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यक्ष प्रश्नों में उलझे राहुल गांधी

जिस पार्टी में भ्रम का कुहासा इतना गाढ़ा हो जाए, वहां कुछ लोगों का इस अंधेरे में लड़खड़ाकर इधर से उधर हो जाना स्वाभाविक बात है। नेतृत्व की कमजोरी को देखकर सिद्दारमैया ने कर्नाटक में जो दांव खेला, उसका नतीजा यह हुआ कि पूरी की पूरी सरकार खतरे में आ गयी। यदि इस समय कांग्रेस में वाकई अध्यक्ष नामक संस्था का सही में अस्तित्व होता तो यह संभव ही नहीं था कि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ऐसी कारगुजारी को अंजाम दे पाते। गोवा में कांग्रेस से अलग होकर नया गुट बनाने की घोषणा करने वाले विधायकों को रोकने के लिए पार्टी के पास कम से कम बीस घंटे का मौका था। लेकिन सारे के सारे महारथी दिल्ली दरबार के लिए सियापा करने में मसरूफ रहे और गुट के आकार लेने से पहले ही इस तटीय राज्य के दस विधायकों को भाजपा ने अपनी शरण में ले लिया। read more  आगे पढ़ें

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डाक्टर सिंधिया के नायाब नुस्खे

कांग्रेस की बीमारी की क्या गजब दवाईयां है? क्या घालमेल है यह ! राहुल भी तो ऊर्जा से भरे हुए थे। चुनावी सभाओं में चौकीदार चोर है, चीखते समय उनके भीतर की ताकत देखते ही बनती थी। पार्टी की बैठक में कांग्रेसियों को शेर बताते वक्त भी उनकी ऊष्मा का ताप साफ महसूस किया जा सकता था। भले ही शेष भाजपा-विरोधी दलों ने गांधी को रत्ती भर भी तवज्जो नहीं दी हो, फिर भी इन्हीं दलों की चिरौरी करते समय उनके भीतर के जुझारूपन को देखना एक सुखद अनुभव रहा है। तो फिर क्या वजह है कि सिंधिया को नये अध्यक्ष के लिए ऊर्जा वाली जरूरत बताना पड़ रही है? जहां तक सबको साथ लेकर चलने की बात है, गांधी ने इस मामले में भी निराश नहीं किया। वो कभी अखिलेश यादव को साथ लेकर चले तो कहीं उन्होंने जेएनयू में देश के टुकड़े-टुकड़े करने की कामना वाली गैंग के साथ कदमताल किया। यह बात दीगर कि उन्हें इस सबमें कभी कामयाबी नहीं मिल सकी। लेकिन कांग्रेस के भीतर उनका यह प्रयोग काफी हद तक सफल रहा। लोकसभा चुनाव में वह पूरे दल को साथ लेकर चले और खुद के साथ-साथ बाकी सबकी भी लुटिया डुबो दी। अब अंजाम चाहे जो भी हुआ हो, लेकिन सिंधिया की साथ लेकर चलने वाली इस सलाह पर भी गांधी खरे उतरे हैं। लिहाजा सिंधिया को यह साफ करना होगा कि नये अध्यक्ष से उनकी यह आशाएं गांधी की असफलता से प्रेरित हैं या नहीं। read more  आगे पढ़ें

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राहुल गांधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में स्वामी पर केस दर्ज

कांग्रेसियों का कहना है कि स्वामी ने राहुल गांधी और कांग्रेस का अपमान किया है। इस कारण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम के निर्देश पर शनिवार से राज्य मुख्यालय समेत प्रदेश के सभी जिला और विकासखंड मुख्यालयों में स्वामी के खिलाफ पुलिस थानों में तहरीर देने का सिलसिला शुरू हुआ।  आगे पढ़ें

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करामाती चिट्ठी का सही इस्तेमाल

चार पेज का चिट्ठीनुमा इस्तीफा पालतू कबूतर तो कबूतर, बल्कि उन गिद्धों की नजर से भी 39 दिन तक छिपा रहा, जो इस खत पर अपनी नजर गड़ाये बैठे थे। अब एक गूंगी, नीली चिडिय़ा ने इस खत की सार्वजनिक नुमाइश कर दी है। गजब की पाती है। नाना स्वरूप वाली। अदालत में पेश कर दो तो उसे भाजपा तथा संघ के खिलाफ आरोप पत्र की संज्ञा दी जा सकती है। बस केवल दिग्विजय सिंह को थोड़ा बुरा लगा होगा। खत में सारे कांग्रेसियों को उलाहना देते हुए लिख दिया कि भाजपा और संघ के खिलाफ मैं अकेला लड़ रहा था। जबकि कापीराइट तो दिग्विजय सिंह जी के पास भी है। वैसे इन चार पन्नों को पंजे वालों के बीच लहरा दो तो उसे अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है फिल्म की रील के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।  आगे पढ़ें

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राहुल के फैसले का प्रियंका ने किया बचाव, कहा- ऐसा साहस बहुम कम लोगों में होता है

कांग्रेस अध्यक्ष से इस्तीफा देने के एक दिन बाद पार्टी की महासचिव और राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने भाई के फैसले का बचाव किया है। प्रियंका ने राहुल के फैसले को साहसिक बताया है। प्रियंका ने ट्वीट कर कहा, 'राहुल गांधी जैसा करने का साहस बहुत कम लोगों के पास होता है। मैं आपके फैसले का आदर करती हूं।' बता दें कि राहुल गांधी ने बुधवार को सभी सस्पेंस खत्म करते हुए चार पेज का इस्तीफा ट्वीट कर कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने का ऐलान किया था।  आगे पढ़ें

