18 सेकंड वाले कमलनाथ



कोरोना के लिए एक बात कही जाती है। यदि आप दस-बीस सेकंड तक एक साथ सांस रोक सकते हैं, तो मान लीजिये कि आप कोरोना के खतरे से बचे हुए हैं। यदि आप अठारह सेकंड तक सांस रोकने की मेहनत कर सकते हैं तो तय माने कि इस मेहनत का जबरदस्त फल खाते में दर्ज होना तय है। तो साहब मामला यह कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने डेढ़ दर्जन सेकंड का एक वीडियो जारी कर समर्थक और विरोधियों, दोनों को सकते में दाल डाल दिया है। सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए इस वीडियो में नाथ अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने पर खुशी जताते हुए दिखाई और सुनाई दे रहे हैं। वे इस कदम का स्वागत कर रहे हैं। इसे देश की जनता की इच्छा से जोड़ रहे हैं। अंदाज 'ब्रेथलेस' वाले शंकर महादेवन जैसा। वीडियो में कोई कट नहीं। किसी तरह एडिटिंग जैसा कोई लक्षण नहीं


होटल में परोसे जाते सिजलर तोे देखे ही होंगे। इसमें किसी खाने वाले सामान को आग की लपटों से ही घिरा हुआ परोसा जाता है। वीडियो में राम मंदिर के लिए ऐसी ही आरती जैसी अग्नि कमलनाथ की बातों में दिख रही है। अग्निहोत्र की पवित्र प्रक्रिया में अग्नि को भोजन का भोग लगाया जाता है। इस स्वरुप में कमलनाथ भी राम मंदिर की अलख में सियासी रोटी का भोग लगाते हुए ही दिख रहे हैं। यह उस नेता का म मानना है, जिसके सियासी केरियर में इस तरह की बात/भावना इससे पहले कभी भी नजर नहीं आयी। मंदिर हो या मस्जिद, हिन्दू हो या मुस्लिम, नाथ की टोन गांधी-नेहरू परिवार के संग युगल/सामूहिक गीत गाने जैसी ही रही है। वह गीत, जिसमें राम मंदिर के लिए इस तरह हार्दिक समर्थन की अब तक कम गुंजाईश ही देखी जाती रही है।


हालांकि मध्यप्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री बनने के लिए सक्रिय हुए कमलनाथ ने अपनी पहचान हनुमान भक्त के तौर पर भी प्रचारित की है। खैर, ये बदलाव खालिस सियासी है। बीते आम चुनाव से पहले राहुल गांधी का यकायक प्रकट हुआ जनेऊ खींच-खींचकर देश को दिखाया गया था। गांधी अचानक उस हिन्दू के रंग में रंग गए थे, जो दिग्विजय सिंह की थ्योरी के हिसाब से सनातनी हिन्दू नहीं कहा जा सकता। मगर इधर चुनाव खत्म हुआ और उधर जनेऊ सहित तमाम मंदिरों की सीढ़ियों से राहुल के पैरों के निशान भी गायब हो गए। नाथ भी बिलकुल ऐसा ही कर रहे हैं। 27 सीटों पर होने जा रहे विधानसभा के उपचुनाव में सफलता के लिए उन्हें हरसंभव कोशिश करना है। राम मंदिर निर्माण का समर्थन वाली बात करके वह ऐसा ही कर रहे हैं। अब कमलनाथ समर्थन करें या विरोध क्या फर्क पड़ता है।


राम मंदिर का निर्माण तो तय हो ही गया है। कांग्रेस सहित तमाम भाजपा-विरोधी दल इस बात को समझ गए हैं कि उनके द्वारा जिस छद्म धर्मनिरपेक्षता का आविष्कार किया गया, देश का बहुसंख्यक हिन्दू उससे बहुत नाखुश है। ऐसी नीति से चंद अल्पसंख्यक तो अपनी तरफ किए जा सकते हैं, लेकिन इसके रिएक्शन में बहुसंख्यक मतों के होने वाले ध्रुवीकरण की आशंका मात्र से ये दल अब सिहरने लगे हैं। इसलिए सभी को नाथ की ही तरह ट्रैक बदलना पड़ रहा है। ताजियों के विसर्जन के लिए दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन रोक देने वाली ममता बनर्जी के मैनेजर्स आजकल उनकी नियमित पूजा-पाठ के किस्से खूब प्रचारित कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा सहित हिंदूवादी संगठनों के बढ़े जनाधार ने ममता को ऐसे प्रचार तंत्र का सहारा लेने पर मजबूर कर दिया है।


कमलनाथ ने हनुमानजी की तस्वीर के नीचे बैठकर खुद को रामभक्त साबित करने का प्रयास तो कर दिया, लेकिन इसका असर क्या होगा? नाथ की यूं ही जनता के बीच अधिक अप्रोच नहीं है। फिर ऐसी बातें कर जिस वर्ग के वोटर को अपनी तरफ धर्म की डोर में बांधकर खींचा जा सकता है, उस वर्ग से तो नाथ का मुख्यमंत्री रहते हुए भी कभी सीधा संपर्क नहीं हो पाया है। ऐसे में तस्वीर के नीचे बैठकर नाथ इस बात का खुद ही संतोष कर सकते हैं कि शायद रामभक्त का आशीर्वाद उनकी झोली ने आ गिरेगा। वैसे इसकी कोई खास उम्मीद नहीं है। कमलमनाथ ने इसी साल जून में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर अपनी जो तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली, उसके लिए लगे इन आरोपों पर वह खुद डिफेंसिव हो गए कि तस्वीर एक साल पुरानी थी। हनुमान जी के साये में लिया गया यह वीडियो पुराना तो नहीं है, लेकिन इसका नयापन नाथ की अब तक की राजनीति को समझने वालों में अविश्वास का माहौल ही पैदा कर रहा है। इसीलिए 18 सेकंड का यह वीडियो सांस रोककर सुनने लायक तो है, लेकिन उसमें कमलनाथ इतना दम तो नहीं फूंक सके हैं कि उसे देख/सुनकर भाजपाइयों का दम फूल जाए।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति