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सींगों से घिरे कमलनाथ

दिग्विजय ने गायों की फिक्र और इमरती के महिलाओं के गलत व्यवहार का जिक्र किया। दोनों ही कथन राज्य सरकार के कामकाज की समीक्षा के नजदीक नजर आते हैं। भाजपा तो गौ-माता के नाम पर जुबानी जमा खर्च करती रही, लेकिन प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सिंह ने ट्विटर पर अंगुलियों की वो करामात दिखायी कि बेचारे वर्तमान मुख्यमंत्री को डिफेंसिव मोड में उतरना पड़ा। दिग्विजय ने जो कहा, वह गौ-मूत्र की तरह पवित्र और उसके गोबर की भांति ही लीप-पोतकर इस्तेमाल करने के लायक है। नाथ यदि वाकई गौवंश की हिफाजत का पुख्ता बंदोबस्त कर गुजरें तो शायद प्रदेश में भाजपा का एक बड़ा समर्थक वर्ग आसानी से उनके पीछे आकर खड़ा हो सकता है। यह उनके लिए बहुत आसान भी है। क्योंकि यह उस राज्य का मामला है, जहां भाजपा के हिंदुत्व के कटु विरोधी भी गाय को आहार के रूप में ग्रहण करने जैसी बात कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो नहीं ही कहते हैं।  आगे पढ़ें

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पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने कहा- सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना मेरी जिम्मेदारी, मैं इसको निभाने में सक्षम हूं

सरकार किसी की भी हो साम्प्रदायिक सद्भाव बचाए रखना मेरी जिम्मेदारी है और मैं इस जिम्मेदारी को भलि-भांति निभाने में सक्षम हूं। मेरी सरकार आपकी बात नहीं सुनेगी तो मैं आपकी आवाज बनूंगा। यह बात पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने श्योपुर के जमातखाना में मुस्लिम समाज के विभिन्न संगठनों से संवाद कार्यक्रम में कही। जिले में वक्फ इंतजामिया कमेटी जमातखाना के सहयोग से शहर काजी अतीक उल्लाह कुरैशी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से कांग्रेस की सरकार में भी उनके साथ भेदभाव करने की शिकायत की गई। अधिकतर आरोप जिला प्रशासन पर लगाए गए।  आगे पढ़ें

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गंभीरता से न लें इस घटनाक्रम को

सिंधिया का नाथ से खफा होना और प्रत्युत्तर में मुख्यमंत्री खेमे की ओर से सिंधिया पर पलटवार करना अनपेक्षित घटनाक्रम का हिस्सा कतई नहीं हैं। ग्वालियर राज घराने के चश्मो-चिराग को उनकी पार्टी ने हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। कहते हैं कि बुरा समय चल रहा हो तो ऊंट पर बैठे शख्स को भी कुत्ता काट लेता है। सिंधिया राहुल गांधी के कंधे पर सवार होकर तेजी से आगे बढ़ रहे थे। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की बात आयी तो गांधी ने नाथ को गोद में उठाकर इस कुर्सी पर बैठा दिया। इसके बाद सिंधिया को उत्तरप्रदेश का जिम्मा सौंप दिया गया। बुरा समय इतना बुरा हुआ कि कांग्रेस यूपी के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी और सिंधिया अपने परिवार की परंपरागत गुना सीट से पराजित हो गये। दुबले पर दो आषाढ़ वाली इस कमजोरी ने सिंधिया को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के पद से भी दूर कर दिया है।  आगे पढ़ें

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सिंधिया ने किसान कर्ज माफी पर अपनी सरकार को घेरा, कहा- अब तक सिर्फ 50 हजार तक के कर्ज हुए माफ

पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लगातार दूसरे दिन मुखर होते हुए पार्टी और संगठन के बाद अब प्रदेश सरकार के कामकाज पर तीखे तेवर दिखाए हैं। किसानों की कर्ज माफी के मुद्दे पर पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भिंड प्रवास के दौरान कहा- किसानों के सिर्फ 50 हजार रुपए तक के कर्ज माफ हुए हैं, जबकि हमने दो लाख तक का कर्ज माफ करने की बात अपने वचन पत्र में कही थी। सिंधिया ने कहा किसानों के दो लाख रुपए राशि तक के कर्ज माफ होना चाहिए। सिंधिया कार्यकतार्ओं की संगोष्ठी में बोल रहे थे। इससे एक दिन पहले बुधवार को सिंधिया ने ग्वालियर में कांग्रेस को आत्म चिंतन करने की नसीहत दी थी।  आगे पढ़ें

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कांग्रेस नेताओं के बयान पर अधीर रंजन की नसीहत, कहा- चुनावी माहौल में ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जिससे हमें नुकसान हो

सलमान खुर्शीद ने बुधवार को कहा था कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति देखकर दुखी हूं। लेकिन मेरा पार्टी से मोहभंग नहीं हुआ है। हमें विचार करने की जरूरत है कि ऐसी हालत क्यों हुई। कुछ प्रभावी कदम उठाने होंगे, क्योंकि वक्त कम है। इस्तीफा देने के बावजूद राहुल गांधी प्रमुख नेता हैं। हालांकि, इससे पहले उन्होंने राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे पर कहा था कि लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा करनी थी, लेकिन हमारे नेता (राहुल गांधी) ने हमें छोड़ दिया। यहीं, सबसे बड़ी दिक्कत है। कांग्रेस के अंदर अभी एक खालीपन है।  आगे पढ़ें

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बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद सिंधिया ने पीएम को लिखा पत्र, मांगा 10 हजार करोड़ का राहत पैकेज

