Wednesday, May 22, 2024

बचकाने सवालों में छिपी गंभीरता

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विदेश (Foreign) में बसे भारतीयों (Indians) में मेरे परिचितों की भी खासी तादाद है। गाहे-बगाहे सोशल मीडिया (social media) के जरिये उनसे संवाद भी हो जाता है। बातचीत का विषय जाहिर है अधिकांश वही हाल-चाल पूछने वाला रहता है। इधर बीते कई दिनों से मैं इन परिचितों से एक खास सवाल पूछने की अपनी इच्छा को बमुश्किल काबू कर पा रहा हूं। सवाल यह कि विदेश में यदि उन्हें सर्दी-जुकाम हो जाए, तो क्या वे इस बात का इंतजार करते हैं कि कब भारत की सरकार (Government of India) उन्हें दवाई लेने की सलाह दे या दवा का प्रबंध करे? क्या किसी ठन्डे मुल्क में मेरे भारतीय लोग इस बात की शिकायत करते हैं कि केंद्र सरकार उन्हें कंबल सहित गरम कपड़ों के इस्तेमाल की हिदायत क्यों नहीं दे रही है?

निश्चित ही सवाल बचकाना है, लेकिन बचपना तो इस समय जैसे चलन का हिस्सा बन गया है। यूक्रेन (Ukraine) से जान बचाकर स्वदेश आ चुके या ऐसा करने की कोशिश में लगे कई लोगों को देखिए। मीडिया सहित सोशल मीडिया में वे आरोप लगा रहे हैं कि भारत सरकार उनकी सुरक्षित वापसी का प्रबंध नहीं कर रही है। उन्हें शिकायत है कि स्वदेश वापसी के लिए उन पर कड़ी शर्तें लादी जा रही हैं। मीडिया के कुछ प्रायोजित समूह इन तकलीफों का ठीकरा केंद्र सरकार के ऊपर फोड़ने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं दे रहे हैं। दुर्भाग्य से ऐसा तब हो रहा है, जबकि यह तथ्य सर्वत्र दिख रहा है कि ज्यादातर भारतीय यूक्रेन से सुरक्षित निकाल कर लाए जा चुके हैं।

यदि ऊपर वाला मेरा सवाल बचकाना है तो इस सवाल को तो गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि आखिर इस स्थिति का दोषी कौन है? दुनिया-भर का मीडिया और विदेशी मामलों के जानकार रूस तथा यूक्रेन का युद्ध (war of russia and ukraine) शुरू होने के एक पखवाड़े से भी अधिक समय पहले से इसकी लगातार चेतावनी दे रहे थे। वे यह तक बता रहे थे कि नाटो और अमेरिका (NATO and America) सहित अन्य देश यदि यूक्रेन का साथ देते हैं, तब भी युद्ध के कितने भीषण नतीजे सामने आएंगे। ‘एयर लिफ्ट’ (‘airlift’) फिल्म भारतीय दर्शकों द्वारा खूब सराही गयी थी। इसमें खाड़ी युद्ध के समय फंसे भारतीय की विपदा को बखूबी चित्रित और प्रस्तुत किया गया था। तो क्या इस फिल्म को देखने वालों के दिमाग में भी यह बात नहीं आई थी कि इतने खराब हालात से जूझने से बेहतर है कि समय रहते यूक्रेन को छोड़ दिया जाना चाहिए? आखिर परिस्थितियों के इतने जटिल होने का इंतजार करने में कैसी समझदारी हो सकती है? ukraine में आप पढ़ भी रहे हो, तब भी क्या वह आप और आपके परिवार के लिए आपकी जान से इतना अधिक महत्व रखता है कि आप उसके मोहपाश में जकड़े रहें और फिर दन्न से केंद्र सरकार पर आरोप जड़ने लग जाएं कि वह आपकी सुध नहीं ले रही है? जान के लाले पड़ने वाले दौर में भी यदि कारोबार या शिक्षा आपके लिए इतने ही ज्यादा आवश्यक हैं तो क्या जरूरत है कि आप अपने देश लौटें? रुके रहिए वहीं और जता दीजिए कि ‘जान है तो जहान है’ वाला वाक्य आपके लिए महज कोरी भावुकता का प्रतीक है।

देश में कोई भी सरकार रही हो, एक समस्या हमेशा से रही है। उसे ब्रेन ड्रेन (brain drain) कहते हैं। भारत में शिक्षा लेने के बाद विदेश जाकर आगे की पढ़ाई और रोजगार करने वालों के लिए यह बात कही जाती है। जाहिर है इसके लिए हमारी सरकारों को दोष देने में कोई बुराई नहीं है कि आखिर क्यों हमारे यहां मेडिकल (Medical) और भी किसी विषय विशेष की पढ़ाई के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। हालांकि अब मोदी सरकार (Modi government) देश के हर जिले में मेडिकल कालेज (medical college) खोलने के मामले में आगे बढ़ रही है। निजी कालेजों की संख्या में भी वृद्धि हुई है लेकिन फिर भी अगर यहां फीस ज्यादा लग रही है और यूक्रेन जैसे देशों में कम है तो इसके बारे में भारत की सरकारों को विचार करना चाहिए। इसके अलावा बहुत से मामले ऐसे भी हैं जब देश में पढ़ाई करने के बाद लोग इसका लाभ विदेशों में जाकर दे रहे हैं। या इस जुगत में लगे रहते हैं कि किसी तरह उस देश की नागरिकता भी हासिल करके आप स्वदेश से अपनी जड़ों से हमेशा के लिए छुटकारा पा लें। ऐसे लोगों के लिए साफ मान्यता होना चाहिए कि किसी संकट या संक्रमण काल में उन्हें भारत से कोई अपेक्षा रखने का नैतिक अधिकार ही नहीं है।

यदि संकट के समय आपको देश की आवश्यकता है तो यह तथ्य भी आपको ध्यान रखना होगा कि इस देश को कभी आपकी आवश्यकता भी थी। युवाओं के लिए उच्च शिक्षा का प्रबंध कोई सरकार इसलिए नहीं करती कि वे पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी अन्य देश का रुख कर लें। ऐसी शिक्षा (Education) की नीति और उससे जुड़े कार्यक्रमों का अंतत: यही लक्ष्य होता है कि देश की भावी पीढ़ी अपने ज्ञान से देश के ही हित में काम करे। जो देश के इस लक्ष्य को नहीं अपनाते, उन्हें इस बात की अपेक्षा क्यों होना चाहिए कि यही देश किसी प्रतिकूल परिस्थिति में आपकी सुरक्षा तथा सुरक्षित वापसी को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बना ले? मेरे शुरूआती सवाल निश्चित ही बचकाने हैं, लेकिन उनमें छिपी गंभीरता पर भी गौर किया जाना चाहिए।

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