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सिंधिया की चुप्पी...

सिंधिया सयाने हैं। सयानों की खासियत में अतीत से सबक लेना शामिल है। लेकिन यहां भी ज्योतिरादित्य के लिए भ्रम की स्थिति है। भूतकाल में उनकी दादी विजयाराजे सिंधिया आज वाले हालात की तर्ज पर ही राज्य में कांग्रेस का तख्ता पलट कर गुजरी थीं। ज्योतिरादित्य संविद सरकार वाले उस अध्याय की पुनरावृत्ति करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन यह सफलता कितनी लंबी चलती है यह सिंधिया और भाजपा के अलावा संघ परिवार भी निर्भर करेगा। सिंधिया निश्चित तौर पर चौधरी राकेश सिंह या फिर प्रेमनारायण ठाकुर नहीं हैं। रही बात नया दल बनाने की, तो उनके सामने अपने पिता की मध्यप्रदेश विकास कांग्रेस की विफलता का दृष्टांत मौजूद है। खतरा यह भी है कि विधायकों को बगावत के लिए तैयार करने की सूरत में महल के कई समर्थकों की विधानसभा की सदस्यता खत्म होगी ही और इन्हें फिर से निर्वाचित करने की जवाबदारी भी सिंधिया पर ही होगी। इसलिए इस मसले पर फिलहाल तेल की धार देखने जैसी स्थिति है। readmore  आगे पढ़ें

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कांग्रेस: परिवार या पाकिस्तान

किसी भी नयी व्यवस्था के पांव जमाने में समय लगता है। यह निश्चित अवधि नहीं होती। फिर कश्मीर में तो सत्तर साल के बाद कुछ ऐसा बदलाव किया गया है, जिसकी कम से कम इस देश के विरोधियों के स्तर पर तो सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं ही हो सकती। यह पाकिस्तान के नापाक मंसूबे ध्वस्त करने वाला घटनाक्रम है। आतंकवादियों और उनके सहोदर अलगाववादियों के पेट पर लात पड़ने वाली बात है। गुलाम नबी आजाद, मेहबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला तथा उमर अब्दुल्ला की सियासी दुकानों के दरवाजे बंद हो जाने वाला वाकया है। यह तय है कि न तो आतंकवादी अब चुप बैठेंगे और न ही अलगाववादी। क्योंकि दोनो का मिशन एक ही है। कश्मीर को अस्थिर बनाये रखकर वहां अपने-अपने लाभ का बंदोबस्त करना। इसी तरह आजाद से लेकर अब्दुल्ला तक का सियासी एजेंडा जारी रहेगा। read more  आगे पढ़ें

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राहुल के लिए चिंतन का समय

लोकतंत्र का यह शुभ संकेत होता है कि सत्ता पक्ष के अच्छे काम की विपक्ष भी प्रशंसा करे। अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वर्गीय इंदिरा गांधी द्वारा पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाले कदम का खुलकर समर्थन किया था। यदि राहुल अपने परनाना के प्रति मोदी के लांछनों से आहत हैं तो उन्हें वाजपेयी एवं श्रीमती गांधी वाले पक्ष को भी ध्यान में रखकर अपनी सोच कायम कर उसका इजहार करना चाहिए। जिस मसले पर कमोबेश पूरा देश सरकार के साथ है। आपकी ही पार्टी के कई जिम्मेदार नेता उस पर सत्ता का समर्थन कर रहे हैं तो कहीं न कहीं यह चिंतन का विषय हो जाता है कि इसका कारण क्या है और क्या कारण है कि हम अंधे विरोध में इधर से उधर लड़खड़ाते हुए ऐसी बातें करते रहें, जिनका न सिर है और न ही पैर। चिदंबरम वाला घटनाक्रम गांधी के लिए किसी सबक के तौर पर होना चाहिए।read more  आगे पढ़ें

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सोनिया की वापसी ने राहुल के राजनीतिक भविष्य का रास्ता किया तंग!

राहुल के इस्तीफे के बाद ढाई महीने तक नए अध्यक्ष की खोज की कवायद चलती रही, लेकिन पूरी पटकथा इस तरह से तैयार हुई कि अंतत: कमान सोनिया के हाथों ही रहे। बदले हुए हालात में राहुल की वापसी निकट भविष्य में मुश्किल दिखती है। कहा जा रहा है कि भले ही सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया हो, लेकिन यह व्यवस्था कुछ महीनों की न होकर अगले दो-तीन सालों की हो सकती है। उसके बाद, कमान प्रियंका गांधी के हाथ जा सकती है।  आगे पढ़ें

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दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद हुड्डा की परिवर्तन महारैली लेंगी सोनिया की परीक्षा

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री की तरफ से रैली का आयोजन किया जाना कई तरह के सवाल खड़े कर रहा है, जैसे क्या यह उनकी तरफ से अक्टूबर में होनेवाले विधानसभा चुनाव से पहले हरियाणा कांग्रेस को तोड़कर एक क्षेत्रीय दल बनाने का पूर्व संकेत है या महज चुनाव से पहले सौदेबाजी का महौल बनाने की कवायद है। अभी कांग्रेस में जिस कदर भगदड़ मची है और कई राज्यों की पार्टी यूनिट में उथल पुथल मच रही है, उसको देखते हुए पार्टी सर्किल में सबकी नजर इस पर होगी कि सोनिया गांधी और उनकी टीम हुड्डा की तरफ से पेश की जा रही चुनौती को किस तरह लेती है, क्योंकि इससे यह भी पता चलेगा कि वह अपनी दूसरी पारी में सौदेबाजी करनेवालों के साथ किस तरह निपटती हैं- क्या वह उन्हें जाने देंगी या उनकी बात मानेंगी।  आगे पढ़ें

