आवाज उठाएं इन लुच्चों के खिलाफ



देश में यह बरसात से नदी-नालों में ऊफान का समय है। भारी बारिश से जनजीवन प्रभावित है। लेकिन इसी देश में टीवी समाचार चैनल टीआरपी की झमाझम के लिए पत्रकारिता के सम्मान का पानी उतारने में पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती को लेकर टीवी चैनलों पर जो स्वांग रचे जा रहे हैं, उन्हें देखकर एक पत्रकार होने के नाते शर्म आने लगी है। कोई पिल पड़ा है कि रिया को हथकड़ी लगवाकर ही रहेगा। ऐसा करने की कोशिश को 'देश की आवाज' का नाम दे दिया गया है। और किसी पर जूनून सवार है कि भले ही सौ और सुशांत रहस्यमयी मौत मर जाएं, लेकिन रिया बिटिया को कुछ नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता के इन ठेकेदारों ने ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार नारद मुनि को भी पीछे छोड़ दिया है


महाभारत का संजय भी उनके आगे आउट डेटेड हो चुका है। नारद जी ने सिर्फ अपने को सूचनाओं के अदान प्रदान तक सीमित रखा। संजय ने जो देखा केवल वो ही बिना किसी लाग लपेट के धृतराष्ट्र को सुनाया। न नारद जी ने कभी निर्णायक बनने की कोशिश की, न संजय ने। लेकिन बाप रे...ये आजकल के कथित बड़े टीवी पत्रकार और एंकर बंद कमरों के बाहर से खड़े होकर बताते हैं कि रिया से सीबीआई क्या सवाल पूछ रही है? अब तो मामला इससे भी आगे बढ़ गया है। भाई लोग इस जिद पर उतरने के लिए सत्याग्रही बनने पर आमादा हैं कि सीबीआई को उनके द्वारा खड़े किए गए सवालों के आधार पर ही पूछताछ करना होगी। एक पुण्यात्मा देसाई थे, जो सेहत के लिहाज से स्व-मूत्र का पान किया करते थे।


एक कलयुगी सरदेसाई हैं, जो अपने एजेंडे की सेहत बनाये रखने के लिए सारे मीडिया जगत को विषपान करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। एक गोस्वामी तुलसीदास थे, जिन्होंने प्रभु भक्ति में लीन होकर रामचरित मानस जैसी मधुर रचना की और एक आज के गोस्वामी हैं, जो मीडिया की शक्ति में चूर होकर पत्रकारिता का चरित्र हनन करने पर तुले हुए हैं। वे खुद ही इस मामले में जज बन बैठे हैं। फैसले पर फैसले दिए जा रहे हैं। और हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य यह कि ऐसा सब प्रपंच उस स्तर पर पहुंचने के बाद किया जा रहा है, जिस स्थान पर बैठे किसी पत्रकार के लिए दलाल शब्द का इस्तेमाल करना इस पेशे के प्रति असहनीय पीड़ा से भर दे रहा है।


बीते कुछ दिनों से मीडिया में जो-कुछ दिख रहा है, उसके चलते मेरी उन पत्रकारों से अब कोई शिकायत नहीं है, जो कमीशन वाली पत्रकारिता करते हैं। वे तो उठाईगिरे वाली श्रेणी पर ही अपना कारोबार संचालित कर रहे हैं, लेकिन ये जो माफियानुमा पत्रकारिता चल रही है, उसने सारे देश को शर्मसार कर दिया है। पत्रकारिता की आत्मा को लहूलुहान कर दिया है। हालत यह है कि आज यदि कोई कुत्ता भौकने के समय 'रिया' जैसा स्वर उठा दे तो ये भाई लोग उसके पीछे पड़ जाएंगे। एक कहेगा कि कुत्ता रिया को बेगुनाह कह रहा है और दूसरा दावा करेगा कि यह चौपाया रिया को कसूरवार बता रहा है। सोशल मीडिया पर हमारे पेशे को लेकर चुटकुले चल रहे हैं। लोग हमारी पूरी जमात को जो मुंह में आये, वह कह रहे हैं। और ऐसा होना गलत भी नहीं है।


क्योंकि मूर्खताओं और पागलपन के चरम का कोई रिएक्शन तो आएगा ही। लग तो ऐसा रहा है, जैसे कि देश में न्यायपालिका सहित सीबीआई का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा है। जो है, वे उस मीडिया ट्रायल के लुच्चे हैं, जो सुशांत केस में फैसले दे रहे हैं। जी हां, मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ 'लुच्चा' कह रहा हूं। मीडिया के वे सारोकार जिंदा रखे जाने चाहिए जो इस पेशे की मूल भावना को जिंदा रखें। हम खबर देने वाले बनें, उसका विश्लेषण भी करें लेकिन फैसला देने वाले हम कैसे हो सकते हैं। यह समय है कि पत्रकारों को ही इस आचरण के खिलाफ आवाज उठाना होगी। यह साफ करना होगा कि पत्रकारिता के नाम पर चल रहे इस टीआरपी युद्ध के सख्त खिलाफ हैं। ऐसा करना बहुत जरूरी है, वरना एक गोस्वामी और एक राजदीप की वजह से हम और आप हर जगह हास्य के पात्र बन जाएंगे। हमारी गंभीर से गंभीर खबर या विचार को लोग दिल्ली में बैठी इन दो विभूतियों वाले हलके तराजू में तौलकर हमारे पेशे का सारा वजन खत्म कर देंगे। यह बड़ा खतरा है, सावधान होने का समय है।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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