पीएम मोदी को लिखे पत्र में सिंधिया ने लिखा है, 'मध्य प्रदेश में अति भारी वर्षा और बाढ़ से बेहद ज्यादा नुकसान हुआ है। मेरे द्वारा बाढ़ एवं अति भारी वर्षा से प्रभावित 10 जिलों का दौरा किया गया है। अति भारी बारिश और बाढ़ से मध्य प्रदेश की फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी हैं, सड़कें कई जगहों पर पूरी तरीके से नष्ट हो चुकी हैं, जनधन की भारी हानि हुई है और काफी संख्या में पशुओं की मृत्यु हुई है। स्कूल, आंगनबाड़ी, बिजली के खंभों, शासकीय कार्यालयों और भवनों को भारी नुकसान पहुंचा है।  आगे पढ़ें

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ये हवा और पानी का संगम

तेज हवा में सूखी रेत उड़कर कहर ढा जाती है। यह लोगों की आंख में चली जाए तो कुछ देर के लिए सब-कुछ दिखना बंद हो जाता है। फिर यहां तो मामला उस रेत का है, जो पूरे तीन घंटे तक सुखायी गयी। भ्रष्टाचार की आग पर रखकर। वह भी होशंगाबाद कलेक्टर के कार्यालय में। आग कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने लगायी या एसडीएम रवीश श्रीवास्तव ने, मैं नहीं जानता। हां, इतना पता है कि तीन घंटे बाद जब चैम्बर का दरवाजा खुला तो रेत ने आरोप-प्रत्यारोप की हवा के असर से ऐसा कहर बरपाया कि भोपाल में बैठे शासक वर्ग तक को सब-कुछ दिखना बंद हो गया। सोचिए कि सीताशरण शर्मा यदि सत्तारूढ़ दल में होते तो इस रेत की उड़ान का वेग और कितना अधिक हो जाता। फिलहाल अब रेत जर्रा-जर्रा होकर वल्लभ भवन की फाइलों में कैद है। read more  आगे पढ़ें

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प्रदेश में नए पीसीसी चीफ को लेकर अटकलें हुईं तेज, सोनिया गांधी से सिंधियों की नहीं हो पाई मुलाकात

सिंधिया ने मीडिया से चर्चा में सिर्फ इतना ही कहा कि मुझे महाराष्ट्र चुनाव के लिए हुई स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में शामिल होना था। मैंने पार्टी अध्यक्ष से मिलने के लिए अलग से कोई समय नहीं मांगा था। पार्टी आलाकमान ने गुरुवार को राज्यों के प्रदेशाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की बैठक बुलाई है।  आगे पढ़ें

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कांटे से कांटा निकालने का खेल

सियासी वन में तब्दील हो चुके प्रदेश में सिंघार किसी युवा शेर की तरह दहाड़ रहे हैं तो सिंह इसी प्रजाति के बुजुर्ग की भांति पूरी शांति के साथ बैठे हैं। लेकिन उनकी निगाह सिंघार से हट नहं रही। ठीक उसी तरह, जिस तरह जंगल में आखेट के समय शेर अपने शिकार से नजर नहीं हटाता है। चुपचाप उसकी ओर सरक कर उसे निशाना बना लेता है। शिकार बनने और करने, दोनो मामलों में सिंघार का बायोडाटा अभी खाली है। दिग्विजय सिंह ने आज कहा कि पचास सालों में वे बहुत से हमले देख चुके हैं। जाहिर है, कमलनाथ और कांग्रेस की सरकार को ये तलवार की नोक वाला बहुमत नहीं मिला होता तो शायद फिर उमंग को जवानी की उमंग और बुजुर्गीयत के धैर्य का अंतर पता चलता। इधर, अच्छे-अच्छों को सियासी निवाला बनाने के दृष्टिकोण से सिंह की कर्म कुंडली तमाम प्रहसनों से रंगी हुई है। इसलिए यह तय है कि दोनो पक्षों के बीच सफेद रुमाल लहराये जाने की संभावना फिलहाल नहीं है। जीत और हार का फैसला समय ही करेगा। तब तक यह घमासान देखना बेहद रोचक एवं यादगार अनुभव बन जाना तय है।  आगे पढ़ें

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न थकने वाले ऐसे करामाती

उस सरकार की सोचिए, जिसके हिस्से ही यह शोर मचा रहे हों कि इसके तमाम लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। मध्यप्रदेश ने ऐसे बदलाव वाले वक्त की कभी भी कामना नहीं की थी। क्योंकि मामला वक्त के बदलाव का नहीं, बल्कि बदला लेने वाले वक्त में तब्दील होकर रह गया है। यह सब देखकर जनता पार्टी की उस सरकार का कार्यकाल और हश्र याद आ गया, जो अंतत: अपने नेताओं के आपसी घमासान में ही खत्म हो गयी थी। ऐसा उदाहरण सामने होने के बावजूद राज्य की सरकार एवं कांगे्रस संगठन गुटाधीशों के हाथ का खिलौना बनकर रह गये हैं। क्या यह स्थिति उस समय किसी भी लिहाज से ठीक कही जा सकती है, जब प्रदेश के नगरीय निकायों के चुनाव तेजी से नजदीक आते जा रहे हैं। सरकार बनने के बाद लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद निकाय चुनाव ही कमलनाथ की इज्जत और राज्य में पार्टी की ताकत में कुछ इजाफा कर सकते हैं। लेकिन फिलहाल जो चल रहा है, उसे देखते हुए यह आशंका जतायी जा सकती है कि यहां भी मामला लोकसभा चुनाव जैसा ही हो सकता है।  आगे पढ़ें

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