क्योंकि ये 'धंधे का समय' नहीं है.......



याद बरसों पुरानी है। मैंने कमाल अमरोही की लखनऊ के कोठों पर बनी फिल्म 'पाकीजा' दो बार देखी। पहली बार तो मैं सिनेमा हाल में देखने इसे अपनी मां के साथ गया था। जाहिर है, तब फिल्म के कथानक को समझने की उम्र नहीं थी। वयस्क होने के बाद मैंने इसे एक बार फिर सिनेमा हाल ही में देखा था। तब अपने समय के पर्याप्त रूप से 'खेले-खाएं' एक बुजुर्ग से फिल्म देखते समय मुलाकात हुई। उनसे बात हुई तो उन्होंने कहा, इस फिल्म से उनका खासा लगाव है, क्योंकि जवानी के दौर में वे नाच-गाना करने वाली तवायफों के ठिकाने (कोठे) पर खूब जाया करते थे। 'पाकीजा' में कोठों की शाही रौनक दिखाई गयी थी। कोठे के जो चंकाचौंध भरे सेट फिल्म में दिखाए गए थे, उनसे मैं भी प्रभावित था। मैंने उन बुजुर्ग से इस बारे में कहा तो वे बोले, 'वो कोठों की शाम की रंगत हुआ करती है। वह धंधे का समय होता है। लेकिन उसी जगह कभी दोपहर के समय चले जाओ तो वहां की गंदगी देखकर उल्टी कर दोगे।' बात की उदहारण सहित व्याख्या के लिए उन्होंने बताया कि गंदगी और बदबू से बजबजाते उस ठिकाने को शाम से पहले खुशबू से नहला दिया जाता है। सुबह से लेकर दोपहर ढलने तक अपने बाजारू जीवन का विलाप करती नाचने वालियों को सूरज ढलने से पहले नकली मुस्कराहट ओढ़कर दुल्हन की तरह तैयार होना पड़ता है


दिन भर मुंहफट संवाद से एक-दूसरे की आत्मा को जख्मी करने वाले वहां के लोग धंधे के समय से ठीक पहले तहजीब का लिबास पहनकर एकदम तमीजदार नजर आने लगते हैं। खेर,अब न कोठे हैं न वे तवायफें। मैं जानता हूँ कि अक्सर अतीत के किसी उदाहरण से वर्तमान को तोलना ठीक नहीं होता है। लेकिन जब मामला तुलनात्मक अध्ययन का हो तो ऐसा करना मजबूरी भी है। पलायन कर रहे मजदूरों की सड़कों पर दुर्दशा देखकर आज लग रहा है जैसे सत्तर साल पहले आजाद हुए देश की जो तस्वीर आज दिख रही है, वो केवल और केवल 'धंधे के समय' वाला नकली मामला ही निकला। वो शाम, जिसके मंच पर देश की सरकारों और शासक श्रमिकों के खून-पसीने को हीरे-मोती की उपमा देते रहे। मनोरंजन के वे तमाम साधन, जिनमें गरीबी को ईमानदारी का गहना बताया जाता रहा। साहित्य जगत की लेखक और पाठक वाली वह मंडलियां, जहां भारतीय देहात के गीतों से गुंजती सुबह, अनाज से भरे खलिहान और सुख-चैन से भरी रातों की बात कही- सुनी जाती है। वो समाज जहां, 'मजदूर को उसकी मजदूरी पसीना सूखने से पहले मिल जाना चाहिए' जैंसे संवाद पर सहमति के भाव से भरी तालियां गूंजती रहती हैं। ये सब आज पूरी तरह एक मुगालता और प्रायोजित सा दिखाई दे रहा है।


'वर्चुअल' यानी आभासी शब्द का चलन भले ही आज के तकनीकी दौर में बढ़ा हो, लेकिन सच तो यह है कि मानव को लेकर अमानवीय मेकेनिज्म के चलते हम बीते सात दशक से ज्यादा वर्चुअल माहौल में ही जीते चले आ रहे हैं। जबकि वास्तविकता जो है, वह दिन के उजाले में साफ दिख रही है। देश की सड़कों पर इधर से उधर पैदल चलकर मौत से पनाह मांगते मजदूर दिखा रहे हैं कि राजनीतिक नाचघरों की दोपहर कितनी घिनौनी है। सियासत का जो मीना बाजार हमारे दिल को लुभाता है, उसका काला सच क्या है। जो भारत गांवों में बसता था, वो आज सड़कों पर मर रहा है। 'दे दी हमें आजादी बिना खड़ग, बिना ढाल', गाकर गांधी को हमने नोट पर छाप दिया। गांधी की ग्रामीण भारत की जो अवधारणा थी, उसे शहरों के कोठों की नाचने वालियां बना दिया। गांव उजाड़ कर शहर बसा दिए। विकास की अवधारणा में संतुलन किया होता तो छत्तीसगढ़ और बिहार से सुदूर मुंबई और दिल्ली की झुग्गियों में मरने के लिए ये मजदूर शायद नहीं गए होते। एक कोरोना क्या आया, हमारी शामों की रंगीनी अचानक बेरंग हो गयी। साफ दिखने लगा कि जिस गरीबी को हटाने की चिंता को आजादी के बाद का सबसे बड़ा विमर्श माना जा रहा था, वह दरअसल कितना झूठा निकला। गांव की जिस आबादी को 'अन्नदाता' कहकर बुलाया गया, वास्तव में वह किस तरह अन्न के दाने-दाने के लिए मोहताज है।


