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मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया खेमा फायदे में, 28 मंत्रियों में 9 सिंधिया गुट के; भाजपा सरकार में अब 41% पूर्व कांग्रेसी

शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के 71 दिन बाद आखिरकार उनकी पूरी टीम बन गई, लेकिन इसमें सिंधिया खेमा फायदे में रहा। गुरुवार को 28 मंत्रियों ने शपथ ली। इनमें 9 सिंधिया खेमे से हैं, जबकि 7 शिवराज सरकार में पहले मंत्री रह चुके हैं। शपथ लेने वाले 28 नेताओं में से 20 को कैबिनेट और 8 को राज्य मंत्री बनाया गया है। 4 नेता ऐसे हैं, जो तीन महीने पहले तक कमलनाथ सरकार में मंत्री रहे थे।  आगे पढ़ें

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लौटना एक अकेले जीतू सोनी का

कमलनाथ सरकार के समय गिरफ्तारी से बचने के लिए भागे सोनी की प्रदेश में वापसी चौंकाने वाली बात नहीं है। यह तय था कि हालात अनुकूल होते ही उसे फिर घर की याद सताने लगेगी। हां, अब उसके मेरा घर यानी माय होम के कई नियमित विजिटर्स को डर सता रहा होगा, कि जीतू उनकी मेहमाननवाजी के शर्मनाक कच्चे चिट्ठे न खोल दे। तय है कि सोनी जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमे रसधार नहीं का अपवाद है। बदले के भाव से वह भरा हुआ है और उसके भीतर जो रसधार बह रही है, उसमें कई सफेदपोश बहते नजर आ सकते हैं। इसलिए समय की मांग है कि जीतू को तो उसके किए की सजा मिले।  आगे पढ़ें

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भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा- कांग्रेस का 24 में से 20 से 22 सीट जीतने का दावा खोखला साबित होगा, उपचुनावों में भाजपा प्रत्याशियों की होगी जीत

भाजपा की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने कहा है कि कांग्रेस के दावे खोखले साबित होंगे। राज्य में 24 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनावों में भाजपा प्रत्याशियों की ही विजय होगी। प्रदेश अध्यक्ष प्रदेश भाजपा कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा के दौरान सवालों के जवाब में कहा कि कांग्रेस नेता 24 में से 20 से 22 सीटों पर जीतने का दावा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी पूरी टीम भावना के साथ चुनाव लड़ेगी और इसकी तैयारियों में जुट गयी है।  आगे पढ़ें

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अब ये चुप रहने का समय नहीं है

अपनी पिछली पार्टी की पंद्रह महीने की सरकार में ये मंत्री और विधायक थे ही। तो फिर मार्च से लेकर मई के बीच के दो महीनों में ऐसा क्या हो गया कि उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों के विकास के लिए इतनी बड़ी रकम की जरूरत आ गई? क्या यह मान लें कि कमलनाथ सरकार ने इनके क्षेत्र में कोई भी काम नहीं करवाए। आरोप तो ऐसे ही लगा कर इन लोगों ने दलबदल किया था। या यह समझ लिया जाए कि पंद्रह महीने तक इन महानुभावों ने ही अपने-अपने इलाके में जनोपयोगी काम करने में कोई रूचि ही नहीं ली? वरना इतनी भारी-भरकम रकम की दरकार का कोई खास औचित्य ही समझ नहीं आता है।  आगे पढ़ें

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सरिया गपावनी का ये सियासी मौसम

पहली नजर में यह आश्चर्य का विषय लगता है कि कोरोना के भीषण प्रकोप के बीच शिवराज को अचानक ये जांच वाली बात कैसे सूझ गयी है। दन्न से सिलावट सहित नरोत्तम मिश्रा और कमल पटेल का मंत्री समूह गठित कर दिया गया। कहा गया है कि यह समूह बीती सरकार के निर्णयों की समीक्षा करेगा। इसके पीछे नरोत्तम मिश्रा की पीड़ा है। कमलनाथ सरकार ने मिश्रा को खूब घेरने की कोशिश की। उनके एक सरकारी सहयोगी को जेल भी भेजा गया। ये अलग बात है कि कमलनाथ, नरोत्तम का कुछ ज्यादा नहीं बिगाड़ सके।  आगे पढ़ें

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ब्यूरोक्रेसी में कमलनाथ टॉनिक: शिवराज का दृष्टि दोष या नेत्र ज्योति प्रक्षालन!

