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गंभीरता से न लें इस घटनाक्रम को

सिंधिया का नाथ से खफा होना और प्रत्युत्तर में मुख्यमंत्री खेमे की ओर से सिंधिया पर पलटवार करना अनपेक्षित घटनाक्रम का हिस्सा कतई नहीं हैं। ग्वालियर राज घराने के चश्मो-चिराग को उनकी पार्टी ने हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। कहते हैं कि बुरा समय चल रहा हो तो ऊंट पर बैठे शख्स को भी कुत्ता काट लेता है। सिंधिया राहुल गांधी के कंधे पर सवार होकर तेजी से आगे बढ़ रहे थे। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की बात आयी तो गांधी ने नाथ को गोद में उठाकर इस कुर्सी पर बैठा दिया। इसके बाद सिंधिया को उत्तरप्रदेश का जिम्मा सौंप दिया गया। बुरा समय इतना बुरा हुआ कि कांग्रेस यूपी के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी और सिंधिया अपने परिवार की परंपरागत गुना सीट से पराजित हो गये। दुबले पर दो आषाढ़ वाली इस कमजोरी ने सिंधिया को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के पद से भी दूर कर दिया है।  आगे पढ़ें

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कांग्रेस का ऐसा कमजोर नेतृत्व

कुछ समय पहले तक राहुल के खास लोगों में शामिल होते ज्योतिरादित्य सिंधिया भी चिंतन की जरूरत पर जोर देकर चिंता और चिता के बीच वाले फर्क को पाटने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा गये हैं। कांग्रेस में जब भी नेतृत्व कमजोर हुआ है, ऐसे हालात सामने आते देर नहीं लगती है। राहुल बतौर राजनेता कितने कमजोर हैं, यह तथ्य रह-रहकर सामने आता जा रहा है। गांधी-नेहरू की जन्मघूंटी पीने मात्र से जो ताकत उन्हें मिली, उसे देश की आवाम ने अधिकांश मौकों पर किसी कमजोरी की तरह खारिज कर दिया। सोनिया गांधी ने पूरी ऊर्जा के साथ पार्टी अध्यक्ष पद से विदा ली थी। इस यकीन से परिपूर्ण होकर कि कांग्रेस में विक्रमादित्य के सिंहासन जैसे अध्यक्ष पद को टेका-बल्ली देने वाली पुतलियां उनके चिरंजीव को संभाल ही लेंगी। ऐसा नहीं हुआ। उधर सोनिया गांधी अवकाश के दौरान गोवा में सायकिल की सैर करती दिखीं, इधर दिल्ली में उनके पुत्र मोह ने पार्टी की सायकिल के चक्के से रही-सही हवा भी बाहर निकाल दी। read more  आगे पढ़ें

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कांग्रेस नेताओं के बयान पर अधीर रंजन की नसीहत, कहा- चुनावी माहौल में ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जिससे हमें नुकसान हो

सलमान खुर्शीद ने बुधवार को कहा था कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति देखकर दुखी हूं। लेकिन मेरा पार्टी से मोहभंग नहीं हुआ है। हमें विचार करने की जरूरत है कि ऐसी हालत क्यों हुई। कुछ प्रभावी कदम उठाने होंगे, क्योंकि वक्त कम है। इस्तीफा देने के बावजूद राहुल गांधी प्रमुख नेता हैं। हालांकि, इससे पहले उन्होंने राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे पर कहा था कि लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा करनी थी, लेकिन हमारे नेता (राहुल गांधी) ने हमें छोड़ दिया। यहीं, सबसे बड़ी दिक्कत है। कांग्रेस के अंदर अभी एक खालीपन है।  आगे पढ़ें

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सलमान खुर्शीद ने पार्टी के भविष्य को लेकर जताई चिंता, कहा- चुनाव जीतने या अपना भविष्य बचाने में शायद ही सक्षम हो

लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल ने 25 मई को इस्तीफा सौंप दिया था। कांग्रेस 542 में से 52 सीटों पर ही जीत पाई थी, जबकि भाजपा को 303 सीटें मिली थीं। खुर्शीद ने आगे कहा, "मई में मिली हार के बाद राहुल ने आवेश में आकर इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उनकी मां को पार्टी की कमान संभालनी पड़ी। हो सकता है कि अक्टूबर में चुनाव के बाद पार्टी को नया अध्यक्ष मिल जाए।''  आगे पढ़ें

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भाजपा के ऐसे कुटिल नेता

मामला सीधा वंश के दंश का है। वंशवाद के बकवाद का है। पार्टी के राज्य स्तरीय आला नेताओं ने इसके लिए अभिलाष पांडे को लांचिग पेड में तब्दील कर गजब विचार करवाया है। तय हुआ है कि अब ऐसे नेताओं के चश्मो-चिराग यानी बेटे प्रदेश में युवा मोर्चा के सरकार के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में अलग-अलग जिलों में नेतृत्व करेंगे। दिग्गज नेता की औलाद होने मात्र से यदि नेतृत्व क्षमता मिल जाती होती तो इस देश को सियासत के मैदान में राहुल गांधी सहित तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव और अखिलेश यादव जैसे घोरतम असफल चेहरे देखने नहीं मिलते। और भी उदाहरण हैं। ये कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों में तो बहुत आसान है लेकिन भाजपा को इस मामले में अपवाद माना जा सकता था। बीते लोकसभा चुनाव में वंशवाद के खिलाफ पार्टी ने सख्ती दिखाई भी थी।  आगे पढ़ें

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वक्त और दिग्विजय सिंह

मुझे 1998 का वाकया याद है। दिग्विजय सिंह सर्वशक्तिमान थे। तब भी कांग्रेस का आलाकमान आज जैसा ही कमजोर था। तब भी सोनिया गांधी राजनीति में बस औपचारिक तौर पर आई हीं थी और नई-नई कांग्रेसाध्यक्ष बनी थीं। तब दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और जमुना देवी उनकी उप मुख्यमंत्री थीं। जमुना देवी अपने भतीजे उमंग सिधार के लिए गंधवानी से ही विधानसभा का टिकट चाहती थीं। बुजुर्ग आदिवासी नेता जमुना देवी ने लाख सर पटका लेकिन उमंग को टिकट नहीं मिला। अब उमंग अगर आज खुल कर दिग्विजय सिंह की बुजुर्गियत को भूल कर सामने खड़े हैं तो मन की टीस कहीं तो उभर कर सामने आ ही रही है। संयोग देखिए, सोनिया फिर कांग्रेस की नई-नई बनी अंतरिम अध्यक्ष हैं। दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने और जमुना देवी के नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उमंग ने धार लोकसभा से दो बार चुनाव लड़ा। दोनों बार कम अंतर से चुनाव हारे। read more  आगे पढ़ें

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दिग्विजय: कमलनाथ की जरूरत या मजबूरी?

जंगल का राजा शेर होता है और राज्य के जंगल मंत्री सिंघार ने भी किसी शेर की ही तरह दहाड़ भरी है। मंत्री बनने के बाद से ही उमंग के तेवर जिस तरह के दिखे, उससे साफ है कि जमुना देवी भले ही दिग्विजय सिंह के सामने कमजोर पड़ती रही होंगी लेकिन उमंग की बेक बोन कांग्रेस में दिल्ली तक मजबूत है। उमंग के संबंध राहुल गांधी तक सीधे हैं। और कमलनाथ के मंत्रिमंडल में ऐसे कई सारे चेहरे हैं जिनकी पहुंच सीधी ऊपर तक है। इसके अलावा उमंग के तार सिंधिया खेमे से भी जुड़े है हीं। उमंग के इस शक्ति के प्रदर्शन की टाइमिंग गजब की है। सिंघार तब गरजे हैं, जब कमलनाथ और दिग्विजय की युति को ज्योतिरादित्य सिंधिया भी सीधी चुनौती दे रहे हैं। ऐसे नाजुक समय में यदि सिंघार पर नाथ-सिंह की दृष्टि टेढ़ी हुई तो सिंधिया के अलावा राहुल का कवच भी काम आएगा ही। इसलिए सिंघार की इस दहाड़ के बावजूद उनके सियासी आखेट की दूर-दूर तक कोई सूरत बनती नहीं दिखती है। read more  आगे पढ़ें

