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निराश न हों कि अदालत कायम है अभी

जापान में एक स्वयंभू भगवान था शोको आसेहारा। विवादित पंथ संचालित करता था। नब्बे के दशक में उसके गोरखधंधे की कलई खुली तो एक खास बात सामने आयी। वह यह कि आश्रम में सजा बहुत विचित्र दी जाती थी। किसी गुनहगार को लोगों के मल-मूत्र में लेटने को विवश किया जाता। फिर उसे नहाने नहीं देते थे। सारी गंदगी तब तक उसके शरीर से लिपटी रहती थी, जब तक कि वह सूखकर झड़ न जाए। भारी-भरकम अपराधों की फेहरिस्त से सुसज्जित जीवन शैली वाले आसेहारा को बीते साल फांसी पर लटका दिया गया।  आगे पढ़ें

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शांत पंजाधारी कमलनाथ...शांत

हनी ट्रैप मामले पर कुंभकर्णी नींद से जागकर मुख्यमंत्री ने जिस स्वरूप का परिचय दिया है, उस पर प्रतिक्रिया के लिए न तो पर्याप्त शब्द मिल पा रहे हैं और न ही सही मनोभाव। छिंदवाड़ा, दिल्ली दरबार के बाद अब भोपाल स्थित मंत्रालय नाथ की राजनीतिक परिक्रमा का तीसरा पड़ाव बन चुका है। यहां अपने चैंबर में बैठे-बैठे नाथ पूरे प्रदेश की स्थिति पर तीखी नजर होने का भ्रम जीवित रखे हुए हैं। ठीक वैसे ही, जैसे राग दरबारी उपन्यास में शिवपालगंज की निकम्मी पुलिस को लेकर गलतफहमी थी। पूरी तरह साधन तथा क्षमता-विहीन उस पुलिस से आशा की जाती थी कि आसपास के ढाई से तीन सौ गांवों की हर हलचल पर उसकी नजर है। उसकी क्षमता इतनी कि अपराध होने के बाद तो दूर, वह ऐसा होने से पहले ही घटना स्थल तक पहुंच जाएगी।  आगे पढ़ें

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शहद की बिखरी कड़ियां

एक दौर में अपने वरिष्ठों के लिए भोजन के डिब्बों का इंतजाम करने वाले एक अन्य वर्तमान के सीनियर पत्रकार भी इस कांड की मजबूत कड़ी के मुख्य पात्र के तौर पर उभरकर सामने आये हैं। बता दें कि फिलहाल इन चेहरों पर पंचक की छाया साफ देखी जा सकती है। क्योंकि पुलिस के एक आला अफसर ऐसे कुछ लोगों से शुरूआती पूछताछ कर चुके हैं। पूरी उम्मीद है कि यह सिलसिला एक बार फिर शुरू हो जाएगा। यही वजह है कि कुछ वरिष्ठ पत्रकार अपने इन हमपेशाओं को बचाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका तक में सामने आ गये हैं। जाहिर है कि मामला सहयोग का नहीं, बल्कि खुद की किसी कमजोर रग का ही है। कैलाश विजयवर्गीय अगर कह रहे हैं कि कुछ पत्रकार इस कांड में शामिल हैं और कुछ मध्यस्थता कराने की कोशिश कर रहे हैं तो विजयवर्गीय के रसूख को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि वे कोई गलत बात कर रहे हैं। read more  आगे पढ़ें

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