होता यह है कि सरकार बदलने के साथ लूप लाइन में रखे हुए कोई सीनियर ब्यूरोक्रेट नई सत्ता के संजय बन जाते हैं। उन्हीं की आंखों से सिंहासन पर आरुढ़ व्यक्ति अपनी प्रशासनिक व्यवस्था रचता है। पिछली सरकार के करीबी अफसर प्रमुख पदों अपदस्थ किए जाते हैं और नए बैठाए जाते हैं। दिसंबर 2018 में सत्तासीन होते ही कमलनाथ ने भी यही किया था। उनके संजय बने थे सुधि रंजन मोहंती, जो 15 साल की बीजेपी सरकार में निर्वासन जैसी स्थिति से कई बार दो-चार हुए थे। कमलनाथ ने मोहंती को अपना मुख्य सचिव बनाया और मंत्रालय से लेकर जिलों तक अफसरों का रंग देख कर उनकी पदस्थापना होने लगी।  आगे पढ़ें

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महाराज के साथ तालमेल में कांग्रेसीकरण की ओर शिवराज!

चौहान के पांच मंत्रियों में से दो महाराज यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास समर्थक हैं। इन दो को जगह दिलाने के लिए मंत्रिमंडल का गठन तीन दिन तक टालना पड़ा था। बीजेपी के फार्मूले के तहत कोरोनाकाल में पहले जो छोटा एवं प्रभावी मंत्रिमंडल बनना था। उसमें चार वे बीजेपी नेता शामिल होने थे, जो पन्द्रह साल चली सरकार में प्रभावी भूमिका में रहे हैं और सिंधिया कोटे से एक नेता को मंत्री बनाया जाना था। ये हो न सका, क्योंकि महाराज अपने कोटे के सभी छह पूर्व मंत्रियों को मंत्री के तौर पर उपचुनाव में उतारना चाहते थे। कमलनाथ सरकार गिराने के समय वादा भी यही किया गया था। सिंधिया ने इसके लिए दिल्ली दरबार खटखटाया। पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह से बात की। लॉक डाउन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मर्यादा और कोरोना महामारी से निपटने की चुनौती को देखते हुए बीजेपी अभी 5 से ज्यादा मंत्री बनाने राजी नहीं थी। अंततः समझौता 3-2 के फार्मूले पर हुआ और सिंधिया कोटे से तुलसी सिलावट एवं गोविंद सिंह राजपूत के नाम आए।  आगे पढ़ें

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शिवराज का मंत्रिमंडल....

शिवराज ने या भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सही किया कि मंत्रिमंडल का आकार बहुत छोटा रखा। इसे समय के अनुकुल निर्णय ही कहा जाना चाहिए। इससे मुख्यमंत्री का लाभ यह कि वे इस प्रक्रिया से उपजने वाले संभावित असंतोष को पहले ही दबा सकते हैं। यह तथ्य याद दिलाकर कि राज्य को समुचित तरीके से चलाने के लिये जितने मंत्री चाहिए होंगे, उस हिसाब से पांच वाला यह आंकड़ा काफी कम है। तो यह समझाने में आसानी होगी कि मंत्रिमंडल का विस्तार जल्दी ही होगा। बस थोड़ा आपदा काल बीत जाए। अब ये आपदा काल पर है कि वह कब तक बीतता है। लेकिन एक सवाल उठना स्वाभाविक है। इस तरह के सियासी टोटके कब तक कारगर रहेंगे?  आगे पढ़ें

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मप्र की सियासत: बहुमत परीक्षण से पहले दिग्विजय सिंह ने मानी हार, कहा- कमलनाथ सरकार के पास नहीं हैं नंबर

मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार बचेगी या वहां बीजेपी का कमल खिलेगा, इसका फैसला आज शाम 5 बजे तक हो जाएगा। विधानसभा का विशेष सत्र 20 मार्च को दोपहर दो बजे बुलाया गया है। लेकिन इससे पहले कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक टीवी न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कमलनाथ सरकार के पास नंबर नहीं है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि पैसे और सत्ता के दमपर बहुमत वाली सरकार को अल्पमत में लाया गया है।  आगे पढ़ें

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मप्र में जारी सियासी घमासान के बीच आज का दिन होगा अहम, कमलनाथ का इस्तीफा तय, दिग्गी बोले- सरकार सुरक्षित नहीं

मध्य प्रदेश में 17 दिन से जारी सियासी घमासान का शुक्रवार निर्णायक दिन है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आज कमलनाथ सरकार का विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होगा। कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने सदन में मौजूद रहने के लिए विधायकों को व्हिप जारी किया है। कमलनाथ ने सीएम हाउस पर 12 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस भी बुलाई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कमलनाथ फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफे का ऐलान कर सकते हैं। वहीं, गुरुवार देर रात स्पीकर ने 16 बागी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। इन इस्तीफों के स्वीकार होने के बाद कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटकर 92 हो गई है। इधर, दिग्विजय सिंह ने भी अब स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार सुरक्षित नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार का बचना मुश्किल है।  आगे पढ़ें

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