नज़रिया

क्या सेक्स के इस खतरनाक एंगल में छिपा है श्रद्धा की खामोशी का रहस्य?

आफताब बेहद पेशेवराना तरीके से आगे बढ़ा और श्रद्धा शायद उसके इस जंगलीपन को 'सैडिज़म' वाले अंदाज में हलके में लेती रही।

‘वह उन पलों के दौरान बहुत जंगली हो जाता/हो जाती है ‘
फिल्मों से लेकर महानगरों में यह संवाद आम है। खासतौर पर संबंधो में खुलेपन की हिमायती पीढ़ी शारीरिक संबंधों की बातें साझा करते समय सामने वाले को इस या इस जैसे वाक्य में बताते हैं कि कैसे वह अपने पार्टनर के साथ संबंधों के दौरान बिलकुल जंगली व्यवहार का भी आनंद लेते हैं।
मामला बहुत पुराना है। मारियो पुजो ने अपनी किताब दी गॉडफादर में खुलकर बताया था कि कैसे माफिया सरगना की बहु सहेलियों को अपने पति के जननांग के बड़े आकर के बारे में पूरे आनंद के साथ बताती है। यह उपन्यास वर्ष 1969 में प्रकाशित हुआ था। बाद में इस पर इसी शीर्षक से बनी फिल्म में संबंधित चरित्र को अपनी सहेलियों के बीच दो हाथों की दूरी से इसी बात को बगैर किसी संवाद के समझाते हुए दिखाया गया था। उस दौरान नायिका की सहेलियों का चेहरा बताता है कि वह संबंध बनाने के पलों में नायिका को तकलीफ के बाद भी मिलने वाली खुशी को महसूस करने की कोशिश कर रही हैं।
श्रद्धा वॉकर की नृशंस हत्या का मामला सभी जगह चर्चा में है। उसे लिव इन रिलेशन के दौरान प्रेमी आफताब अमीन पूनावाला ने गला घोंटकर मार डाला और उसके शरीर के 35 टुकड़े कर दिए।
कई तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिनमें श्रद्धा का घायल चेहरा दिखाया गया है। कहा जा रहा है कि अल्ताफ की पिटाई के चलते उससे यह जख्म मिले। ताज्जुब की बात है कि इन तस्वीरों में भी श्रद्धा मुस्कुराती हुई दिख रही है।
श्रद्धा और आफताब के कॉमन फ्रेंड्स भी बताते हैं कि आफताब अक्सर श्रद्धा को पीटता था।
तो सवाल यह कि आजाद ख्याल और खुद के पैरों पर खड़ी सक्षम लड़की श्रद्धा यह सब क्यों सहती रही?
श्रद्धा के प्रति पूरे सम्मान के साथ यह कहा जा सकता है कि संभवतः यह मामला भी ‘वाइल्ड’ वाला ही रहा होगा। एक समय के बाद प्रायः प्रेम का विस्तार जिस्मानी संबंध तक हो जाता है और फिर इसके आदत में आ जाने के बाद होता यह भी है कि इन संबंधों में ‘अलग किस्म’ के प्रयोगों का सुख तलाशा जाए। तो क्या यह ताल्लुकात भावनात्मक रूप से इतने सघन हो गए थे कि ऐसी मारपीट भी ‘ही लाइक्स इट वाइल्ड’ या ‘शी लाइक्स इट वाइल्ड’ वाले सुख की शक्ल में ढल गयी थी?
वरना क्या वजह हो सकती है कि कोई सशक्त लड़की भी किसी असहाय अबला की तरह अपने साथ नियमित रूप से हो रही हिंसा को चुपचाप सहन करती रहती? क्या कारण हो सकता है कि जिसने आफताब की मारपीट को भुगता हो, वह उसके ‘सुधर जाने’ के आश्वासन पर यकीन कर एक बार फिर उसके साथ रहने के लिए चली आती? जिसने अपने फैसले के आगे अपने माता-पिता को भी ‘आज से मैं आपकी बेटी नहीं हूं’ कहकर चुप कर दिया, क्या वह इतनी कमजोर थी कि चंद समय पहले के दोस्त आफताब का इसी मुखर तरीके से प्रतिरोध नहीं कर सकी?
अब तक की बातों से यही लगता है कि आफताब बेहद पेशेवराना तरीके से आगे बढ़ा और श्रद्धा शायद उसके इस जंगलीपन को ‘सैडिज़म’ वाले अंदाज में हलके में लेती रही।
श्रद्धा का सच उसके साथ ही समाप्त हो चुका है। फिलहाल अनुमान चल रहे हैं और यह भी अनुमान ही हैं। शायद कभी आफताब ही सच पर पड़े पर्दों को हटा सके।
श्रद्धा के प्रति पूरे सम्मान और उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना के साथ  

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी बीते 35 वर्ष से लगातार पत्रकारिता तथा लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जन्मे एवं पले-बढ़े रत्नाकर ने इसी प्रदेश को अपनी कर्मभूमि भी बनाया है। वह दैनिक भास्कर और पत्रिका सहित ईटीवी (वर्तमान नाम न्यूज 18) राष्ट्रीय हिंदी दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' एवं पीपुल्स समाचार में भी महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे चुके हैं। त्रिपाठी को लेखन की विशिष्ट शैली के लिए खास रूप से पहचाना जाता है। उन्हें आलेख सहित कहानी, कविता, गजल, व्यंग्य और राजनीतिक तथा सामाजिक विषयों के समीक्षात्मक लेखन में भी महारत हासिल है। उनके लेखन में हिन्दू सहित उर्दू और अंग्रेजी के कुशल संतुलन की विशिष्ट शैली काफी सराही जाती है। संप्रति में त्रिपाठी मध्यप्रदेश सहित छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश के न्यूज चैनल 'अनादि टीवी' के न्यूज हेड के तौर पर कार्यरत हैं।

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