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क्या हम अभिशप्त हैं?

बात केवल एक प्लेटिनम प्लाजा की नहीं है। गड्ढों के तौर पर शहर के चेहरे पर उगी चेचक हर ओर देखी जा सकती है। कोलार के इलाके में चले जाइए। किस जगह पानी के नीचे मौत आपका इंतजार कर रही है, कोई नहीं जानता। छोटे तालाब से लेकर रेलवे स्टेशन और बस स्टेंड तक की सड़क तो जैसे सामूहिक दुराचार की शिकार बना दी गयी है। वाहन चलाना तो दूर, उस पर पैदल चलना तक जन्म-मरण का प्रश्न बन गया है। स्मार्ट सिटी वाले निमार्णाधीन हिस्से के पास से गुजरते समय यही आशंका लगी रहती है कि वहां भी कहीं कोई गड्ढा बांहे पसारे इंतजार न कर रहा हो। यकीन न हो तो टी टी नगर स्टेडियम के दोनों छोर पर देख सकते हैं।read more  आगे पढ़ें

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रास में यूएपीए बिल पास, दिग्गी ने कहा- क्या मुझे भी आतंकी बनाएंगे, शाह बोले- कुछ नहीं करोगे तो कुछ नहीं होगा

संशोधित बिल में सरकार ने गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल व्यक्ति विशेष को आतंकी घोषित करने का प्रावधान शामिल किया है। दिग्विजय ने कहा कि हमें भाजपा की मंशा पर संदेह है। कांग्रेस ने कभी आतंकवाद से समझौता नहीं किया, इसीलिए यह कानून लेकर आए थे। आतंकवाद से समझौता करने वाले आप लोग हैं। भाजपा सरकार ने ही पहले रुबैया सईद और फिर मसूद अजहर को छोड़ा था। गृह मंत्री ने कहा, ''इमरजेंसी के दौरान क्या हुआ था? मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया और विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में डाल दिया था। 19 महीने तक देश में लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया और अब आप (कांग्रेस) हम पर कानून के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। कृपया अपना इतिहास भी देख लीजिए। जब हम विपक्ष में थे तो 2004, 2008 और 2013 में हमने यूपीए सरकार के यूएपीए बिल को समर्थन दिया था। क्योंकि हमें लगता था कि आतंकवाद से लड़ने के लिए यह जरूरी था।''  आगे पढ़ें

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फायदा किसे, नाथ को या फिर शिवराज को.....

राज्य विधानसभा में बुधवार को जो कुछ भी हुआ, वह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को हमारी जेल में सुरंग...! वाली हैरत से भरने के लिए पर्याप्त है। किसी ने लिखा है, तू इधर-उधर की न बात कर। ये बता कि काफिला क्यों लुटा? मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी पे मलाल है। तय मानकर चलिए कि दो विधायकों के टूटने पर शीर्ष नेतृत्व ऊपर गिनाये गये नेताओं से इसी अंदाज में पूछताछ करेगा। क्योंकि शक की सूई इनके इर्द-गिर्द घूम रही है। आखिर ऐसा क्या था कि गोपाल भार्गव ने राजनीति के शांत पानी में नंबर 1 और नंबर 2 वाला पत्थर फेंककर वहां हलचल पैदा कर दी? क्या सचमुच ऐसा हुआ कि अपने समर्थक विधायकों नारायण त्रिपाठी तथा शरद कोल के इस कदम की शिवराज सिंह चौहान को भनक तक नहीं लग सकी? क्या वजह हुई कि भाजपा विधायक दल की रग-रग समझने वाले शिवराज की नाक के नीचे से दो सदस्य निकलकर कांग्रेस के खेमे में पहुंच गये।  आगे पढ़ें

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दुबले पर दो अषाढ़.....

