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सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस को झटका, गुजरात की दो राज्यसभा सीटों पर अलग-अगल होंगे चुनाव

गुजरात विधानसभा में बीजेपी के 100 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के 77। यहां राज्यसभा सीट जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को 61 वोटों की जरूरत होगी। अगर दोनों रिक्तियों को भरने के लिए एक साथ चुनाव होते और विधायक सिर्फ एक बार में वोट देते तो कांग्रेस के पास एक सीट जीतने का मौका होता। लेकिन अब दोनों सीटों के लिए अलग-अलग वोटिंग होगी, जिसमें बीजेपी दोनों सीटों को जीत सकती है क्योंकि विधानसभा में उसका बहुमत है। इससे पहले 2017 में कांग्रेस को गुजरात में राज्यसभा चुनाव के दौरान काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि बीजेपी ने उसके विधायकों के बीच जबरदस्त सेंधमारी की थी। अहमद पटेल चुनाव भले जीत गए लेकिन इसके लिए कांग्रेस को अपने विधायकों को कर्नाटक के रिजॉर्ट में सुरक्षित रखना पड़ा था। अगर कांग्रेस के एक बागी विधायक का वोट रद्द नहीं हुआ होता तो अहमद पटेल चुनाव हार गए होते। राज्यसभा की सीटें दोनों ही पार्टियों के लिए काफी अहम हैं, खासकर महत्वपूर्ण विधेयकों पर वोटिंग के समय। बता दें कि चुनाव आयोग ने राज्यसभा की खाली हुई 6 सीटों (गुजरात की 2) पर 5 जुलाई को चुनाव कराने की घोषणा की है।  आगे पढ़ें

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गुजरात में खाली हुईं दो राज्यसभा सीटों के लिए नामांकन आज, 5 जुलाई को होगी वोटिंग

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने सोमवार शाम को ऐलान किया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ओबीसी नेता जुगलजी ठाकोर पार्टी के उम्मीदवार होंगे। गुजरात बीजेपी के चीफ जीतू वघानी ने बताया कि दोनों मंगलवार को पूर्वाह्न साढ़े 11 बजे पर्चा भरेंगे। जयशंकर सोमवार रात को अहमदाबाद पहुंच गए जहां राज्य के मंत्री प्रदीप सिंह जड़ेजा ने उनका स्वागत किया। इस साल मार्च में जयशंकर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों पद्म श्री सम्मान मिला था। उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार के वक्त अमेरिका के साथ परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभाई थी। वह चीन में भारत के राजदूत भी रहत चुके हैं। 2017 में डोकलाम विवाद के दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में भी अहम भूमिका निभाई थी।  आगे पढ़ें

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अमेठी में स्मृति इरानी के सहयोगी सुरेन्द्र सिंह की हत्या, सांसद हुर्इं भावुक, शव का दिया कंधा

सुरेंद्र सिंह की शवयात्रा के दौरान प्रदेश सरकार के मंत्री और विधायक भी मौजूद रहे। सुरेंद्र के परिवार ने हत्या के पीछे सियासी रंजिश को वजह बताया है। रविवार सुबह सुरेंद्र के बेटे अभय ने आरोप लगाया, 'स्मृति इरानी की जीत को लेकर हम लोग जश्न भी मना रहे थे, जो कई कांग्रेस समर्थकों को अच्छा नहीं लगा। कहीं ना कहीं राजनीतिक रंजिश के चलते पिता की हत्या की गई। हम स्मृति इरानी से अपील करते हैं कि पिता के हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर सजा दिलाएं।  आगे पढ़ें

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अमेठी में नई सुबह का आगाज, स्मृति की सक्रियता से गांधी के गढ़ में लहराया भगवा

दुकान चलाने वाली सुशीला शुक्ला ने बताया, 'मैं राहुल गांधी को वोट देने वाली अपने परिवार की इकलौती सदस्य थी। राहुल यहां पर किसी भी तरह का विकास करा पाने में असफल रहे हैं। वह अपने पिता राजीव गांधी के किए गए कामों पर ही जीतते आ रहे थे।' मुंशीगंज में संजय गांधी हॉस्पिटल के बगल में ही दुकान चलाने वाले एक दुकानदार ने कहा, 'राहुल गांधी को एक सबक सिखाए जाने की जरूरत थी। 2 या 3 हजार वोटों के अंतर से जीतना उनके लिए चिंता की बात होनी चाहिए थी। हालांकि हमने यह नहीं सोचा था कि वह हार जाएंगे, लेकिन सच यह भी है कि उनके खिलाफ भावनाएं बहुत अधिक थी।'  आगे पढ़ें

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अमेठी में हर 21 साल के बाद आखिर क्यों हार जाती है कांग्रेस, तीसरी बार मिली पार्टी को मात

इस हार में एक दिलचस्प आकड़ा 21 नंबर का भी है। हर 21 साल बाद कांग्रेस का यहां हारने का इतिहास रहा है और यह बात राहुल गांधी की हार में भी कायम रही है। पहली बार 1977 में इंदिरा गांधी की ओर से आपातकाल लगाए जाने के विरोध में देश भर में कांग्रेस विरोध लहर के दौरान संजय गांधी इस सीट से परास्त हुए थे। यह पहला मौका था, जब अमेठी सीट कांग्रेस के हाथ से छिनी थी। उन्हें जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने परास्त किया था। इसके ठीक 21 साल बाद 1998 में कैप्टन सतीश शर्मा को पराजय झेलनी पड़ी थी। उन्हें बीजेपी कैंडिडेट संजय सिंह ने परास्त किया था। 1998 के बाद अब फिर 21 साल पूरे हुए हैं और कांग्रेस के लिए नतीजा पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की हार के तौर पर सामने आया है।  आगे पढ़ें

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स्मृति इरानी का बड़ा बयान: कहा- पीएम मोदी राजनीति से संन्यास लेते हैं तो वह भी संन्यास ले लेंगी

स्मृति ने पीएम मोदी के लिए अपना सम्मान जाहिर करते हुए यह बात कही। मोदी खुद को प्रधानसेवक कहते हैं और इसी का हवाला देते हुए एक दर्शक ने पूछा कि क्या वह भी प्रधानसेवक बनने की रेस में हैं। इसी सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, 'जिस दिन प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी राजनीति से संन्यास ले लेंगे, मैं भी भारतीय राजनीति को अलविदा कह दूंगी।  आगे पढ़ें

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