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पार्टी के वफादार खड़गे को मिल सकता है अध्यक्ष का पद, शिंदे भी हैं रेस में

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है। खड़गे पार्टी के वफादार होने के साथ ही दलित चेहरा भी हैं। पिछली लोकसभा में खड़गे पर भरोसा जताते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी के नेता भी बनाया गया था। हालांकि, 2019 में खड़गे कर्नाटक में अपने मजबूत गढ़ माने जानेवाले गुलबर्ग से चुनाव हार गए हैं। पार्टी के एक और वरिष्ठ और दलित नेता सुशील कुमार शिंदे भी सूत्रों के अनुसार अध्यक्ष पद की रेस में हैं।  आगे पढ़ें

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आरएसएस मानहानि केस: राहुल गांधी को मिली जमानत, कोर्ट में कहा- मैं निर्दोष हूं

बता दें कि कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को कथित तौर पर आरएसएस-भाजपा की विचारधारा से जोड़ा था। इस पर कोर्ट ने उनके खिलाफ समन जारी किया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए संघ को दोषी ठहराने के आरोप में राहुल गांधी पर पड़ोसी ठाणे जिले के भिवंडी में एक और मानहानि का मुकदमा चल रहा है। दरअसल, वकील और आरएसएस कार्यकर्ता धु्रतिमान जोशी की निजी शिकायत पर मझगांव महानगरीय मजिस्ट्रेट की अदालत ने फरवरी में राहुल गांधी और मार्क्सवादी नेता सीताराम येचुरी को समन जारी किया था। जोशी ने 2017 में राहुल गांधी, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। निजी शिकायत में कोर्ट से पुलिस को इस पूरे मामले की जांच करने का आदेश देने का निवेदन किया गया था।  आगे पढ़ें

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नए पीसीसी चीफ को लेकर बढ़ी सरगर्मी, सिंघार के बाद सक्रिय हुए मरकाम

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष पर फैसले के बाद यह समझा जा रहा था कि मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का फैसला भी एक या दो दिन में हो जाएगा, लेकिन हाईकमान मप्र को लेकर फिलहाल जल्दबाजी में निर्णय नहीं लेना चाहता। मप्र की स्थिति छत्तीसगढ़ की तुलना में अलग है, क्योंकि मध्यप्रदेश में गुटीय संतुलन बनाने में हाईकमान को सामान्य परिस्थितियों में ही पसीना छूट जाता है तो ऐसे हालात में जोखिम लेने को कोई भी तैयार नहीं है। प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी जैसे दिग्गजों की सहमति से ही नया पीसीसी अध्यक्ष बनाने की कवायद होगी और इनमें से कमलनाथ व ज्योतिरादित्य सिंधिया अभी राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए मनाने में लगे हैं।  आगे पढ़ें

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कांग्रेस अध्यक्ष की एक हां के चक्कर में उलझे पड़े हैं मप्र के कई राजनीतिक मसले

सोमवार को कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के संग राहुल गांधी से मिलने गए कमलनाथ की मध्यप्रदेश से जुड़े मसलों पर शायद ही कोई चर्चा हुई हो। लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद से नाथ की यह तीसरी दिल्ली यात्रा है। पिछली दो यात्राओं में भी यह कयास लगाए जा रहे थे कि उनकी कांग्रेस अध्यक्ष से मुलाकात होगी, लेकिन एक बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संग और दूसरी बार गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर लौट आए। तीसरी यात्रा में वे राहुल से मिले, लेकिन अलग एजेंडे के साथ। राहुल गांधी की हां-ना के चक्कर में सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायकों के सब्र का बांध टूट रहा है। बुरहानपुर से निर्वाचित निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा भैया पिछले छह माह से कमलनाथ सरकार का समर्थन और विरोध कर समय काट रहे हैं। जब भी वे सरकार के खिलाफ मुंह खोलते हैं, सरकार का कोई दूत उन तक पहुंचकर मंत्रिमंडल में उन्हें शीघ्र शामिल करने का आश्वासन दे आता है। अगले ही दिन शेरा भैया का बयान बदल जाता है।  आगे पढ़ें

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क्या कर लेगा कोई और भी कांग्रेसाध्यक्ष...

कांग्रेस की पहचान तो देश भर में वैसे भी सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से रहेगी ही। पार्टी के सर्वमान्य नेताओं में शुमार तो परिवार का रहेगा ही। यानि स्टाम्प के लिए एक अदद अध्यक्ष चाहिए और परिवार का वफादार चाहिए। क्या राहुल की जगह लेने वाला कांग्रेसाध्यक्ष देश भर में दौरे कर कांग्रेस को खड़ा करने की कोशिश कर पाएगा? सुशील कुमार शिंदे को तो महाराष्ट्र में दलित नेता माना जाता है, लेकिन क्या वे कांग्रेस से टूटे उसके दलित जनाधार को महाराष्ट्र में भी लौटा पाएं? क्या वे मायावती या रामविलास पासवान जैसे दलित नेताओं जितना आधार भी इन समुदायों में रखते हैं। मायावती का उत्तरप्रदेश में प्रदर्शन चाहे जैसा हो, उनका समर्थक एक तयशुदा वोट प्रतिशत तो उनके पास है। पासवान बिहार की कम से कम पांच सात सीटों पर तो अपना आधार रखते ही हैं। शिंदे के पास ऐसी कोई खूबी महाराष्ट्र में भी रही हो, इसमें शंका है। इसलिए अगर राहुल गांधी को हटाकर कांग्रेस को पार्टी में केवल प्रतिकात्मक बदलाव ही करना है तो फिर इससे अच्छा तो यही होगा कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहें। read more  आगे पढ़ें

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