कमलनाथ ने कहा कि सरकार उन योजनाओं पर काम कर रही है, जिससे ज्यादा से ज्यादा युवाओं को रोजगार मिल सके। अब सात महीने में ही सरकार को यह याद दिलाने की जरूरत पड़ रही है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में प्रदेश के युवाओं को चार हजार रूपए तक का बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया था। मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि प्रदेश के बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देने की सरकार की योजना सरकार के पास नहीं। इसके इतर सरकार युवा स्वाभिमान योजना, मुख्यमंत्री कौशल संवर्धन योजना, मुख्यमंत्री कौशल्या योजना एवं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना तथा आईटीआई एवं पॉलीटेक्निक के माध्यम से कौशल संवर्धन का कार्य किया जा रहा है। इन योजनाओं में प्रशिक्षण लेने के बाद ज्यादा से ज्यादा युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। कमिटमेंट नाथ ने युवाओं को रोजगार की जितनी भी योजनाएं गिनाई हैं, वो पिछली सरकार के दौरान भी चल ही रही थी।  आगे पढ़ें

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आदिवासियों की बेदखली और फायरिंग की घटना पर विरोध में आए कांग्रेस नेता, दोषियों के खिलाफ की कार्रवाई की मांग

विगत मंगलवार को बुरहानपुर के सिवल गांव में पुलिस, जिला प्रशासन व वन विभाग के अधिकारी खेत में जेसीबी से फसल उखाड़ने पहुंचे तो वहां के आदिवासियों विरोध किया। सरकारी अमले ने फायरिंग की, जिसमें गोखरिया बड़ोले, भूरालाल अचाले, राकेश अचाले और वकील को छर्रे लगे। इस घटना के बाद जयस संगठन नेता डॉ. अलावा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि सरकार ने वन अधिकार के लिए खारिज हुए व लंबित दावों के पुन: निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एक मई 2019 को सभी कलेक्टरों को आदेशित किया जा चुका है कि वे प्रक्रिया पूरी होने तक किसी को बेदखल न करें, दूसरी तरफ वन विभाग का आतंक जारी है।  आगे पढ़ें

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विधायकों के टूटने का अभियान देख दूसरे किले बचाने में जुटी कांग्रेस, मप्र और राजस्थान में पार्टी हुई अलर्ट

आपको बता दें कि कमलनाथ सरकार समाजवादी पार्टी, बीएसपी और कुछ निर्दलीयों के समर्थन पर निर्भर है। वहीं, राजस्थान में कांग्रेस सरकार को करीब एक दर्जन निर्दलीय विधायकों ने इस शर्त पर समर्थन दिया है कि अशोक गहलोत ही राज्य के मुख्यमंत्री बने रहें। वैसे, कांग्रेस की स्टेट लीडरशिप अब तक अपनी पार्टी को एकजुट रखने में सफल रही है लेकिन कई नेताओं को लगता है कि आनेवाले दिनों में उनकी चुनौती बढ़ सकती है। कांग्रेस ने यह समझ लिया है कि कर्नाटक और गोवा दोनों राज्यों में उसके विधायकों को जिस अंदाज में तोड़ा जा रहा है, वह पुराने आॅपरेशन लोटस में अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों से बहुत आगे की चीज है।  आगे पढ़ें

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अब क्या सीएस बचाएंगे सोम समूह को मुसीबत से, सात करोड़ का बकाया दो सौ चौसठ करोड़ में बदला, आर्थिक तंगी से जूझ रही सरकार को करना चाहिए संपत्ति की नीलामी

सोम डिस्टलरी ने एमपीएसआईडीसी से 1998 से 2000 के बीच कुल दस करोड़ से ज्यादा की राशि कर्ज के तौर पर ली थी। उस दौर में निगम के प्रबंध संचालक आज के मुख्य सचिव एस आर मोहंती ही थे। उस समय निगम द्वारा बांटे गए कर्जों को लेकर उन्हें कई विवादास्पद स्थितियों का सामना भी करना पड़ा। अब मौका है कि वे अदालतों से कर्ज वसूली के जो फैसले आ गए हैं, उन पर अमल करवा सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रही सरकार में भी ऐसे कड़े कदम उठाए जाएंगे या नहीं? सोम के मामले में देश की सबसे ऊंची अदालत भी दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखे हुए है। इस मामले में अदालती प्रक्रियाओं के दौरान शराब कंपनी ने ऊंट के मुंह में जीरे जैसी कुछ राशि तो जमा करवाई है। उसका प्रयास था कि उसने जो रकम ली है, उसी पर निगम समझौता कर लें, लेकिन जाहिर है भारी भरकम ब्याज को निगम भी नहीं छोड़ना चाहता है। पर शराब कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख के कारण निगम या उद्योग विभाग कोई कड़ा कदम नहीं उठा सका है।  आगे पढ़ें

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इस बेड़ी के मायने क्या हैं ?