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एक बहुत सुखद फैसला

यह मामला तो है सियासी दल यानी भारतीय जनता पार्टी का ही। इसलिए ठेठ नेतागिरी वाले नजरिये से इस निर्णय की समीक्षा करना बनता है। तो दो तत्वों पर गौर कीजिए। पहला, केरल। दूसरा, खान। वह राज्य जहां मुस्लिम लीग का खासा असर है। हिंदुत्व बनाम अल्पसंख्यक का हिंसक गणित आम बात है। इसी जातिगत गणित के चलते राहुल गांधी ने इस राज्य की वायनाड सीट पर खुद को सुरक्षित पाया। और वही राज्य, जिसमें जड़ें जमाने के लिए भाजपा लम्बे समय से हाथ-पांव मार रही है। ऐसे प्रदेश में एक बहुत सुलझे हुए अल्पसंख्यक चेहरे को राज्यपाल बनाकर भाजपा ने संदेश दिया है कि उसके यहं उदारवादी मुस्लिमों के लिए विशेष जगह कायम है। यूं भी सिकंदर बख्त, आरिफ बेग जैसे बुजुर्ग मुस्लिम नेताओं की कमी को पूरा करना जरूरी हो चुका था। नजमा हेपतुल्ला के बाद आरिफ इस कड़ी में अगला नाम हैं। जिन्हें भाजपा अपने प्रोग्रेसिव चेहरे के तौर पर देश के सबसे अधिक पढ़े-लिखे लोगों वाले राज्य के राजभवन में पहुंचा रही है। read more  आगे पढ़ें

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राहुल गांधी पर राज्यपाल मलिक ने दिया विवादित बयान, कहा- जो 370 के हिमायती हैं लोग उन्हें मारेंगे जूते

राहुल गांधी के बारे में पूछे गए सवाल पर मलिक ने कहा, मैं कुछ नहीं बोलना चाहता क्योंकि वो देश के प्रतिष्ठित परिवार का लड़का है। लेकिन वो एक पॉलिटिकल जुवेनाइल (सियासी नौसीखिए की तरह है। उसी का नतीजा है कि यूएन में पाक की चिट्ठी में उसके बयान का जिक्र है। वहीं कश्मीर में हिरासत में रखे गए नेताओं पर उन्होंने कहा कि- मैं 30 साल जेल में रहा हूं। जो डिटेंशन में हैं वो कुछ दिन बाद निकल कर कहेंगे कि मैं छह महीने जेल में रहा। चुनाव में यह कह कर खड़े होंगे। जो जेल में रहेंगे वो बाद में बड़े नेता बन जाएंगे।  आगे पढ़ें

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कश्मीर मुद्दे पर कांग्रेस ने रखी अपनी बात, कहा- कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है पाक हिंसा फैलाने आतंकियों का कर रहा समर्थन

राहुल ने ट्वीट किया, मैं इस सरकार से कई मुद्दों पर सहमत नहीं हूं, लेकिन यह साफ कर देना चाहता हूं कि कश्मीर हमारा आतंरिक मामला है। इसमें पाकिस्तान समेत किसी भी देश के दखल की जरूरत नहीं है। जम्मू-कश्मीर में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। पाकिस्तान यहां हिंसा फैलाने के लिए आतंकियों को उकसा रहा है। दुनियाभर में पाकिस्तान को आतंकियों का समर्थक माना जाता है।  आगे पढ़ें

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