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हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे

देश का सबसे बड़ा (प्रसार संख्या के हिसाब से, विश्वसनीयता के लिहाज से कतई नहीं) अखबार भी नब्बे के दशक की महाभ्रष्ट पत्रकारिता एवं ऊपर सुनाये गए चुटकुले की तरह ही व्यवहार कर गया है। उसने अपने पहले पेज पर छापे संपादकीय में उन भ्रष्टाचारियों के लिए चेतावनी जारी की है, जो वह भ्रष्टाचार करने जा रहे हैं, जिसके घटित होने से पहले ही इस अखबार को उसकी भनक लग गयी है। समाचार पत्र ने चेतावनी दी है कि कोरोना के उपचार से जुड़ी सामग्री की मांग एवं आपूर्ति में गड़बड़ी करने वालों पर उसकी टीम नजर रखेगी। उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। पत्र ने इस धमकी को पुरस्कार बनाने के लिए मैं अपनी पे आ गया तो फिर.... ली शैली भी अपनाई है। इसके लिए संपादकीय में भ्रष्टाचार की कुछ आहटों की वजह से पहले ही टिप्पणी कर रहा है का इस्तेमाल किया गया है।  आगे पढ़ें

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प्रियंका की राजनीति में संकीर्ण विचारों का वायरस

उत्तरप्रदेश की बदली आबोहवा का ही असर है कि कांग्रेस वहां से अपनी परंपरागत सीट अमेठी तक हार चुकी है। बीते लोकसभा चुनाव में जिस उत्तरप्रदेश की जिम्मेदारी के साथ प्रियंका का विधिवत राजनीतिक पदार्पण हुआ था, उसी राज्य में उनकी पार्टी केवल एक सीट ही जीत सकी। कहां तो प्रियंका ख्वाब देख रही थीं वाराणसी सीट से नरेंद्र मोदी को हराने का और कहां अमेठी सीट पर अपने भाई राहुल को हारने से नहीं बचा सकीं। श्रीमती वाड्रा ने भाजपा को कमजोर करने के लिए भीम आर्मी से हाथ मिलाने का प्रयास किया, लेकिन आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर रावण ने पूरी बदतमीजी के साथ उनका हाथ झटक दिया था। read more  आगे पढ़ें

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ऐसा दुर्भाग्य मीडिया का

आप पढ़ रहे हैं देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर एक अखबार। मास्ट हैड के ऊपर यह दावा वाकई एक बड़े अखबार का ही है। लेकिन यह जरूरी तो नहीं हैं न कि नाम बड़ा हो तो काम भी बड़ा ही रहे। इनके बीच जमीन-आसमान का अंतर भी होता है और यह अखबार कभी भी इसका अपवाद नहीं रहा है। कल इस अखबार ने मालवा में कोरोना के हाटस्पाट बने उज्जैन की एक तस्वीर छापी। गरीब परिवेश की एक बच्ची सड़क से गेहूं के दाने बटोर रही थी। फोटो का विवरण कुछ ऐसे भावुक अंदाज में लिखा गया कि पढ़कर कलेजा मुंह को आ गया। अखबार ने बताया कि कोरोना एवं गरीबी के चलते बच्ची यूं बिखरे हुए गेहूं को बटोरकर अपना और परिवार का पेट पालने की जद्दोजहद कर रही है। कैमरे के क्लिक से लेकर कलम की सियाही तक ने मिला-जुला असर करके इस छायाचित्र को दिलो-दिमाग में पैबस्त कर दिया।  आगे पढ़ें

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कोरोना से रखें बैर, बचने के उपायों से नहीं

