विश्लेषण

सियासत से अदालत तक बाटला हाउस

दिल्ली की एक अदालत ने साल 2008 में बटला हाउस मुठभेड़ के दौरान हुई पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा की हत्या के दोषी आरिज खान को सोमवार को मौत की सजा सुनाई। देश की राजनीति में इस काण्ड की बहुत गूँज रही। चूंकि आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय से थे, इसलिए वोट बैंक की राजनीति जमकर चली। कांग्रेस नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सरकारी एजेंसियों पर निर्दोषों को परेशान करने का आरोप लगाया था। उनका यह भी कहना था कि बेगुनाहों के खिलाफ ऐसे गलत कदम को देखकर सोनिया गाँधी रो पड़ी थीं। कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद ने भी इसी तरह की बातें कही थीं। इसके बाद से ही यह पार्टी लोगों के निशाने पर थी, और अब अदालत के फैसले के बाद कांग्रेस के लिए मुश्किल और बढ़ गयी दिखती है।

मामले की शुरूआत 13 सितम्बर, 2008 को हुई। उस मनहूस दिन सिलसिलेवार धमाकों से दिल्ली दहल गई, जिसमें 39 लोग मारे गए थे और 159 लोग घायल हुए थे। फिर आयी 19 सितंबर, 2008, जिस दिन पुलिस और धमाकों में शामिल आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ हुई। जब पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर के आरोप लगे तो प्राथमिकी दर्ज की गई।

विवाद और आरोप-प्रत्यारोपों के बीच 3 जुलाई, 2009 को आरोपी आरिज खान और शहजाद अहमद को न्यायालय ने भगोड़ा अपराधी घोषित किया। पुलिस को एक सफलता तब मिली जब 2 फरवरी, 2010 को शहजाद अहमद लखनऊ से गिरफ्तार किया गया।

इधर, 1 अक्टूबर, 2010 को एनकाउंटर मामले की जांच दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को हस्तांतरित की गई। इस बीच 30 जुलाई, 2013 को धमाकों के आरोपी इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी और सह-अभियुक्त शहजाद अहमद को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अगला अहम् घटनाक्रम 14 फरवरी, 2018 को हुआ, जब 10 साल तक फरार रहने के बाद आरिज खान को गिरफ्तार किया गया। बीती 8 मार्च को ही आरिज खान को हत्या और अन्य अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। और फिर आयी वह, 15 मार्च, जब अदालत ने आरिज खान को मृत्युदंड दिया और उस पर 11 लाख रुपये का जुमार्ना भी लगाया।

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