गन्दगी को छिपाने का सबसे आसान रास्ता यह है कि उसे ढंक दिया जाए। देश की राजधानी से लेकर विकास की मिसाल बने तमाम महानगरों में यही किया गया। वहां की खुशहाल आबादी को देश की प्रगति का प्रतीक मान लिया गया। लेकिन अब उन्हीं शहरों से जो फटेहाल असंख्य गरीब निकलकर अपने-अपने मूल की और भाग रहे हैं, वह सच अब तक ढंका रह गया था। चिलचिलाती गर्मी के बीच खाली पेट और नंगे पांव मीलों-मील का सफर तय करने को मजबूर यह आबादी इस देश का वह सच है, जो आज तक छिपाया जाता रहा है। सत्ता के नाम पर देश में आज तक रंगीन शामों का माहौल तैयार करने के अलावा शायद और कुछ किया ही नहीं गया है। न ऐसा गरीबी हटाओ का नारा लगाने वालो ने किया और न ही अंतिम पंक्ति में सबसे पीछे खड़े शख्स के उद्धार का जुमला उछालने वाले इस दिशा में कुछ कर सके। अब सारा सच सामने आ गया है। वह भारत रास्ते की धूल फांकते हुए पेट भर रहा है, जिसकी भूख का वास्ता दे-देकर देशसेवा की कसमें खाने वाले गले-गले तक ठसाठस भरे हुए हैं। न केंद्र और न ही राज्यों की सरकारें इस वर्ग के लिए समुचित मदद का बंदोबस्त कर पायी हैं। राज्यों से उन्हें 'हांक कर' बाहर कर दिया गया। केंद्र और राज्यों की तरफ से उनकी चिंता तो की गयी किन्तु इस दिशा में काम नहीं हुए। नतीजा यह कि देश एक बार फिर विभाजन जैसे हृदयविदारक दृश्य देख रहा है। वे हादसों में मर रहे है।


दुधमुंहे बच्चों के भूख से बिलखने का दृश्य देखने के लिए मजबूर हैं। राज्य तथा केंद्र सरकारों की आज से लेकर पहले तक की घोषणाएं और नीतियों पर गौर कर लें। यदि इन सभी पर दशमलव एक प्रतिशत भी अमल किया गया होता तो आज गरीब मजदूरों की वह दशा न होती, जो दिख रही है। इन हालात ने साफ दिखा दिया है कि देश में खेती को लाभ का धंधा बनाने के उपायों में खोखलेपन के अलावा और कुछ नहीं था। यदि कृषि क्षेत्र लाभ का सबब होता तो कोई वजह ही नहीं थी की इतनी संख्या में ग्रामीण आबादी शहरों की तरफ पलायन करती, जितनी अब कोरोना काल में दिख रही है। इन परिस्थितियों से यह भी साफ है कि संगठित एवं असंगठित मजदूरों के नाम पर चलाये गए कार्यक्रम दरअसल झूठ का पुलिंदा साबित हुए हैं। वैसे जिस तरह राज्यों से मजदूर पलायन के लिए मजबूर किए गए या उन्हें वहां से 'जहां है, जैसा है' वाले हाल में ही जाने को विवश किया गया, उससे यह संदेह भी होता है कि यह सब किसी राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा भी हो सकता है। यह सभी जानते हैं कि कोरोना को लेकर इस गरीब-वंचित तबके की दुर्दशा का सारा ठीकरा आखिरकार केंद्र सरकार के सिर ही फोड़ा जाना है। हालात सामान्य होने के बाद यही श्रमिक दो जून की रोटी के लिए वापस इन्हीं राज्यों में जाएंगे। कोरोना के बाद वाले माहौल की तो अभी कल्पना ही नहीं है। ऐसे में इन 'बाहरियों' को अपने यहां आने देने में राज्य के लोग निश्चित ही आनाकानी करेंगे। चुनौतियां अभी बहुत अधिक बाकी है। फिलहाल तो राजनीती के कोठों की उल्टी कर देने लायक गंदी दोपहर ही सामने आ रही है। आगे और भी कई घृणास्पद सच इंतजार कर रहे हैं।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति