अभाव मूढ़ता का चरम नापने वाले पैमाने का



आप धारावाहिक क्राइम पेट्रोल देखते हों या न हों, लेकिन यह जरूर मानेंगे कि पुलिस वालों की समय को सूंघने की शक्ति बेहद गजब होती है। थाने में बैठकर कलम घिसते मुंशी से लेकर इलाके की कानून-व्यवस्था के लिए गश्त करने वाला अमला तक अपराधों को लेकर घोर अनुभवी होता है। तो इसी नौकरी के शीर्ष यानी डीजीपी पद पर बैठे वीके सिंह के लिए यह उम्मीद करना निरी मूर्खता ही होगी कि वह राज्य में अपराध के आरोपियों के साथ जातिगत आधार पर पूछताछ के अलग-अलग तरीके अपनाने वाला सर्कुलर झोंके में निकाल गये होंगे। यह सोचना भी गलत होगा कि सिंह को इस सर्कुलर पर दस्तखत करते समय नहीं पता होगा कि वह किसी नये विवाद का सूत्रपात करने जा रहे हैं


यह कल्पना आकाश कुसुम खिलाने जैसी असंभव होगी कि सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री कमलनाथ से परामर्श के बगैर वह ऐसा आत्मघाती कदम उठाने की महाभूल करेंगे। अब दो बातों की टाइमिंग पर गौर करें। पहली, अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी भी समय आने वाला है। दूसरी, सात नवम्बर यानी आज भोपाल में पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। जो लोग अयोध्या में मंदिर देखना चाहते हैं, उनके लिए इस मसले पर हिंदू समाज की एकता बहुत बड़ी आवश्यकता बन गयी है। साथ ही हिंदुत्व भाजपा की ताकत का बड़ा स्रोत भी है। एक ऐसी अवधारणा, जिसे ऊंच-नीच को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के प्रचार से आसानी से कमजोर किया जा सकता है।


देखिए ना, गृह मंत्री बाला बच्चन ने भले ही डीजीपी के पत्र का प्रकारांतर से विरोध किया हो, किंतु राज्य के आरक्षित वर्ग से मंत्री ओमकार सिंह मरकाम पुलिस कस्टडी में अनुसूचित जाति-जनजाति के आरोपियों से बिल्कुल सख्ती न किए जाने के फरमान के पक्ष में उठ खड़े हुए हैं। सोशल मीडिया पर हिंदू समाज ही आरक्षण के लाभ तथा नुकसान का चश्मा पहन कर डीजीपी के सर्कुलर की अपनी-अपनी तरह व्याख्या कर रहा है। डीजीपी महोदय कागज पर लिखी इबारत को मिटा सकते हैं, लेकिन उस कागज के जरिये हिंदू समाज में जो विभाजनकारी बीज बिखेरे गये, उन्हें अंकुरित होने से रोक पाना आसान नहीं होगा। तो कुल जमा यह कि यह पत्र किसी गहरी सोच का हिस्सा हो सकता है, जिसके परिणाम जल्दी ही नजर आएं तो किसी को हैरत नहीं होना चाहिए।


90 के दशक के अंत में सुंदरलाल पटवा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। भोपाल में एक भाजपा नेता को पुलिस उठा ले गयी। पार्टी के लोग एक मंत्री के पास पहुंचे। सिफारिश की कि नेता के साथ कुछ गलत न हो। मंत्रीजी ने जो पत्र पुलिस को भेजा उसमें लिखा गया था कि पकड़ा गया शख्स भाजपा कार्यकर्ता है, अत: उसकी न्यूनतम पिटाई की जाए। हास्य के बोध से भरपूर इस चिट्ठी से सर्वथा इतर डीजीपी का सर्कुलर क्षोभ से भर रहा है। एक बार मान लिया जाए कि पत्र को लेकर आरंभ में जतायी गयी आशंकाएं निर्मूल हैं तो फिर यह भी मान ही लिया जाए कि पुलिस के राज्य प्रमुख की सोच में कुछ खलल आ गया है। वरना वे यह कभी नहीं भूलते कि अपराधी का धर्म या जाति हो सकते हंै, लेकिन अपराध का न कोई धर्म होता और ना ही जाति।


पुलिस सेवा में आने से पहले ली गयी शपथ बुरे तत्वों के शमन की बात कहती है, किसी जाति विशेष को बचाने या निपटाने जैसा कोई जिक्र उसमें नहीं होता है। ऐसे में जाति या वर्ग के आधार पर पुलिसिया कार्रवाई का विभाजन किया जाना तो अंगे्रजों की फूट डालो और राज करो वाली घातक नीति से भी अधिक भयावह कदम है। कल को शायद यह सर्कुलर भी जारी कर दिया जाए कि आरक्षित वर्ग वाले आरोपी से पूछताछ और संबंधित मामले की पड़ताल करने का अधिकार भी इसी वर्ग के पुलिसकर्मियों के पास ही होगा। यह भी हो जाए कि अनुसूचित जाति/जनजाति वाले घोषित अपराधियों को जेल भेजने की व्यवस्था खत्म कर दी जाए। उन पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधान न लगाने की व्यवस्था लागू कर दी जाए। हम क्योंकि लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं, जहां वोट का सबसे ज्यादा महत्व है इसलिए होने को कुछ भी हो सकता है। अब ऐसा कोई पैमाना तो आज तक नहीं बना है, जिसमें मूढ़ता के चरम को तय किया जा सके। इसी मापदंड के अभाव का डीजीपी महोदय लाभ ले गुजरे और ऐसा ही चलता रहा तो इस दिशा में ऐसे और भी अनेक प्रहसन सामने आते रहेंगे।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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