पर मजेदार बात यह है कि मध्यप्रदेश की हुकूमत खबरनवीसों की उस नस्ल से भी डर रही है, जो मुख्यमंत्री, मंत्रियों और राजनेताओं के साथ सेल्फी लेने को जीवन की बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करते हैं! सरकार को उनसे भी खौफ हो गया है, जो खुद सरकार से खौफ के चलते मीडिया को मंडी में तब्दील कर चुके हैं! विधानसभा में मीडिया की स्वतंत्र चहलकदमी पर लगी रोक से वाकई हैरत हो रही है। सवाल उठ रहा है कि वास्तव में पत्रकारिता करने वालों के किए की सजा समूचे मीडिया को क्यों दे दी गयी? विधानसभा में पत्रकार अब हर उस जगह नहीं जा सकता, जिस-जिस जगह जाने की उसे मिले कार्ड में अनुमति दी जाती है। गनीमत है कि पत्रकारों के कक्ष और दीर्घा को इस प्रतिबंध से मुक्त रखा गया है। वरना तो जिस तरह के तेवर दिख रहे हैं, उससे यही डर लगता है कि अगला कदम विधानसभा के परिसर में भी मीडिया की मौजूदगी पर रोक वाला न हो जाए। हुकूमत की ताकत के चलते यूं ही मीडिया के कई अंग पक्षघात के शिकार हो चुके हैं। हालांकि कुछ मट्ठर टाईप पत्रकार हर दौर में ऐसे होते हैं, जो सियासत से नहीं डरते। सच को सच लिखते हैं। गलत को गलत बताते हैं। जाहिर है कि ऐसे बची खुची पत्रकारों की ब्रीड किसी भी शासन व्यवस्था की आंख की किरकिरी बन सकती हैं। सत्ता ऐसे लोगों से डरे। तो यह समझ आता है। किंतु ऐसे जिंदा लोगों के साथ-साथ ही मरे को भी मारने की बात गले से नीचे नहीं उतर पा रही है।read more  आगे पढ़ें

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नाथ की अनाथ दिख रही सरकार.....

मुख्यमंत्री कभी आशंकित तो कभी आतंकित वाले भाव से ग्रस्त दिखते हैं। आशंका, लंगड़ी सरकार के लडखड़ाकर गिर जाने की हावी है। आतंक बाहरी और भीतरी दोनो तरह के हैं और खुले तथा छिपे विरोधियों की गतिविधियों से नुकसान होने के भी। ऐसे हालात के शिकार मुख्यमंत्री का विधानसभा में मत विभाजन की बात कहना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है। इस आश्चर्य की आवश्यकता उस समय और कम हो जाती है, जब कर्नाटक में कांग्रेस-जद (एस) की सरकार पर संकट के बादल और गहरा गये हैं। लेकिन आखिर ऐसा कब तक चल पाएगा? छह महीने से ज्यादा हो गये, सरकार के गठन को। अधिकांश मौकों पर यही लग कि यह नाथ नहीं बल्कि अनाथ सरकार है। read more  आगे पढ़ें

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करामाती चिट्ठी का सही इस्तेमाल

चार पेज का चिट्ठीनुमा इस्तीफा पालतू कबूतर तो कबूतर, बल्कि उन गिद्धों की नजर से भी 39 दिन तक छिपा रहा, जो इस खत पर अपनी नजर गड़ाये बैठे थे। अब एक गूंगी, नीली चिडिय़ा ने इस खत की सार्वजनिक नुमाइश कर दी है। गजब की पाती है। नाना स्वरूप वाली। अदालत में पेश कर दो तो उसे भाजपा तथा संघ के खिलाफ आरोप पत्र की संज्ञा दी जा सकती है। बस केवल दिग्विजय सिंह को थोड़ा बुरा लगा होगा। खत में सारे कांग्रेसियों को उलाहना देते हुए लिख दिया कि भाजपा और संघ के खिलाफ मैं अकेला लड़ रहा था। जबकि कापीराइट तो दिग्विजय सिंह जी के पास भी है। वैसे इन चार पन्नों को पंजे वालों के बीच लहरा दो तो उसे अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है फिल्म की रील के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।  आगे पढ़ें

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