ऐसा शर्मनाक और घटिया मामला



लीजिए जनाब। बड़ी मछलियां गप से छोटी मछलियों को निगल गयीं। राज्यपाल लालजी टंडन के प्रोटोकॉल में चूक के लिए शिक्षा विभाग के उप संचालक बीबी सक्सेना और भोपाल के जिला शिक्षा अधिकारी केपीएस तोमर को निलंबित कर दिया गया है। टंडन इस बात से खफा थे कि छह सितंबर को मनाये गये शिक्षक दिवस के आयोजन में उन्हें बुलाने की प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। लाटसाब की भृकुटी टेढ़ी हुई तो कमलनाथ का सिंहासन ही डोल गया। मंत्री प्रभुराम चौधरी ने आयोजन में ही राज्यपाल से माफी मांगी। मुख्यमंत्री ने उनसे फोन पर चर्चा करके मामला संभालने की कोशिश की। इसके बाद तोमर और सक्सेना निलंबित हो गये हैं। कार्यक्रम के संयोजक धीरेंद्र चतुर्वेदी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है


मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि राज्यपाल आयोजन के ठीक पहले उन्हें निमंत्रित करने की औपचारिकता पूरी न किए जाने से नाराज थे। अब इस हिसाब से घटनाक्रम का विश्लेषण करें। शिक्षा विभाग के उप संचालक या जिला शिक्षा अधिकारी की क्या यह जिम्मेदारी/हैसियत हो सकती है कि राज्य के संवैधानिक प्रमुख को निमंत्रित करने पहुंच जाएं! तय मानिए कि इन दोनो या इनमें से किसी एक ने यह गुस्ताखी की होती तो मामला उनकी बर्खास्तगी तक पहुंच जाना था। फिर यह जिला स्तरीय आयोजन नहं था। मामला प्रदेशव्यापी था। लिहाजा साफ है कि स्कूल शिक्षा विभाग के मंत्री सहित प्रमुख सचिव और आयुक्त लोक शिक्षण से इतर और किसी की यह जिम्मेदारी नहीं थी कि राज्यपाल को आमंत्रित करता।


लेकिन जिस तरह नाथ की सरकार डर-डरकर चल रही है, उसमें यह उम्मीद बेमानी है कि किसी दिग्गज के सिर पर इसका जिम्मा रखा जाता। इसलिए हुआ यह कि अदने से लोग निलंबित कर दिये गये। राजभवन तक यह संदेश चला गया कि सरकार ने महामहिम के प्रोटोकॉल का पूरा ध्यान रखा है। सच्चाई से मुंह छिपाने की ऐसी शर्मनाक प्रक्रिया निर्लज्जता के बोलबाला वाले इस दौर में भी कम ही देखने को मिलती है। निश्चित ही कुछ समय बाद दोनो छोटे अफसरों का निलंबन खत्म हो जाएगा। क्योंकि स्पष्ट रूप से उन्हें उस गुनाह की सजा दी गयी है, जो मूलत: उनका था ही नहीं। लेकिन क्या निलंबन समाप्त होने से सब ठीक हो जाएगा! नहीं।


सक्सेना और तोमर की गोपनीय चरित्रावली में अब ऐसा काला अध्याय जुड़ जाएगा, जो उनकी भविष्य की तरक्की या वेतनवृद्धि सहित अन्य सकारात्मक प्रक्रियाओं में रोडेÞ अटकाता रहेगा। होना तो यह चाहिए कि खुद राज्यपाल इस मामले में दखल देकर अफसरों का निलंबन आदेश रद्द करवाएं। राजभवन के जिम्मेदार स्टाफ को चाहिए कि वह टंडन को समूचे घटनाक्रम की जानकारी दे एवं यह विशेष रूप से बताए कि प्रोटोकॉल के जिस नियम का उल्लंघन हुआ है, उस नियम की जिम्मेदारी किस स्तर के अफसर की होती है। ऐसा नहीं हुआ तो इस घटनाक्रम से बहुत ही गलत संदेश जाएगा। एक कहानी याद आ रही है। मशहूर साहित्यकार का उनके गांव में निधन हो गया। अखबार ने एक नये-नवेले रिपोर्टर को कवरेज के लिए भेजा।


बहुत दूर बसे उस गांव में दो दिग्गज पत्रकार भी अंतिम संस्कार की रिपोर्टिंग के लिए गये। अंत्येष्टि के लिए निर्धारित समय पर दोनो वरिष्ठ पत्रकार दारू के नशे में टुन्न होकर सोते रहे। जूनियर रिपोर्टर श्मशान पहुंचा। पता चला कि दिवंगत साहित्यकार के बेटे के न आ पाने के चलते अंतिम संस्कार एक दिन के लिए टाल दिया गया है। अगले दिन रिपोर्टर के अखबार ने यह खबर प्रकाशित कर दी। लेकिन दिग्गज पत्रकारों के अखबारों में अंतिम संस्कार का बकायदा पूरा समाचार छपा था। कहा गया कि साहित्यकार को मुखाग्नि देते समय आसमान भी लोगों के रुदन से कांप गया था। नतीजा यह हुआ कि सही खबर देने वाले पत्रकार को नौकरी से निकाल दिया गया। कोई उसका सच मानने को तैयार नहीं था, क्योंकि किसी में यह साहस नहीं था कि दिग्गज पत्रकारों की बात को गलत कह सके। राज्यपाल वाले ऐपिसोड में भी यही हुआ है। मामला गलत को गलत कहने की ताकत से अलग होने का है। मामला बहुत शर्मनाकऔर घटिया है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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