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क्या गोड़से के अलावा और किसी हत्यारे को नहीं देखा हमने

सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है। गांधी बनाम गोडसे वाली। मैं जो कुछ आज लिखने जा रहा हूं उसका इस बहस से कोई लेना देना नहीं है। मैं आज बस सवाल करने के मूड में हूं। मेरा सवाल यह कि क्या केवल और केवल गांधी जी के हत्यारे का ही महिमामंडन किया जाना गलत है? अफजल गुरू भी हत्यारा था। गोडसे की ही तरह उसे इस देश की अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन गुरू का जमकर महिमामंडन किया गया। इसकी अगुआई के आरोपी कन्हैया कुमार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी बना दिया। जो कांग्रेस साध्वी प्रज्ञा को पानी पी-पीकर कोस रही है, उसी पार्टी के भोपाल से लोकसभा उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने तो कन्हैया को बकायदा अपने प्रचार के लिए यहां आमंत्रित कर लिया था।  आगे पढ़ें

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क्या कबरी बिल्ली भागेगी....?

नरेंद्र मोदी का गुस्सा होना जायज था। अपनी पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे आकाश की कारगुजारी पर उन्होंने अप्रसन्नता जतायी। इस विधायक सहित उसके सभी समर्थकों को पार्टी से बाहर करने की बात तक कह दी। मोदी इससे पहले भोपाल से सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर गुस्साये थे। मामला मोहन दास करमचंद गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे को देशभक्त बताये जाने का था। मोदी ने कहा कि ऐसे कथन के लिए वह प्रज्ञा को कभी मन से माफ नहीं करेंगे। ऐसा दिखा भी, जिस दिन सभी सांसदों ने मोदी को प्रधानमंत्री बनने की बधाई दी, तब प्रज्ञा ठाकुर की मोदी ने अनदेखी कर दी थी। ताजा मामले में यहीं से एंट्री होती है, भगवती चरण वर्मा के कथानक की। प्रदेश भाजपा की अनुशासन समिति के प्रमुख बाबू सिंह रघुवंशी इंदौर से ही होते हैं शायद इसलिए वे सरकारी बाबू की तरह इन घटनाक्रमों पर जवाब दे रहे हैं।  आगे पढ़ें

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अभिशाप हमारे सहचर हैं

इतिहास से लेकर आज तक देखें तो हर ताकतवर ने मौका आते ही वही किया, जो इंदिरा गांधी ने सन 1978 में कर दिखाया। देश से बाहर जाने और फिर गुमनाम मौत मरने वाले सुभाष चंद्र बोस की इस हालत के लिए क्या मोहनदास करमचंद गांधी की तानाशाही वजह नहीं थी? क्या यह आपातकाल के दौर की विवशता भरी किसी प्रतिबद्धता से कम है कि देश की आजादी का जिक्र क रते समय हम भगत ङ्क्षसह, चंद्रशेखर आजाद, चापेकर बंधु, उधम सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, खुदीराम बोस, विनायक दामेादर सावरकर और मंगल पांडे, आदि का जयघोष आज भी पूरी ताकत से नहीं कर पाते? हमारा यह प्रसंग तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक कि इसमें नेहरू-गांधी का जिक्र न कर दिया जाए।  आगे पढ़ें

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भाजपा से दुश्मनी निकाल रहीं साध्वी!

राजनीतिक पदार्पण के साथ ही प्रज्ञा द्वारा उठाये गये तमाम कदम देख लीजिए। किसी से भी विपक्ष को नुकसान नहीं हुआ। नुकसान तो भाजपा का भी नहीं हुआ लेकिन उसे नीचा हर बार देखना पड़ा या फिर पीछे हटना पड़ा। आक्रामक मोदी और भाजपा को हर बार डिफेंसिव मोड पर आ जाना पड़ा। जरा सोचिए कि नाथुराम गोडसे को सच्चा देशभक्त कहने से कांग्रेस की सेहत पर क्या कोई असर होना था! नहीं। लिहाजा ऐसा ही हुआ, किंतु इस कथन से समूची भाजपा पसीना-पसीना और पानी-पानी हो गयी। कहां गांधी जी की डेढ़ सौ वीं जयंती को धूमधाम से मनाने की मोदी की तैयारी। और यहां लाख धोने की कोशिशों के बाद भी सात दशकों से चले आ रहे एक परम्परागत आरोप या विवाद को ताजा करना। अयोध्या में विवादास्पद ढांचा ढहाने की स्वीकारोक्ति से भी विपक्ष की बजाय भाजपा की ही मुसीबत बढ़ी। हेमंत करकरे कांड के चलते जो कुछ हुआ, वह भी सबको याद ही है। इनमें से एक भी मामले का सामने आया हश्र अनपेक्षित नहीं था। अब यह भाजपा की भी कमजोरी माना जा सकता है कि इन मुद्दों पर अपनी दबी छुपी राय को वो सार्वजनिक विमर्श का मुद्दा बनाने का साहस नहीं कर सकती है। भाजपा गांधी की हत्या और गोड़से की देशभक्ति पर अंदरखाने जो बात कर सकती है, उसे सार्वजनिक विमर्श में लाने का साहस उसमें नहीं है। तो क्या यह नहीं माना जा सकता कि प्रज्ञा ने नतीजे जानते-बूझते हुए भी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का पात्र बनाया और सोमवार को संसद में इसे हास्य का पात्र बना दिया।  आगे पढ़ें

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