यह तय है कि जरूरत पडने पर लॉक डाउन को और लंबा खींच ही दिया जाएगा। मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में बात करें तो संक्रमितों की बढ़ती संख्या के लिहाज से तो भोपाल और इंदौर के बीच जैसे प्रतियोगिता चल रही है। राज्य के कुछ और हिस्स्से भी कोरोना वायरस के लिहाज से अब तक खतरे वाले हालात में शामिल होते जा रहे हैं। इसलिए यदि यहां लॉक डाउन जारी रहा या फिर किसी और तरीके से सख्त पाबंदिया जारी रखी गयीं तो किसी को इससे धक्का नहीं लगना चाहिए। क्योंकि ऐसा कोई फैसला यह ही जतायेगा कि इतने लम्बे लॉक डाउन के बाद भी महामारी को लेकर स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है।  आगे पढ़ें

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कम से कम मेरी चिंता मत कीजिये कमलनाथ जी

नाथ अनुनय-विनय कर रहे हैं कि राज्य सरकार पत्रकारों का पचास लाख का बीमा करे। लतीफा जोरदार है। नाथ ने मुख्यमंत्री रहते हुए पत्रकारों के बीमा हेतु सरकार की तरफ से जमा की जाने वाली प्रीमियम की राशि देने में ही आना-काना की हो, वे अब नए निजाम से इस मामले में कुबेर की तरह दरियादिली दिखाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वैसे मेरा सुझाव है कि शिवराज को अपने इस कार्यकाल में एक और शहीद स्मारक बनाना चाहिए। मालवीय नगर की उस जमीन पर जहां आज कुत्ते मूत्र विसर्जन कर रहे हैं और जहां कभी कलम अग्नि वर्षा किया करती थी। इस जमीन पर बने भवन को धराशायी करने की रूपरेखा हालांकि शिवराज सरकार के दौरान ही तय हो गई थी। इस शहीद स्मारक में नाथ के पंद्रह महीने के नाना प्रकार वाले शहीद मीडिया की प्रतिमाएं लगाई जाना चाहिए।  आगे पढ़ें

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इंदिरा के रास्ते पर सोनिया....

अब सोनिया ने राय जाहिर की है कि सरकार को मीडिया में दो साल के लिए विज्ञापन देना बंद करना चाहिए। मामला लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के लिए सासु मां की अपातकालमयी सोच को ही आगे बढ़ाने वाला है। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष मीडिया की प्राण वायु को रोकने का रास्ता दिखा रही हैं। इस मामले में पहले ही नरेन्द्र मोदी की सरकार ने मध्यम और छोटे मीडिया संस्थानों की नकेल कस रखी है। मोदी ने फर्जीवाड़े और नियम कायदों की आड़ में छोटों को कुचलने का काम किया तो सोनिया तमाम मीडिया की ही बैंड बजाने का सुझाव लेकर आ गईं। यह उस माध्यम को शक्ति-विहीन बनाने के मंसूबे वाली सोच है, जो मीडिया देश में विज्ञापनों के जरिये बहुत बड़े हिस्से तक सरकार की न सिर्फ उपलब्धि, बल्कि उसकी जनहित सम्बन्धी नीतियों की जानकारी भी पहुंचाता है। ध्यान रहे कि आज भी देश का बहुत बड़ा तबका ऐसी सूचनाओं से अवगत होने के लिए मीडिया पर ही निर्भर है। यदि विज्ञापनों पर रोक के माध्यम से यह प्रवाह रोका जाता है तो निश्चित ही जनता के लिहाज से भी इसका अच्छा नतीजा सामने नहीं आएगा। मीडिया उद्योग का तो सत्यानाश होना तय है ही।  आगे पढ़ें

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महाराष्ट्र के सीएम ने कहा- मैं आप लोगों की परेशानी समझता हूं, मुझे कर्फ्यू का दुख है, लेकिन घर में रहने के अलावा कोई आप्शन नहीं है

महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने बुधवार को सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, 'मैं आप लोगों की परेशानी समझता हूं। घर पर रहने में काफी तरह की दिक्कतें आ रही हैं। लोग बोर हो रहे हैं। मुझे इसका दुख है। लेकिन हमारे पास घर पर रहने के अलावा और कोई आॅप्शन नहीं है।' महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के बाद 24 मार्च को पूरे राज्य में कर्फ्यू लगा दिया गया था। राज्य में सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी संक्रमित लोगों की संख्या एक हजार से ज्यादा हो गई है।  आगे पढ़ें

