आरोपी से पहले सिस्टम को कसें शिवराज



आबकारी अफसर पंकज जैन को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीधे बर्खास्त कर दिया। मामला गंभीर है। जैन पर नाबालिग के यौन शोषण का आरोप है। मामले की जांच से पहले ही इस अफसर की नौकरी खत्म कर दी गयी है। पंकज जैन पकड़ा भी रंगे हाथों ही गया है। 'न खाता, न बही, जो शिवराज करें,वही सही' की शैली में। एक तरह से देखें तो ऐसी कार्यवाही आज की बड़ी जरूरत बन चुकी है। इसे नजीर बनना चाहिए, लेकिन नासूर नहीं। बगैर समुचित प्रक्रिया के पालन के यदि ऐसे फैसले होने लगे तो निश्चित ही इस सख्ती का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। दलित संरक्षण सम्बन्धी नियमों सहित दहेज, घरेलु हिंसा और महिला उत्पीड़न के कई मामलों में हम कानून के अनुचित इस्तेमाल के अनेक उदाहरण देख चुके हैं। यह तय है कि जैन का मामला अदालत में लंबा चलता। हमारी अदालती व्यवस्था को रबर की तरह खींचने के तरीके बच्चों के खेल जैसे हो गए हैं


बहुत बड़ी तादाद में ऐसे गलत लोग हमारी बीच स्वच्छंद विचरण करते हैं, जिनकी सही जगह जेल है। लेकिन वे कानूनी दांव-पेंचों की बदौलत सजा पाना तो दूर, कार्यवाही से भी बचे रहते हैं। राजस्थान के चर्चित राजा मानसिंह हत्याकांड को ही लीजिये। पूरे पैंतीस साल लग गए, इसका फैसला आने में। गुरमीत राम-रहीम सिंह भी गंभीर आरोपों के बीच अदालती प्रक्रिया के सुराखों से बाहर निकलकर लम्बे समय तक अपना काम ठप्पे से चलाता रहा। फिर बहुत अधिक दूर क्यों जाना, मध्यप्रदेश में नाबालिगों से रेप के मामले में फांसी के कानून का आज तक एक भी मामले में अमल नहीं हो सका है। निर्भया सामूहिक दुराचार और हत्याकांड के दोषी सात साल तक मौत को लगातार चकमा देते रहे थे। उन्हें फांसी पर चढ़ाने में कानून को भी पसीना आ ही गया था। कई बार उनकी फांसी टली पर आखिरकार वे अपने किए की सजा पा गए। इस पर हम सिर्फ संतोष कर सकते हैं।


अब शिवराज ने कहा है कि नाबालिगों के यौन उत्पीड़न का कोई भी मामला सामने आने पर तुरंत ही जैन जैसी कार्यवाही की जाएगी। लेकिन क्या अदालत इसे स्वीकार करेगी? आज या कल में जैन कोर्ट का रुख करेगा। वहां अपने मानव अधिकार की दलील देगा। सुनवाई के अधिकार की दुहाई देगा। प्रक्रिया पूरी करने के बाद दोषी साबित होने के पहले आरोपी को मिलने वाले संरक्षण के करोड़ों मामलों को सामने रखने के उसके पास पूरे मौके हैं। इससे पूरी सम्भावना है कि वह सरकार के फैसले पर स्टे आॅर्डर हासिल कर ले। नियम-कायदे के ऐसे हश्र के चलते ही आज देश विकास दुबे या तेलंगाना में लेडी डॉक्टर के साथ ज्यादती कर उसकी हत्या करने वालों के एनकाउंटर पर जश्न मनाने लगा है। लेकिन क्या यह सब सही है? माया त्यागी से लेकर राजा मानसिंह वाले मामले तक स्पष्ट है कि अपनी पर उतर आने के बाद पुलिस किस हद तक जाकर अत्याचार कर सकती है।


इसलिए दो सही एनकाउंटर का उत्सव मनाने के बाद हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि यही खाकी किसी ऐसे ही मामले में पूरी तरह दागदार होकर हमारी नफरत की पात्र बन सकती है। एक फिल्म 'मोहन जोशी हाजिर हो' याद आती है। बुजुर्ग पात्र जिस किराए की बिल्डिंग में रहता है, वह खतरनाक हाल में पहुंच गई है। वह बिल्डिंग के मालिक के खिलाफ लम्बी अदालती लड़ाई लड़ता है। छह साल बाद अदालत एक जज को बिल्डिंग का मुआयना करने भेजती है। बिल्डिंग के सभी रहवासी आशा से भर जाते हैं कि अब उन्हें इन्साफ मिलेगा। जज खुद अपनी आंखों से इमारत के बुरे हाल देखता है। लेकिन कहता है कि अभी उसे इंजीनियर की रिपोर्ट देखना होगी। बाकी तमाम विशेषज्ञों से भी बात करना होगी, ताकि किसी पक्ष के साथ अन्याय न हो। इससे दुखी बूढ़ा इमारत के ही एक खम्भे से सिर पीट-पीटकर जान दे देता है और जज के ही सामने इस बूढ़े के मामूली प्रहारों से वह इमारत धवस्त हो जाती है।


सरकारी और अदालती कार्यवाहियों के इस नंगे सच को समझने की जरूरत है। शिवराज की नीयत में छिपी सख्ती के लिए कोई संदेह नहीं है, लेकिन ऐसे तमाम मामलों में आज तक जो देखा है, उसके अनुभव से यह तय है कि जैसे एक भी रेपिस्ट अब तक फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सका, वैसा ही अनुचित लाभ जैन और उस जैसे लोगों को मिलता रहेगा। शासन व्यवस्था नए नियम बनाने में ही यकीन रखती हैं। पुराने नियमों की कमी को दूर करने में उनकी खास दिलचस्पी नहीं रहती है। शिवराज को चाहिए कि उन अफसरों को नाप दें, जिनके चलते अदालतों को इस बात के लिए अब तक राजी नहीं किया जा सका है कि बच्चियों के दुराचारियों को तुरंत फांसी दी जाना जरूरी हो गया है। मुख्यमंत्री को चाहिए कि जैन जैसे हरेक मामले में जांच की प्रक्रिया को इतनी तेज गति दें कि आरोपी को समय से उसके किए की सजा मिले और उसके पास अदालती संरक्षण का भी रास्ता न रह जाए। ये सब मुश्किल नहीं है। सरकार की इच्छाशक्ति का मामला भर है। यदि शासन जैसी संस्था का गलत लोगों के बीच खौफ स्थापित करना है, अगर अदालती प्रक्रिया का गलत लाभ उठाने वालों को इससे वंचित करना है तो फिर सिस्टम में कसावट करना ही होगी। वरना इंतजार करें, उस दिन का, जब पंकज जैन सरकार के इस निर्णय के खिलाफ मुस्कुराता हुआ अदालत से आदेश लेकर फिर आप और हमारे बीच सीना ठोंक कर खड़ा हुआ नजर आएगा।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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