नज़रिया

बंध्याकरण, बंधुआ मजदूर और कांग्रेस का मजबूर नेतृत्व

यह बात तो खैर अपने स्तर पर वैचारिक स्तर-हीनता को प्रश्रय देने जैसी होगी कि कांग्रेस इस सबसे कोई सबक लेगी। फिर भी सच यह कि इस दल के लिए एक बार फिर दिल से सोचने का समय आ गया है कि वह किस दिशा में जा रहा है। शायद विचार के केंद्र में यह सवाल प्रमुख रहेगा कि उसे किस तरफ ले जाया जा रहा है। वह भी हांकने के अंदाज में।

छत्तीसगढ़ और राजस्थान से इतर यदि केवल मध्यप्रदेश की बात करें तो ही स्थिति को साफ समझा जा सकता है। कांग्रेस के हिस्से में एक बार फिर आई बड़ी हार कई दिशा में ध्यान खींचती है। चुनाव के पहले से ही यह साफ था कि कमलनाथ ने पूरे अभियान की कमान अपने हाथ में ले ली है। वह हाथ भी ऐसा कि उसमें पंजे की संभावनाओं का जैसे कोई स्थान ही नहीं बचा था। निश्चित ही नाथ ने एक जगह जोरदार विजय हासिल की। वह पार्टी के आलाकमान को अपने आगे नतमस्तक करने में सफल रहे।

सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जैसे कांग्रेस के कथित दमदार चेहरों की इस चुनाव में नाथ के आगे कोई बिसात ही नहीं दिखी। बस सियासी बिसात पर नाथ अपने हिसाब से मोहरे बिछाते चले गए। नेतृत्व मजबूर है। उसकी अपनी सीमा रेखा है। उसे आज पार्टी के प्रति नहीं, बल्कि परिवार के प्रति निष्ठा वाले लोगों की बड़ी आवश्यकता है। यह उसके लिए अनिवार्यता बन गया है। इसीलिए तो यह हुआ कि पार्टी के हित को हिट करते हुए अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट और भूपेश बघेल बनाम एमएस सिंहदेव के प्रकरण में नेतृत्व ने घुटने टेकने में कोई संकोच नहीं किया।

शीर्ष की इस कमजोरी और परिवार से नजदीकी ही नाथ ने भी फायदा उठाने में कोई चूक नहीं की। शायद घर के अंदर की इस जीत ने ही नाथ के भीतर वह आत्मविश्वास पनपा दिया कि चुनाव को लेकर वह कहीं ‘वन मैन आर्मी’ तो कभी-कभी ‘लोन वूल्फ’ वाली शैली में भी आगे बढ़ने से पीछे नहीं रहे। तीन राज्यों के इस राजहठ को अपने हित और हक में प्रश्रय देने की कांग्रेस की नीति का यह नतीजा हुआ कि आज वह हिंदी-भाषी राज्यों में केवल हिमाचल प्रदेश तक सिमट कर रह गयी है।

वो तो गनीमत है कि तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति की पिता-पुत्री वाली युति के परिवारवाद ने इस राज्य में कांग्रेस को जीत का अवसर दे दिया, वरना तो आज पंजे की लकीरों से एक और राज्य के लिए राजयोग का चिन्ह भी मिट गया होता। यह सवाल उठाने का भी कोई अर्थ नहीं है कि अंतत: कौन, किस तरीके से पनौती साबित हुआ है । क्योंकि इस सवाल का जो खुलकर उत्तर दे सके, कांग्रेस में ऐसे सच्चे पार्टीजनों की नस्ल अब न जाने कबसे बंध्याकरण की शिकार है। वैसे बंध्याकरण और बंधुआ मजदूर शब्द आपस में मिलते-जुलते हैं ना? आपका क्या विचार है?

प्रकाश भटनागर

मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में प्रकाश भटनागर का नाम खासा जाना पहचाना है। करीब तीन दशक प्रिंट मीडिया में गुजारने के बाद इस समय वे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश में प्रसारित अनादि टीवी में एडिटर इन चीफ के तौर पर काम कर रहे हैं। इससे पहले वे दैनिक देशबंधु, रायपुर, भोपाल, दैनिक भास्कर भोपाल, दैनिक जागरण, भोपाल सहित कई अन्य अखबारों में काम कर चुके हैं। एलएनसीटी समूह के अखबार एलएन स्टार में भी संपादक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। प्रकाश भटनागर को उनकी तल्ख राजनीतिक टिप्पणियों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button