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निकाय चुनाव में कांग्रेस सरकार करेगी बदलाव, अब जनता नहीं पार्षद चुनेंगे महापौर और नपा-नप अध्यक्ष

दरअसल इस साल के अंत तक प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव होने हैं। वर्तमान में 16 नगर निगम के महापौर समेत अधिकांश नगर पालिका और नगर परिषद पर भाजपा के अध्यक्ष काबिज हैं, लेकिन प्रदेश में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस इन निकायों पर अपना कब्जा चाहती है। इसी मकसद से अधिनियम में संशोधन के लिए सीएम कमलनाथ ने मंत्रीमंडल की उप समिति का गठन किया है। अब समिति से मिले प्रस्तावों को कैबिनेट की बैठक में लाया जाएगा। इसके बाद अध्यादेश भी लाया जाएगा।  आगे पढ़ें

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राज्यसभा में पहुंचने मनमोहन सिंह आज भरेंगे नामांकन, सांसद चुनाव जाना तय

पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने के साथ ही वे निर्दलीय और बसपा विधायकों से भी संपर्क बनाए हुए हैं। गहलोत ने प्रदेश के सभी कांग्रेसी विधायकों को निर्देश दिए हैं कि सिंह के नामांकन के दौरान सभी विधायक जयपुर में रहें। नामांकन की अंतिम तिथि 14 अगस्त है। उधर, भाजपा ने मंगलवार को प्रदेश पार्टी कार्यालय में विधायक दल की बैठक बुलाई है। इसमें तय होगा कि भाजपा अपना प्रत्याशी उतारेगी या नहीं।  आगे पढ़ें

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सोनिया के अंतरिम अध्यक्ष बनने पर शिवराज ने कसा तंज, कहा-अच्छे नेताओं की कमी से जूझ रही है कांग्रेस

शिवराज सिंह ने कहा कि भाजपा ने पार्टी में अपने कार्यकतार्ओं और नेताओं की तरक्की के उदाहरण पेश किए हैं। जबकि कांग्रेस एक परिवार से बाहर नहीं निकल पा रही है। उन्हें पिछले चुनावों से बहुत कुछ सीखना चाहिए। आश्चर्य की बात ये है कि कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) सोनिया और राहुल गांधी को ही पार्टी की कमान सौंपना चाहती है। लेकिन उनके नेता राहुल गांधी रणछोड़ हैं, जो चुनाव में हार के बाद पार्टी की जिम्मेदारी छोड़कर भाग खड़े हुए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को कोई याद नहीं करता है, क्योंकि वे गांधी परिवार से नहीं थे। उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, लेकिन मां-बेटे का नियंत्रण रहा।  आगे पढ़ें

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कांग्रेस के ‘बाल’ काण्ड की नाटकीय समाप्ति

शनिवार की सुबह जिस समय सोनिया और राहुल कार्यसमिति की बैठक के बीच से चले गये थे, तब एकबारगी यह लगा था कि करीब बीस साल की नींद के बाद यह दल सही दिशा में करवट लेने जा रहा है। क्योंकि यही वह समय है, जब इस दल में नयी जान फूंकी जानी है। यह काम शीर्ष स्तर पर बदलाव के जरिये ही हो सकता था। किंतु सब कुछ ढाक के तीन पात की तर्ज पर सिमट कर रह गया। यूं नहीं कि हम सोनिया गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे हों, बात केवल यह कि परिवार से इतर किसी चेहरे को आगे लाकर यह दल की नजर में अपनी खराब होती छवि को कुछ ठीक कर सकता था। यह उम्मीद कम ही की जा सकती है कि निकट भविष्य में कांग्रेस को कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष मिल जाए। सोनिया गांधी अंतरिम तौर पर इस पद के लिए चुनी गयी हैं, लेकिन उनके उपनाम में इतना दम है कि मामला अंतरिम से अनंतिम तक पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।read more  आगे पढ़ें

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कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर नेताओं के बीच बैठक जारी, ज्यादातर कांग्रेसी राहुल को ही पद पर बनाए रखना चाहते हैं

सोनिया-राहुल गांधी भी सीडब्ल्यूसी की बैठक के दौरान पार्टी दफ्तर पहुंचे, लेकिन थोड़ी देर बाद चले गए। जबकि प्रियंका गांधी पूरे समय मौजूद रहीं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कहा, ''मैं और राहुल अध्यक्ष पद के लिए हो रहे विचार-विमर्श प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं। सीडब्ल्यूसी के सदस्य देशभर से आए नेताओं से चर्चा करेंगे।'' इससे पहले शुक्रवार को सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि जल्द ही पार्टी अध्यक्ष का चुनाव कर लिया जाएगा। अध्यक्ष पद की दौड़ में मल्लिकार्जुन खड़गे और मुकुल वासनिक सबसे आगे चल रहे हैं।  आगे पढ़ें

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