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बचें ऐसी एजेंडामयी मूर्खता से

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ हुए अनाचार पर शोक जताऊं, या फिर यह सोचकर खुद को बहला लूं कि दोस्त ने दुनिया को मूर्खों की नयी प्रजाति का साक्षात परिचय करने का सुअवसर प्रदान कर दिया है। हद है इस किस्म के विचारों की और अमर्यादित, असंस्कारित आचरण के सार्वजनीक एलान की। सच कहूं तो ऐसी भावनाओं का विस्तार भी कोरोना वायरस के संक्रणम के खतरे से कम नहीं है। खतरे की बात ये कि ऐसी बात रखने वाले वैसे ही ट्रेंड श्रेणी के लोग हैं, जिनकी तरह ही पढ़े-लिखे कई लोग आतंकवाद से जुड़कर दुनिया के सामने नयी मुसीबत खड़ी कर चुके हैं। बेवकूफी का मानो सिलसिला चल रहा है। कोई यह तक कह रहा है कि इंदौर में मेडिकल टीम पर इसलिए हमला किया गया कि उसके लोग इलाज/जांच के नाम पर लोगों के शरीर में कोरोना के वायरस का प्रसार करने की नीयत से गए थे। मुझे नहीं लगता कि चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे पर इतने पेशेवर तरीके से कहीं और हमला किया गया होगा।  आगे पढ़ें

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पीएम के सोशल मीडिया छोड़ने के ऐलान के बाद विपक्षी पार्टियां सस्पेंस में, अधीर ने कहा-दिल्ली दंगों का दुख है तो पीएम पद छोड़ना चाहिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया छोड़ने के ऐलान के बाद विपक्षी पार्टियां भी सस्पेंस में हैं। कांग्रेस को भी समझ नहीं आ रहा है कि आखिर मोदी ने ऐसा क्यों कहा है। इस बीच अधीर रंजन चौधरी (लोकसभा में कांग्रेस के नेता) ने मोदी से कहा है कि अगर उन्हें दिल्ली दंगों का दुख है तो सोशल मीडिया नहीं प्रधानमंत्री का पद छोड़ना चाहिए। अधीर ने यह भी कहा कि हो सकता है मोदी ऐसा मौजूदा मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए कर रहे हों। कांग्रेस नेता ने यह भी पूछा कि क्या अब मोदी साधु-संत बन जाएंगे। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जब नैतिकता के आधार पर पद छोड़ा गया हो। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण दिया। कहा कि रेल हादसे के बाद उन्होंने रेल मंत्री का पद छोड़ा था।  आगे पढ़ें

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बदलाव के अनुरूप खुद को तैयार करें जनसम्पर्क अधिकारी : पीसी शर्मा

मंत्री शर्मा ने कहा कि सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाने में जनसम्पर्क विभाग की मुख्य भूमिका है। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि स्थानीय स्तर पर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और नीतियों की जानकारी देने के साथ-साथ इन से लाभांवित व्यक्तियों, समूहों की जानकारी भी सक्सेज स्टोरी के तौर पर प्रसारित और प्रचारित करें। मीडिया से बेहतर समन्वय रखें। शर्मा ने संचालक को निर्देश दिये कि माखनलाल चतुवेर्दी राष्ट्रीय संचार एवं पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रशिक्षण का वार्षिक कलैंडर तैयार करें और उसके अनुरूप प्रशिक्षण आयोजित करें। उन्होंने प्रत्येक तीन माह के अंतराल में जिला जनसम्पर्क अधिकारियों की राज्य स्तरीय कार्यशाला आयोजित करने के लिए भी कहा।  आगे पढ़ें

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