बचिए ऐसी आत्मघाती मानसिकता से



गोरखपुर में रसूखदार शख्स अरुण अग्रवाल ने बेटे का जन्मदिन धूमधाम से मनाया। करीब चालीस अतिथि खुले में रखे गए इस आयोजन में शामिल हुए। कर्नाटक में एक धार्मिक मेला लगा। जहां भारी संख्या में लोग बिना कोरोना के कहर की चिंता किए बिना शामिल हो गए। बिहार में एक मस्जिद पर मुस्लिमों ने ही हमला बोल दिया। वे इस बात से नाराज थे कि मस्जिद प्रबंधन द्वारा उनसे जुमे की नमाज घर मे बैठकर ही पढ़ने की गुजारिश की गयी थी। उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने कोरोना की जांच करने पहुंची डॉक्टरों की टीम पर हमला बोल दिया। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने अपने बेटे की शादी में सोशल डिस्टेंसिंग को भूला ही दिया। ये और इन जैसे कई घटनाक्रम बीते एक या दो दिन में ही हुए हैं। यानि लॉकडाउन के दूसरे दौर में


जाहिर हुआ कि पहले के इक्कीस दिन के लॉक डाउन के बाद यदि दूसरे की नौबत आई है तो इसके जिम्मेदार समाज के ऐसे तमाम तबके हैं जिनके लिए अपनी मजहबी मान्यताओं र व्यक्तिगत खुशी के लिए कोरोना जैसी महामारी का डर कोई मायने नहीं रखता। सवाल उठा रहा है कि आखिर ऐसा सब किये जाने के पीछे कौन सी नीयत काम कर रही है? गोरखपुर के अरुण अग्रवाल का बिहार में मस्जिद पर हमला करने वालों से कोई लिंक नहीं दिखता। कर्नाटक के धार्मिक आयोजन में शामिल हुए लोग निश्चित ही मुरादाबाद के घटनाक्रम या उसे अंजाम देने वालों से किसी भी तरह से नहीं जोड़े जा सकते। एक राजनीतिक परिवार जिसने देश में प्रधानमंत्री और प्रदेश को मुख्यमंत्री जैसे राजनेता दिए लेकिन उनकी समझ पर क्या सवाल उठाएं?; है तो यह बात उन अवज्ञा वाले आंदोलनों की जिनमें सविनय जैसे तत्व के सम्मिलित होने की कोई गुंजाईश ही नहीं रहने दी गयी है। ये तो खालिस बदतमीजी वाला मामला है। जाहिलों की करतूत है।


थोथे दम्भ में डूबे हुए हैं कि कोरोना वायरस का बाप तक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। जिस समय अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर भारत की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं। एक अखबार में पढ़े सर्वे के हिसाब से देश के 86 फीसदी लोग लॉकडाउन के सरकारी फैसले में साथ दिख रहे हैं। उसी काल में कुछ भारतीयों की ऐसी करतूत कई सवाल उठाती हैं। इसे एक उदाहरण से समझे। बात उन दिनों की है जब आचार्य रजनीश अमेरिका में चर्च लॉबी की आंख का मोतियाबिंद बन चुके थे। उस देश की बहुत बड़ी आबादी इस भारतीय के दर्शन से प्रभावित होकर वह आचरण कर रही थी, जो चर्च के पेट में मरोड़ उठाने लगा था। तब इसका इलाज तलाशा गया। भारत में ही कोलकाता में यकायक भारी संख्या में धर्म बदलकर ईसाई बने लोग सक्रिय किये गए। उन्हें अमेरिका सहित पश्चिम के कई देशों में भेजा गया। इसके पहले उन्हें ईसाईयत के प्रचार की पूरी ट्रेनिंग दी गयी थी। वे विदेश पहुंच कर इसी ट्रेनिंग के अनुरूप काम करने लगे।


इससे वहां यह सन्देश प्रसारित हो गया कि जिस ाूरब वाले ओशो की बातों से प्रभावित होकर पश्चिम, भारतीय दर्शन से प्रभावित हो रहा है, उसी पूरब मे तो ईसाईयत की पुरवाई का बोलबाला है। चर्च अपनी तरफ से छेड़ी गयी इस धार्मिक लड़ाई में इस पैतरे से सफल रहा।


तो क्या भारत में लॉक डाउन या सोशल डिस्टेंसिंग के विरोध के ऊपर बताये गए मामले भी ऐसे ही किसी षड़यंत्र का हिस्सा हैं! क्या इसके जरिये सारी दुनिया में ये दुष्प्रचार करने का जतन किया जा रहा है कि कोरोना से लड़ने के जिन तरीकों के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा हो रही है, दरअसल वे तरीके इस देश के लोगों (खासकर अल्पसंख्यक) की मजहबी और निजी स्वतंत्रता का हनन करने वाले हैं? क्या यह वैसी झूठी तस्वीर खींचने की साजिश है, जिसमें यह चित्रित किया गया है कि मोदी ने बेवजह ही समूचे देश को जेल में तब्दील कर दिया है? कोई बड़ी बात नहीं कि जल्दी ही यह भी प्रचारित कर दिया जाए किचिकित्सकों पर हमला इसलिए किया गया कि उनके जरिए देश के स्वस्थ अल्पसंख्यकों को भी कोरोना से संक्रमित करने की कोशिश की जा रही थी। इस्लामिक कट्टरपंथ के तौर पर सीरिया और इराक जिसे देशों में जो क्रूरता देखी गयी है, भारत सौभाग्य से वैसे उदाहरणों की श्रेणी तक अभी नहीं पहुंचा है। फिर भी इनमें से किसी भी देश में इस व्यवस्था का विरोध नहीं किया गया कि सामूहिक रूप से नमाज नहीं होने दी जा रही। कहीं भी ये समाचार नहीं सुना गया किइलाज करने वालों पर हमला करने, उन पर थूकने या फिर उनकी जान लेने के प्रयास किये गए हों। तो फिर हमारे देश में इतने भड़काने के काम क्यों किये जा रहे हैं? किसी भी अन्य बीमारी की तरह कोरोना भी जात या मजहब देखकर किसी को बख्शता नहीं है। लेकिन यहां मानसिकता ऐसी कि गोया किसी खास समुदाय या व्यक्तियों को यह वायरस 'अपना' समझकर कम से कम उसे तो चपेट में नहीं लेगा। अगर विकसित देशों की तुलना में बहुत कम चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद भारत में कोरोना अपेक्षाकृत कम पांव पसार पा रहा है, तो उसकी वजह ऐसे जाहिलों से अलग वह बड़ी आबादी है, जिसने तमाम दुश्वारियों को झेलते हुए भी सरकार द्वारा सुझाये गए एहतियाती उपायों का पूरी तरह पालन करने की समझदारी दिखाई है। वरना गोरखपुर के अग्रवाल, कर्नाटक के धार्मिक आयोजन के प्रतिभागी और जमातियों के अघोषित मानव बम ने तो समूचे मुल्क की स्थिति बिगाड़ने में कोई कसर नहीं उठा रखी है। बचना चाहिए ऐसे लोगों को भी आत्मघाती मानसिकता से। ऐसा करने से कोरोना से बचना और आसान हो जायेगा, यह तय है।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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