश भी की गई थी। ऐसा करने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी ही हो सकते हैं। और शायद इसलिए लगता है कि उसी गुस्से का लावा अब भदौरिया के भीतर से फूट पड़ा होगा। आखिर अरविंद भदौरिया भी कांग्रेस के लिए दुखती नस के समान है। बैंगलोर के बाईस दिन और बाईस कांग्रेसी विधायकों की कहानी के भदौरिया अहम किरदार हैं। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह या फिर जीतू पटवारी और बेंगलुरू पहुंचे कमलनाथ सरकार के दूसरे मंत्री अरविंद भदौरिया की पहरेदारी में ही निराश होकर लौटे थे। जाहिर है तरीके सब अजमाएं गए होंगे। इसलिए अब जब मौका मिला है तो अरविंद भदौरिया में मौजूद चंबल का पानी इस मानसूनी सीजन में बेकाबू हो गया।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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